मोदी से योगी, हिमंत से सुवेंदु तक: कैसे बदल गया हिंदुत्व का राजनीतिक चेहरा और क्यों BJP का नया दौर केवल चुनाव नहीं, एक वैचारिक विस्तार माना जा रहा है?
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लेखक: आकाश दीप | युगबोध
लेखक: आकाश दीप | युगबोध
भारतीय राजनीति में हिंदुत्व अब केवल एक मुद्दा नहीं, एक व्यापक राजनीतिक framework बन चुका है
भारतीय
राजनीति में पिछले एक
दशक में सबसे बड़ा
बदलाव सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि narrative
transformation रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव
में BJP को 31 प्रतिशत वोट मिले थे।
2019 में यह बढ़कर 37.4 प्रतिशत
हो गया और 2024 में
भी पार्टी 240 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी
बनी रही। Election Commission of
India के आँकड़े बताते हैं कि पिछले
एक दशक में BJP ने
उन राज्यों में भी अपनी
उपस्थिति दर्ज कराई जहाँ
पहले उसका कोई खास
आधार नहीं था।
इस विस्तार के पीछे केवल एक कारण नहीं है। नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, हिमंत बिस्वा सरमा और सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं ने हिंदुत्व को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत किया। और यही BJP की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी।
हिंदुत्व का पुराना दौर और आज का नया स्वरूप
1990 के
दशक में हिंदुत्व की
राजनीति मुख्य रूप से राम
मंदिर आंदोलन और identity politics तक सीमित थी।
उस दौर में Lokniti-CSDS के
सर्वेक्षणों के अनुसार BJP का
वोट बेस मुख्यतः उच्च
जाति हिंदुओं और व्यापारी वर्ग
तक केंद्रित था।
लेकिन
आज स्थिति पूरी तरह बदल
चुकी है। Lokniti-CSDS के 2024 के National Election Study के अनुसार BJP ने
2024 में OBC वोटरों में 42 प्रतिशत, महिला वोटरों में 38 प्रतिशत और युवा वोटरों
में 36 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल की। यानी हिंदुत्व
की राजनीति अब केवल एक
वर्ग तक सीमित नहीं
रही।
आज इसमें cultural nationalism, welfare politics, strong leadership, national security, development narrative और civilizational pride — सब शामिल हो चुके हैं।
नरेंद्र मोदी: जिन्होंने हिंदुत्व को national leadership model में बदला
अगर
आज के हिंदुत्व politics का सबसे
बड़ा चेहरा किसी को माना
जाता है, तो वह
नरेंद्र मोदी हैं। मोदी
ने हिंदुत्व को केवल ideological language में नहीं रखा,
बल्कि उसे aspirational politics के साथ जोड़ा।
ADR (Association for Democratic Reforms) के विश्लेषण के अनुसार 2014 से 2024 के बीच BJP की सदस्य संख्या 8 करोड़ से बढ़कर 18 करोड़ हो गई, जो इसे दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनाती है। यह विस्तार केवल संगठनात्मक नहीं था, बल्कि वैचारिक भी था।
मोदी
ने nationalism,
welfare delivery, Hindu cultural symbolism, strong leadership image और global India narrative को एक साथ
combine किया। PM-KISAN
जैसी योजनाओं से 11 करोड़ किसान परिवारों तक सीधा लाभ
पहुँचाकर उन्होंने ideological
politics को welfare
politics से जोड़ दिया।
यही कारण है कि मोदी की politics केवल traditional BJP voters तक सीमित नहीं रही।
योगी आदित्यनाथ: हिंदुत्व के सबसे aggressive administrator
अगर
मोदी हिंदुत्व का national face हैं, तो योगी
आदित्यनाथ उसका सबसे aggressive governance face हैं। उत्तर प्रदेश
जैसे 24 करोड़ की आबादी वाले
राज्य में योगी ने
law-and-order politics, religious symbolism और
administrative centralization को
मिलाकर एक अलग मॉडल
बनाया।
NCRB (National Crime Records Bureau) के आँकड़ों
के अनुसार उत्तर प्रदेश में 2017 के बाद से
दंगों की संख्या में
उल्लेखनीय कमी आई। योगी
सरकार इसे अपनी law-and-order policy की सफलता बताती
है। उनके समर्थक उन्हें
decisive administrator मानते
हैं जबकि आलोचक इसे
polarizing politics का
चेहरा कहते हैं।
2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BJP ने 255 सीटें जीतीं — यह योगी के governance model की राजनीतिक स्वीकृति मानी जाती है।
हिमंत बिस्वा सरमा: जिन्होंने हिंदुत्व को North-East में regional identity से जोड़ा
हिमंत
बिस्वा सरमा का राजनीतिक
सफर भारतीय राजनीति की सबसे दिलचस्प
कहानियों में से एक
है। कभी कांग्रेस के
सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार रहे हिमंत 2015 में
BJP में शामिल हुए और आज
North-East में BJP
expansion के सबसे बड़े चेहरे
बन चुके हैं।
2016 में
असम में BJP की पहली सरकार
बनी। 2021 में BJP ने असम में
60 सीटें जीतीं और हिमंत मुख्यमंत्री
बने। इससे भी महत्वपूर्ण
यह है कि BJP ने
2018 से 2023 के बीच North-East के
8 में से 7 राज्यों में
सरकार बनाई या गठबंधन
में शामिल हुई — एक ऐसे क्षेत्र
में जहाँ 2014 से पहले BJP लगभग
अनुपस्थित थी।
हिमंत
ने BJP narrative को असम की
migration concerns, demographic issues और
Assamese identity politics से
जोड़ा। यही उनकी सबसे
बड़ी राजनीतिक चतुराई रही।
हिमंत बिस्वा सरमा की North-East रणनीति को विस्तार से समझने के लिए हमारा विश्लेषण पढ़ें: असम में फिर लौटा 'मामा' मॉडल।
सुवेंदु अधिकारी: बंगाल में हिंदुत्व politics का नया चेहरा
पश्चिम
बंगाल लंबे समय तक
ऐसी भूमि मानी जाती
थी जहाँ BJP की ideological roots बहुत कमजोर थीं।
2011 के विधानसभा चुनाव में BJP को मात्र 4.1 प्रतिशत
वोट मिले थे। लेकिन
2021 में यह बढ़कर 38.1 प्रतिशत
हो गया। यह बदलाव
रातोरात नहीं आया।
सुवेंदु
अधिकारी, जो कभी ममता
बनर्जी के सबसे करीबी
नेताओं में गिने जाते
थे, 2020 में BJP में शामिल हुए।
2021 के चुनाव में उन्होंने नंदीग्राम
सीट पर ममता बनर्जी
को 1,956 वोटों से हराया — जो
बंगाल की राजनीति का
सबसे चर्चित मुकाबला बना।
Election Commission के आँकड़ों के अनुसार बंगाल में BJP ने 2021 में 77 सीटें जीतीं, जो 2016 की 3 सीटों से कहीं अधिक थी। सुवेंदु की politics Bengali identity, Hindu consolidation और anti-TMC narrative के combination पर आधारित है।
इन चारों नेताओं में common क्या है?
