समान नागरिक संहिता (UCC): एक देश, एक कानून और उठते अनगिनत सवाल
लेखक: आकाश दीप | युगबोध
27 जनवरी 2025 — देहरादून की वह सुबह जब 75 साल पुराना सवाल कानून बन गया
27 जनवरी 2025। देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक notification पर हस्ताक्षर किए — और उस एक हस्ताक्षर के साथ, आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार, किसी राज्य ने अपने यहाँ Uniform Civil Code (समान नागरिक संहिता) लागू कर दिया। संविधान का Article 44 — जो 1950 से एक "Directive Principle" के रूप में, यानी एक अधूरे वादे के रूप में पड़ा था — पहली बार ज़मीन पर उतरा।
यह कहानी यहीं शुरू नहीं हुई। 27 मार्च 2022 को उत्तराखंड कैबिनेट ने एक committee बनाई — सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में। 18 महीनों में 43 public meetings हुईं, 2.33 लाख से ज़्यादा लोगों ने अपने सुझाव लिखकर भेजे। 2 फरवरी 2024 को 740 पेज की रिपोर्ट सौंपी गई। 7 फरवरी 2024 को विधानसभा ने बिल पास किया। 12 मार्च 2024 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। और आखिरकार 27 जनवरी 2025 को यह कानून बन गया।
तीन साल की यह यात्रा सिर्फ एक राज्य की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की कहानी है जो भारत 75 साल से टाल रहा था — क्या एक देश में सबके लिए एक जैसा पर्सनल लॉ होना चाहिए? आज समझते हैं — UCC का पूरा कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक सच।
पहले समझें — UCC का मतलब क्या है, और संविधान में यह कहाँ से आया
Uniform Civil Code का सीधा मतलब है — विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार (inheritance), और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों में, धर्म चाहे जो भी हो, सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून। अभी भारत में यह व्यवस्था नहीं है — हिंदू धर्म के लिए Hindu Marriage Act और Hindu Succession Act, मुस्लिम समुदाय के लिए Muslim Personal Law (Shariat), ईसाइयों के लिए Indian Christian Marriage Act, और सभी धर्मों के बीच विवाह के लिए Special Marriage Act — यह सब अलग-अलग कानून समानांतर चलते हैं।
यह व्यवस्था संविधान के दो अनुच्छेदों के बीच एक स्थायी तनाव पैदा करती है।
| अनुच्छेद | क्या कहता है | कानूनी स्थिति |
|---|---|---|
| Article 44 | राज्य को समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करना चाहिए | Directive Principle — बाध्यकारी नहीं, सिर्फ दीर्घकालिक लक्ष्य |
| Article 25 | हर नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता | Fundamental Right — संवैधानिक रूप से सुरक्षित |
यह कोई नया टकराव नहीं है। 1985 के मशहूर Shah Bano case में सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम महिला के maintenance के अधिकार को बरकरार रखा था, और साथ ही खेद जताया था कि Article 44 दशकों से "मरा हुआ अक्षर" बनकर रह गया है। 1995 के Sarla Mudgal केस में कोर्ट ने कहा कि UCC, Articles 25, 26 और 27 की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता। और 2017 के Shayara Bano केस में कोर्ट ने triple talaq को असंवैधानिक घोषित कर इस बहस को फिर से हवा दी। यानी सुप्रीम कोर्ट खुद कई बार सरकार को UCC लाने के लिए प्रेरित कर चुका है — लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति 75 साल तक नहीं जुटी।
गोवा का 156 साल पुराना मॉडल — जिसे कोई नहीं देखता
एक दिलचस्प सच यह है कि भारत में UCC की शुरुआत उत्तराखंड से नहीं हुई — गोवा में यह 1867 से, यानी 156 साल से चल रहा है। पुर्तगाली शासन के दौरान लागू किया गया Portuguese Civil Code, 1961 में गोवा के भारत में विलय के बाद भी जारी रहा — Goa, Daman and Diu Administration Act, 1962 के ज़रिए इसे कानूनी मान्यता मिली।
गोवा में सभी धर्मों के लोग — हिंदू, मुस्लिम, ईसाई — विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के लिए एक ही कानून का पालन करते हैं। यह दशकों से बिना किसी बड़े विवाद के चल रहा है। फिर भी राष्ट्रीय बहस में गोवा का नाम शायद ही कभी आता है — क्योंकि यह विरासत में मिला हुआ colonial कानून है, किसी आधुनिक राजनीतिक प्रक्रिया का नतीजा नहीं। उत्तराखंड पहला ऐसा राज्य है जिसने आज़ादी के बाद, अपनी विधानसभा से, अपनी मर्ज़ी से UCC पास किया — और यही अंतर इसे ऐतिहासिक बनाता है।
उत्तराखंड UCC में क्या है — हर प्रावधान को विस्तार से समझें
| प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| विवाह की न्यूनतम आयु | सभी धर्मों के लिए समान — महिला: 18 वर्ष, पुरुष: 21 वर्ष |
| बहुविवाह (Polygamy) पर रोक | सभी समुदायों के लिए प्रतिबंधित |
| निकाह हलाला और तीन तलाक | पूरी तरह प्रतिबंधित |
| तलाक की प्रक्रिया | सिविल कोर्ट के माध्यम से अनिवार्य — extrajudicial तलाक प्रतिबंधित |
