1 जुलाई 2026 से मनरेगा खत्म — 14 करोड़ परिवारों पर क्या असर पड़ेगा? फायदा या नुकसान?
लेखक: आकाश दीप | युगबोध
1 जुलाई 2026 — मनरेगा खत्म। 20 साल पुरानी वह योजना जिसने 14 करोड़ परिवारों की जिंदगी बदली, अब इतिहास बनने वाली है।
11 मई 2026। केंद्र सरकार ने राजपत्र में एक अधिसूचना जारी की। उसमें लिखा था —
"महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 — अपने सभी नियमों, अधिसूचनाओं, योजनाओं, आदेशों और दिशानिर्देशों सहित — 1 जुलाई 2026 से निरस्त हो जाएगा।"
बस इतना। 20 साल। 14 करोड़ से अधिक परिवार। 3,000 करोड़ से अधिक कार्य दिवस। और एक अधिसूचना ने सब कुछ बदल दिया।
मनरेगा की जगह आएगी — विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण। संक्षेप में VB-G RAM G। यह नाम शायद ग्रामीण मजदूर के मुँह से कभी नहीं निकलेगा, लेकिन यह योजना उसकी जिंदगी तय करेगी।
सवाल यह नहीं है कि मनरेगा अच्छी थी या बुरी। सवाल यह है — जो नई योजना आ रही है, क्या वह 14 करोड़ परिवारों के लिए बेहतर है? क्या सरकार का दावा सही है? और जो विशेषज्ञ इसे "रोजगार गारंटी का अंत" कह रहे हैं — क्या वे सही हैं?
आज हम यह सब समझेंगे — तथ्यों के साथ, बिना किसी पक्षपात के।
पहले समझें — मनरेगा थी क्या और इसने क्या किया?
2005। संसद में एक ऐतिहासिक कानून पास हुआ। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम। यह दुनिया का सबसे बड़ा रोजगार गारंटी कार्यक्रम बना।
इसका सिद्धांत सरल था — भारत के किसी भी गाँव में रहने वाला कोई भी वयस्क जो शारीरिक काम कर सकता है, उसे सरकार साल में कम से कम 100 दिन काम देगी। काम नहीं दे सकती तो बेरोजगारी भत्ता देगी। यह अधिकार था — माँगो और मिलेगा।
20 साल में क्या हुआ? आँकड़े बोलते हैं:
| पैमाना | आँकड़ा |
|---|---|
| कुल लाभार्थी परिवार (2024-25) | 14 करोड़ से अधिक |
| महिला श्रमिकों की भागीदारी | 2013-14 में 48% से बढ़कर 2025-26 में 58% |
| अनुसूचित जाति/जनजाति श्रमिक | कुल कार्य दिवसों का 40%+ |
| 2020-21 में कुल व्यय (कोविड वर्ष) | ₹1,11,170 करोड़ — सर्वाधिक |
| 2025-26 का बजट आवंटन | ₹86,000 करोड़ — महामारी के बाहर सर्वाधिक |
| डिजिटल भुगतान | 2024 तक 99.9% इलेक्ट्रॉनिक |
मनरेगा ने ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता दी। अनुसूचित जाति और जनजाति के मजदूरों को एक guaranteed income दी। और सबसे महत्वपूर्ण — इसने ग्रामीण मजदूरी बढ़ाने में मदद की। जिन जिलों में मनरेगा अच्छी तरह लागू हुई, वहाँ खेती की मजदूरी भी बढ़ी — क्योंकि मजदूरों के पास एक बाहरी विकल्प था।
लेकिन मनरेगा में कमियाँ भी थीं। वेतन भुगतान में देरी, नकली मजदूर (ghost workers), काम की गुणवत्ता पर सवाल, राजनीतिक दुरुपयोग। ये समस्याएँ थीं और इनसे इनकार नहीं किया जा सकता।
अंतिम वर्ष में मनरेगा की हालत — जो आँकड़े परेशान करते हैं
LibTech India और NREGA संघर्ष मोर्चा ने मई 2026 में एक रिपोर्ट जारी की जो चिंताजनक है।
2025-26 में — मनरेगा के अंतिम वर्ष में:
| समस्या | आँकड़ा |
|---|---|
| eKYC पूरा न कर पाने वाले मजदूर | 45.4% यानी 11.58 करोड़ मजदूर — रोजगार से वंचित |
| कम नामांकित परिवार | 44 लाख कम परिवार 2024-25 की तुलना में |
| कम रोजगार पाने वाले मजदूर | 67 लाख कम मजदूरों को काम मिला |
| वेतन व्यय | ₹67,834 करोड़ से गिरकर ₹56,264 करोड़ — ₹11,570 करोड़ की कमी |
| 100 दिन काम पूरा करने वाले | केवल 9.5% परिवार |
यानी जब नई योजना लागू हो रही है — तब तक पुरानी योजना से लाखों लोग पहले ही बाहर हो चुके थे। डिजिटल बाधाओं की वजह से।
यह एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है — अगर eKYC जैसी तकनीकी जरूरत ने 11 करोड़ लोगों को बाहर कर दिया, तो नई योजना जो और भी ज्यादा डिजिटल है, उसका क्या होगा?