हालाँकि
मोदी, योगी, हिमंत और सुवेंदु की
राजनीतिक यात्राएँ अलग हैं, लेकिन
उनमें कुछ common patterns स्पष्ट दिखते हैं।
Strong Leadership Projection: ये
सभी नेता खुद को
decisive leader की तरह present करते हैं जो
कठिन फैसले लेने से नहीं
चूकते।
Cultural Symbolism का
खुला इस्तेमाल: इनकी politics में Hindu cultural
references openly दिखाई
देते हैं — चाहे वह मोदी
का काशी विश्वनाथ कॉरिडोर
हो, योगी का अयोध्या
विकास हो, हिमंत का
असमिया अस्मिता का narrative हो या सुवेंदु
का बंगाल में हिंदू consolidation।
Ideology और Governance का Mix: ये केवल ideological politics नहीं करते, बल्कि development और welfare narrative भी साथ रखते हैं।
सोशल मीडिया ने हिंदुत्व politics को कितना बदल दिया?
Internet and Mobile Association of India (IAMAI) के अनुसार 2024 में
भारत में सक्रिय इंटरनेट
उपयोगकर्ताओं की संख्या 90 करोड़
से अधिक हो गई।
इसमें से बड़ा हिस्सा
सोशल मीडिया पर सक्रिय है।
BJP का IT Cell और इन नेताओं की digital presence ने ideological politics को amplify करने में बड़ी भूमिका निभाई है। नरेंद्र मोदी के X (Twitter) पर 10 करोड़ से अधिक followers हैं, जो किसी भी भारतीय नेता में सबसे अधिक है। योगी आदित्यनाथ के 2.5 करोड़ और हिमंत बिस्वा सरमा के 70 लाख से अधिक followers हैं।
Digital ecosystem ने इन नेताओं को बिना mainstream media के सीधे अपने समर्थकों तक पहुँचने का माध्यम दिया।
क्या यह नया political era है?
कई
political analysts ऐसा
मानते हैं। Milan Vaishnav
(Carnegie Endowment for International Peace) जैसे
शोधकर्ताओं का कहना है
कि भारत coalition-era
uncertainty से निकलकर strong leadership
politics के दौर में प्रवेश
कर चुका है।
लेकिन यह भी सच है कि 2024 के चुनाव में BJP को अकेले बहुमत नहीं मिला और उसे NDA के सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा। यह दिखाता है कि हिंदुत्व की politics सर्वशक्तिमान नहीं है और opposition के पास अभी भी space है।
निष्कर्ष: मोदी, योगी, हिमंत और सुवेंदु केवल नेता नहीं, बदलती भारतीय राजनीति के प्रतीक हैं
2014 में
31 प्रतिशत वोट से शुरू
होकर आज 18 करोड़ सदस्यों वाली पार्टी बनना,
North-East के 7 राज्यों में सरकार बनाना
और बंगाल में 3 से 77 सीटों तक पहुँचना — यह
सब केवल एक ideology की
जीत नहीं है।
यह उस राजनीतिक strategy की जीत
है जिसने हिंदुत्व को leadership model,
governance style, cultural assertion और
welfare politics के साथ मिला दिया।
मोदी, योगी, हिमंत और सुवेंदु इसी
broader ecosystem के अलग-अलग चेहरे
हैं।
और शायद यही कारण
है कि भारतीय राजनीति
का अगला दशक भी
इसी ideological
contest के इर्द-गिर्द घूमता
दिखाई दे रहा है।
आप क्या सोचते हैं
— क्या हिंदुत्व की राजनीति आने
वाले दशक में भी
इतनी ही प्रभावशाली रहेगी?
नीचे comment में अपनी राय
जरूर बताएं।
स्रोत / Sources:
1. Election Commission of India - General Election Results
2014, 2019, 2024
2. Lokniti-CSDS - National Election Study 2024
3. ADR (Association for Democratic Reforms) - Party
Membership Analysis
4. NCRB (National Crime Records Bureau) - State-wise Crime
Data
5. Internet and Mobile Association of India (IAMAI) -
Digital India Report 2024
6. Milan Vaishnav, Carnegie Endowment for International
Peace - India's Political Transformation
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