| उत्तराधिकार में समानता | बेटे और बेटी को पैतृक संपत्ति में बराबर अधिकार (Hindu Succession Act में यह 2005 से था, अब सभी समुदायों पर लागू) |
| लिव-इन रिलेशनशिप रजिस्ट्रेशन | अनिवार्य — 30 दिनों के भीतर registrar के पास "statement of live-in relationship" जमा करना ज़रूरी; न करने पर आपराधिक दंड का प्रावधान |
| विवाह/तलाक रजिस्ट्रेशन | अनिवार्य — रजिस्ट्रेशन न करने पर सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित |
| अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) | पूरी तरह बाहर — Jaunsari, Bhotia, Tharu, Buksa, Raji जैसे समुदाय (उत्तराखंड की आबादी का लगभग 2.9%) अपने रीति-रिवाज़ जारी रख सकते हैं |
मुख्यमंत्री धामी ने इस कानून को "ऐतिहासिक" बताया और कहा — "यह कानून किसी संप्रदाय या धर्म के खिलाफ नहीं है। इसके माध्यम से समाज की बुरी प्रथाओं से छुटकारा पाने का रास्ता निकाला गया है।" 2026 में इसकी पहली वर्षगांठ पर सरकार ने Uniform Civil Code (Amendment) Ordinance, 2026 भी लागू किया — जिसमें रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को और digitise किया गया।
विरोध की आवाज़ें — कानूनी चुनौतियाँ अभी भी अदालत में हैं
यह कानून बिना विरोध के पास नहीं हुआ। All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इसे "अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर हमला" कहा। उनका तर्क है कि यह कानून प्रभावी रूप से एक "हिंदू कोड" को सभी नागरिकों पर थोप रहा है, और यह Article 25 और Article 29 का उल्लंघन करता है। Jamiat Ulama-i-Hind — भारत के सबसे बड़े मुस्लिम सामाजिक-धार्मिक संगठनों में से एक — ने भी इसे "नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला" बताया।
कानूनी मोर्चे पर, Jamiat Ulama-i-Hind ने Muslim Personal Law को overlap करने के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दाखिल की हैं। फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने interim stay देने से इनकार किया, लेकिन notices जारी कर मामलों को सुनवाई के लिए tag किया — यानी कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है, यह अभी भी अदालतों में चल रही है।
क्या यह सच में "समान" है — विशेषज्ञों के गंभीर सवाल
यहाँ बहस का सबसे नुकीला हिस्सा शुरू होता है। कई कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड का यह कानून पूरी तरह "uniform" नहीं है — इसमें चुनिंदा (selective) approach अपनाई गई है।
Vidhi Centre for Legal Policy की senior resident fellow नम्रता मुखर्जी ने Al Jazeera से कहा — "जबकि तकनीकी रूप से एक समान नागरिक संहिता को धार्मिक पहचान से परे, विवाह, तलाक और उत्तराधिकार के प्रावधानों को standardise करना चाहिए था, इसने selectively अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों के पर्सनल लॉ और प्रथाओं को outlaw और criminalise किया है।" प्रमुख feminist legal scholar फ्लाविया एग्निस ने लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य disclosure वाले प्रावधान को 2017 के Puttaswamy केस में स्थापित privacy के मौलिक अधिकार के खिलाफ बताया है — उनका तर्क है कि यह प्रावधान विशेष रूप से interfaith couples, दलित महिलाओं और सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों को निशाना बना सकता है।
यह आलोचना भी उठती है कि कानून मुस्लिम प्रथाओं — जैसे निकाह हलाला और बहुविवाह — को खत्म करता है, लेकिन हिंदू guardianship laws (जहाँ नाबालिग बेटे या अविवाहित बेटी का guardian पहले पिता, और उसके बाद ही माँ माना जाता है) या Hindu Undivided Family जैसे ढाँचे को नहीं छेड़ता। यानी "एकरूपता" का दावा करते हुए भी, यह कानून कुछ समुदायों की प्रथाओं पर ज़्यादा सख्त और कुछ पर कम सख्त नज़र आता है — और यही असंगति आलोचकों का सबसे बड़ा हथियार है।
महिलाओं के अधिकार — सबसे मज़बूत तर्क, लेकिन अधूरा भी
UCC के समर्थन में सबसे मज़बूत और emotionally resonant तर्क महिलाओं के अधिकारों का है। समर्थकों का कहना है कि UCC मुस्लिम महिलाओं को बाकी समुदायों जैसा ही अधिकार देता है — बहुविवाह खत्म करके, बेटे-बेटी को संपत्ति में बराबर अधिकार देकर, और तलाक की प्रक्रिया को सिविल कोर्ट के माध्यम से अनिवार्य बनाकर।
यह तर्क खोखला नहीं है — मेहर, इद्दत, और तीन तलाक जैसी प्रथाओं ने वास्तव में कई मुस्लिम महिलाओं को कानूनी रूप से कमज़ोर स्थिति में रखा है, और इन्हें खत्म करना एक प्रगतिशील कदम है। लेकिन सवाल यह भी उठता है — क्या यह सुधार सच में सभी महिलाओं के लिए बराबर है, या सिर्फ एक समुदाय की प्रथाओं को निशाना बनाकर "majoritarian approach" (बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण) को छुपाने की कोशिश है? यही जटिलता है जो UCC को "स्पष्ट अच्छा" या "स्पष्ट बुरा" कहना मुश्किल बनाती है।
अन्य राज्य भी कतार में — क्या यह राष्ट्रीय बनने वाला है?