नई योजना VB-G RAM G क्या है — सरकार का दावा क्या है?
18 दिसंबर 2025 को संसद के शीतकालीन सत्र में यह विधेयक पारित हुआ। 21 दिसंबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुमति दी। और 1 जुलाई 2026 से यह पूरे देश में लागू होगा।
सरकार के अनुसार यह मनरेगा का उन्नत संस्करण है। मुख्य बदलाव:
| पहलू | मनरेगा (पुराना) | VB-G RAM G (नया) |
|---|---|---|
| रोजगार की गारंटी | 100 दिन प्रति परिवार | 125 दिन प्रति परिवार |
| वेतन भुगतान | 15 दिन में | साप्ताहिक |
| केंद्र का वित्त पोषण | मजदूरी का 100% | 60:40 (केंद्र:राज्य) |
| बजट मॉडल | माँग आधारित (खुला) | नियामक आवंटन (तय सीमा ₹95,000 करोड़) |
| कृषि सीजन में काम | पूरे साल उपलब्ध | 60 दिन तक रोका जा सकता है |
| योजना निर्माण | वार्षिक श्रम बजट | विकसित ग्राम पंचायत योजनाएँ (VGPP) |
| निगरानी | भौतिक निरीक्षण | GPS टैगिंग, AI धोखाधड़ी पहचान, बायोमेट्रिक |
| बेरोजगारी भत्ता | केंद्र देता था | राज्य को देना होगा |
सरकार का पक्ष — यह बदलाव क्यों जरूरी था
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद में कहा — "यह विधेयक गाँवों के व्यापक विकास का माध्यम बनेगा। यह समाज के कमजोर वर्गों को समावेश करने वाला और उनकी गरिमा को बनाए रखने वाला कानून है।"
सरकार के मुख्य तर्क:
पहला — 25 दिन अधिक रोजगार: 100 से 125 दिन की वृद्धि। महाराष्ट्र में जहाँ 2025-26 में मजदूरी दर ₹309 प्रति दिन है, वहाँ एक परिवार को सालाना ₹7,725 अतिरिक्त मिल सकते हैं। छोटी राशि है लेकिन गरीब परिवार के लिए महत्वपूर्ण।
दूसरा — साप्ताहिक वेतन: मनरेगा में 15 दिन की देरी सामान्य थी। कभी-कभी महीनों देर हो जाती थी। साप्ताहिक भुगतान से तरलता बेहतर होगी।
तीसरा — कृषि को श्रम मिलेगा: किसान लंबे समय से कह रहे थे कि मनरेगा की वजह से फसल के समय मजदूर नहीं मिलते। 60 दिन के विराम से यह समस्या हल होगी।
चौथा — डिजिटल पारदर्शिता: AI धोखाधड़ी पहचान, GPS टैगिंग, बायोमेट्रिक उपस्थिति — इससे नकली मजदूरों की समस्या खत्म होगी।
पाँचवाँ — विकास से जुड़ाव: सिर्फ मिट्टी खोदना नहीं — जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, और राष्ट्रीय अवसंरचना से जुड़े काम होंगे।
विरोध क्यों है — और विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं
मनरेगा के मुख्य वास्तुकार अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने LSE के दक्षिण एशिया ब्लॉग पर जनवरी 2026 में कहा —
"नई योजना एक मजबूत रोजगार गारंटी को केंद्र सरकार के विवेक पर निर्भर केंद्र प्रायोजित योजना से बदल देती है। धारा 5(1) में एक 'विवेक खंड' है जो केंद्र सरकार को यह तय करने का अधिकार देता है कि गारंटी कहाँ और कब लागू होगी। यह रोजगार गारंटी का विचार ही खत्म कर देता है। यह ऐसा है जैसे कहें — 'मैं आपको काम की गारंटी देता हूँ, लेकिन गारंटी लागू होगी या नहीं, यह मैं तय करूँगा।'"
विशेषज्ञों की मुख्य आपत्तियाँ:
पहली आपत्ति — वित्तीय बोझ राज्यों पर: Down to Earth की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र ने अपना कुल बजट ₹95,000 करोड़ पर सीमित कर दिया। इससे ज्यादा खर्च राज्यों को देना होगा। Outlook Business के अनुसार बिहार जैसे कम विकसित राज्यों पर भारी वित्तीय दबाव पड़ेगा। और विडंबना यह है कि जो राज्य सबसे गरीब हैं, जहाँ मनरेगा की सबसे ज्यादा जरूरत है — वही राज्य इसे वहन करने में सबसे कम सक्षम हैं।
दूसरी आपत्ति — माँग आधारित से आपूर्ति आधारित: मनरेगा माँग आधारित थी — जब मजदूर माँगे, तब काम मिले। नई योजना में काम पहले से तय होगा — योजना बनेगी, फिर मजदूर लगेंगे। Cornell University के एक शोधकर्ता ने जनवरी 2026 में लिखा — "महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में जिन महिला मजदूरों से मिला, उनके लिए जॉब कार्ड केवल कागज नहीं — जीवन रेखा है। जब स्थानीय खेती का काम सूख जाता है, तभी वे मनरेगा की तरफ जाती हैं। नई योजना में यह लचीलापन खत्म हो सकता है।"
तीसरी आपत्ति — 60 दिन का कृषि विराम: ज्यां द्रेज ने कहा — "यह प्रावधान भूमिहीन मजदूरों की मोलभाव करने की शक्ति छीन लेता है। जब उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है — फसल के मौसम में — तभी उनका एकमात्र सरकारी विकल्प बंद हो जाएगा। इससे खेत मजदूरी दबी रहेगी।"
चौथी आपत्ति — डिजिटल बहिष्करण: LibTech India की रिपोर्ट दिखा चुकी है कि केवल eKYC की वजह से 11.58 करोड़ मजदूर पिछले साल काम से वंचित रहे। नई योजना GPS टैगिंग, AI निगरानी और बायोमेट्रिक पर और निर्भर है। दूरदराज के गाँवों में नेटवर्क नहीं है — बुजुर्ग और अनपढ़ श्रमिक तकनीक नहीं समझते। क्या यह तकनीक उन्हें और बाहर नहीं करेगी?
पाँचवीं आपत्ति — जल्दबाजी में पारित: NREGA संघर्ष मोर्चा ने कहा — "18 दिसंबर 2025 को दोनों सदनों में एक ही दिन पारित। यह एक ऐसे कानून के लिए जो 14 करोड़ परिवारों को प्रभावित करता है — पर्याप्त विचार-विमर्श के बिना।" तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों ने भी औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई।
ग्रामीण वास्तविकता — असली सवाल क्या है?
सरकारी आँकड़े और विशेषज्ञों की बहस से अलग, जमीन पर क्या हो रहा है?
श्रम ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार ग्रामीण भारत में वास्तविक मजदूरी पिछले 10 वर्षों से लगभग स्थिर है। निर्माण मजदूर 10 साल पहले जितना कमाते थे, आज भी उतना ही कमाते हैं — वास्तविक मूल्यों में।
NSSO के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार भारत का उपभोग असमानता सूचकांक (Gini) 0.29 है — विश्व बैंक के अनुमान 0.25 से अधिक। यानी गाँव और शहर के बीच, अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ रही है।
ऐसे माहौल में मनरेगा जैसी योजना — जो एक guaranteed safety net थी — को बदलना बेहद संवेदनशील निर्णय है।
राजनीतिक आयाम — भाजपा और कांग्रेस क्या कह रहे हैं?
भाजपा का रुख:
मनरेगा को "यूपीए की विफलता" बताना भाजपा का पुराना रुख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने 2015 में इसे "जीवित स्मारक" कहा था। लेकिन 2020 में कोविड संकट में इसी मनरेगा का बजट रिकॉर्ड ₹1.11 लाख करोड़ किया। अब 2026 में उसे खत्म करके नई योजना लाना — यह कहता है कि सरकार अवधारणा को नहीं बल्कि राजनीतिक नामकरण को बदल रही है।
कांग्रेस और विपक्ष का रुख:
कांग्रेस ने इसे "गरीब विरोधी कदम" बताया। राहुल गांधी ने कहा — "मनरेगा यूपीए की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। इसे खत्म करना करोड़ों गरीबों के अधिकार पर हमला है।" लेकिन विरोधाभास यह है कि कांग्रेस ने भी 2005 में इसे उसी तरह "बिना पर्याप्त बहस के" पारित किया था।
क्या नई योजना काम करेगी — शर्तें क्या हैं?