| राज्य | स्थिति (2026) |
|---|---|
| गोवा | 1867 से UCC लागू — Portuguese Civil Code विरासत में मिला |
| उत्तराखंड | 27 जनवरी 2025 से लागू — आज़ाद भारत का पहला UCC राज्य |
| गुजरात | फरवरी 2024 में जस्टिस रंजना देसाई की अध्यक्षता में committee नियुक्त |
| असम | CM हिमंता बिस्वा सरमा ने 2024 में घोषणा की; Draft Bill 2026 में तैयारी में |
| मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश | सार्वजनिक रूप से इरादा जताया गया है, ठोस प्रक्रिया अभी शुरू नहीं |
यह पैटर्न साफ दिखाता है — UCC अब सिर्फ एक राज्य का प्रयोग नहीं रह गया। यह धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय आंदोलन की दिशा में बढ़ रहा है — एक राज्य से शुरू होकर BJP-शासित कई राज्यों में फैल रहा है। अगर यह pattern जारी रहा, तो 2029 के Lok Sabha चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर UCC एक केंद्रीय चुनावी मुद्दा बन सकता है।
राजनीतिक समीकरण — विपक्ष के लिए "नो-विन" स्थिति
UCC सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं — यह एक सटीक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी है। BJP के लिए यह लंबे समय से चुनावी एजेंडे का हिस्सा रहा है — 2022 के उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में धामी का यह flagship वादा था।
विपक्षी दलों — खासकर Congress — के लिए यह मुद्दा एक मुश्किल जगह बनाता है। अगर वे समर्थन करते हैं, तो उनका पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक नाराज़ हो सकता है। अगर वे विरोध करते हैं, तो उन्हें "महिला अधिकारों के विरोधी" के रूप में दिखाया जा सकता है। यही दोहरी मुश्किल — "Damned if you support, damned if you oppose" — UCC को एक संभावित political polarization tool बनाती है, खासकर 2029 के आम चुनावों के नज़दीक।
निष्कर्ष — सवाल यह नहीं कि UCC आएगा या नहीं, सवाल है कैसे
देहरादून की उस सुबह से — जब धामी ने notification पर हस्ताक्षर किए — एक साल से ज़्यादा बीत चुका है। उत्तराखंड का experiment न पूरी तरह सफल कहा जा सकता है, न पूरी तरह विफल। यह एक जटिल, अधूरा, और विवादित दस्तावेज़ है — जो कुछ मामलों में प्रगतिशील है, और कुछ मामलों में चयनात्मक (selective) भी।
भारत जैसे विविधता वाले देश में पूर्ण "uniformity" शायद कभी पूरी तरह संभव न हो। लेकिन उत्तराखंड का मॉडल यह सवाल ज़रूर खड़ा करता है — क्या समानता और विविधता का सम्मान — दोनों एक साथ संभव हैं? या किसी एक को प्राथमिकता देने पर दूसरा पीछे छूट जाता है?
यह कानून अदालतों में अभी भी चुनौती के अधीन है। गुजरात, असम जैसे राज्य अपनी committees बना रहे हैं। और 2029 के चुनाव नज़दीक आते-आते, यह सवाल केवल कानून का नहीं — भारत की पहचान का भी बन जाएगा।
आप क्या सोचते हैं — क्या उत्तराखंड का UCC मॉडल वास्तव में "समान" है, या यह selective है? क्या लिव-इन रिलेशनशिप के mandatory registration वाला प्रावधान privacy के अधिकार का उल्लंघन करता है? और क्या भारत राष्ट्रीय स्तर पर UCC के लिए तैयार है? नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताएं।
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स्रोत / Sources:
1. Uniform Civil Code of Uttarakhand Act, 2024 — Official Text and Wikipedia Summary
2. PMF IAS — "Uttarakhand Uniform Civil Code: Provisions and Constitutional Context"
3. Al Jazeera — "India's BJP-ruled Uttarakhand implements common civil code", January 27, 2025
4. Juris Centre — "Between Uniformity and Justice: Rethinking the UCC Through Goa and Uttarakhand", July 2025
5. Anantam IAS — "Uniform Civil Code Uttarakhand: First UCC State — Complete Guide", 2026
6. GKToday — "Uttarakhand Implements Uniform Civil Code Amendment Ordinance", January 2026
7. Supreme Court of India — Shah Bano Case (1985), Sarla Mudgal Case (1995), Shayara Bano Case (2017)
8. NextIAS — "UCC Rules in Uttarakhand: Current Affairs Analysis"


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