योजना सफल होगी या नहीं — यह केवल कानून पर नहीं, क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
| जरूरी शर्त | अभी की स्थिति |
|---|---|
| गरीब राज्यों को वित्तीय सहायता | अभी स्पष्ट नहीं — बिहार जैसे राज्य चिंतित |
| डिजिटल बाधाएँ दूर हों | अभी 45% मजदूर eKYC नहीं कर पाए |
| 60 दिन के विराम को लचीला बनाना | स्थानीय ग्राम सभा की बजाय राज्य तय करेगा |
| सामाजिक अंकेक्षण मजबूत हो | NREGA संघर्ष मोर्चा की माँग — अभी अनिश्चित |
| 25 दिन अधिक रोजगार वास्तव में मिले | मनरेगा में केवल 9.5% परिवार 100 दिन पूरे कर पाए |
सबसे बड़ा सवाल यह है — अगर मनरेगा में 100 दिन का लक्ष्य केवल 9.5% परिवार पूरा कर पाए, तो 125 दिन का लक्ष्य कितने पूरा करेंगे? बिना क्रियान्वयन सुधार के, अधिक दिनों की गारंटी कागज पर अच्छी लगती है।
जुलाई 2026 तक का रोडमैप — क्या तैयारी है?
केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि संक्रमण सुचारू होगा। 30 जून 2026 तक चल रहे सभी मनरेगा कार्य नई योजना के अंतर्गत जारी रहेंगे। मजदूरों के जॉब कार्ड नए ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड में बदलेंगे। राज्य सरकारों को नियम बनाने की समयसीमा दी गई है।
लेकिन 6 हफ्ते बचे हैं। और देश के दूरदराज के गाँवों में लाखों मजदूर अभी यह नहीं जानते कि 1 जुलाई से क्या बदलने वाला है।
निष्कर्ष: बदलाव जरूरी था — लेकिन इस तरह नहीं
मनरेगा को बदलने की जरूरत थी — इस पर बहुत कम लोग असहमत हैं। 20 साल पुरानी योजना में देरी, भ्रष्टाचार, सीमित दायरा — ये कमियाँ थीं।
VB-G RAM G में कुछ अच्छी बातें हैं — 125 दिन, साप्ताहिक वेतन, बेहतर तकनीकी निगरानी।
लेकिन जो चिंताएँ हैं — वित्तीय बोझ राज्यों पर, माँग आधारित से आपूर्ति आधारित में बदलाव, 60 दिन का विराम, डिजिटल बहिष्करण — ये कागजी चिंताएँ नहीं हैं। ये उन 14 करोड़ परिवारों की असली जिंदगी से जुड़ी हैं।
और सबसे बड़ी चिंता — जल्दबाजी। एक ऐसे कानून को, जो दुनिया के सबसे बड़े रोजगार कार्यक्रम की जगह लेगा, एक ही दिन में दोनों सदनों से पारित कराना — यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अपमान है।
1 जुलाई 2026 आने वाला है। महाराष्ट्र के चंद्रपुर में कुसुम बाई, बिहार के एक गाँव में राम औतार, राजस्थान की एक मजदूर महिला — इन सबकी जिंदगी बदलने वाली है। सवाल यह है कि यह बदलाव बेहतरी की तरफ जाएगा या मुश्किलें बढ़ाएगा।
जवाब 1 जुलाई के बाद मिलेगा। लेकिन जब तक जवाब मिले — 14 करोड़ परिवार इंतजार नहीं कर सकते।
आप क्या सोचते हैं — मनरेगा को बदलना सही था? या सरकार को पहले क्रियान्वयन सुधारना चाहिए था? नीचे टिप्पणी में जरूर बताएं।
स्रोत / Sources:
1. Down to Earth — "MGNREGA to Formally Cease from July 1", May 13, 2026
2. India TV News — "Centre announces new rural employment law; VB-G RAM G Act to replace MGNREGA from July 1", May 11, 2026
3. Devdiscourse — "India Replaces MGNREGA With ₹1.51 Lakh Crore Rural Employment Mission", May 2026
4. LibTech India / NREGA Sangharsh Morcha — Annual MGNREGA Report 2025-26, May 2026
5. LSE South Asia Blog — Jean Drèze interview, "India: Repealing the Employment Guarantee Act", January 19, 2026
6. Cornell University TCI — "From MGNREGA to VB-G Ram G: A Field Researcher's Take", January 2026
7. Outlook Business — "VB-G RAM G Bill vs MGNREGA: Key Differences and Challenges", December 2025
8. NSSO — Household Consumer Expenditure Survey (HCES) 2023-24
9. Ministry of Rural Development — Official Gazette Notification, May 11, 2026
10. ISPP — "G RAM G Act for Viksit Bharat", March 2026

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