मोदी की नई अपील: पेट्रोल-डीजल कम करो, EV अपनाओ — क्या भारत सच में इस बदलाव के लिए तैयार है?

लेखक: आकाश दीप | युगबोध

पेट्रोल आधारित भारत से इलेक्ट्रिक और सौर ऊर्जा आधारित भविष्य की ओर बदलाव को दर्शाता संपादकीय चित्र

पहले सोना, अब पेट्रोल-डीजल: मोदी की अपीलें केवल सलाह नहीं, एक बड़े आर्थिक संकेत हैं

कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से सोना खरीदना कम करने की अपील की थी। उस अपील के पीछे भारत का 40 अरब डॉलर का सालाना gold import bill था। अब एक नई अपील की चर्चा हो रही हैपेट्रोल और डीजल का उपयोग कम करो, Electric Vehicles यानी EV को अपनाओ।

यह अपील सुनने में simple लगती है। लेकिन इसके पीछे जो आर्थिक तस्वीर है, वह बेहद बड़ी है।

Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) के आँकड़ों के अनुसार भारत 2023-24 में लगभग 232 मिलियन टन crude oil import किया, जिस पर करीब 132 अरब डॉलर खर्च हुए। यह भारत के कुल import bill का सबसे बड़ा हिस्सा है। सोने पर जो 40 अरब डॉलर खर्च होते हैं, उससे तीन गुना से भी ज्यादा पैसा केवल तेल आयात पर जाता है।

तो सवाल यह हैअगर भारतीयों ने सच में पेट्रोल-डीजल का उपयोग कम किया और EV की तरफ बढ़े, तो क्या होगा? क्या यह बदलाव realistic है? क्या infrastructure तैयार है? और सबसे बड़ा सवालक्या आम भारतीय इस बदलाव को afford कर सकता है?

भारत और तेल का रिश्ता: यह केवल ईंधन नहीं, अर्थव्यवस्था की नब्ज है

भारत में पेट्रोल और डीजल केवल गाड़ियाँ चलाने का माध्यम नहीं हैं। यह पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ से जुड़े हैं।

किसान की tractor से लेकर truck drivers की रोजी तक, generator से बिजली बनाने से लेकर fishing boats चलाने तक — diesel पर निर्भरता इतनी गहरी है कि अचानक इसे कम करना लाखों लोगों की आजीविका को प्रभावित कर सकता है।

Ministry of Petroleum and Natural Gas के आँकड़ों के अनुसार भारत में 2023-24 में diesel की खपत लगभग 86 मिलियन टन रहीजो total petroleum products consumption का करीब 37 प्रतिशत है। Petrol की खपत लगभग 35 मिलियन टन रही। यानी केवल इन दो fuels पर ही कुल petroleum consumption का आधे से ज्यादा हिस्सा है।

Society of Indian Automobile Manufacturers (SIAM) के आँकड़ों के अनुसार भारत में 2023-24 में कुल 2.38 करोड़ दोपहिया और चार पहिया vehicles बिके। इनमें से अभी भी 90 प्रतिशत से अधिक petrol या diesel से चलते हैं।

यही वजह है कि पेट्रोल-डीजल से EV की तरफ shift करना एक झटके में नहीं हो सकता। यह एक धीमी, systematic और expensive process है।

भारत में EV Revolution: कहाँ पहुँचे हैं हम?

भारत में Electric Vehicles का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी overall market में इसकी हिस्सेदारी सीमित है।

Society of Indian Automobile Manufacturers (SIAM) के अनुसार 2023-24 में भारत में कुल EV sales लगभग 17 लाख units रहीं। इनमें से अधिकांश electric two-wheelers और three-wheelers हैं। Electric cars की संख्या अभी भी कुल car sales का लगभग 2 प्रतिशत है।

सरकार ने FAME-II (Faster Adoption and Manufacturing of Electric Vehicles) scheme के तहत EV adoption को बढ़ावा देने के लिए 10,000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट allocate किया। इस scheme के तहत electric buses, three-wheelers और two-wheelers पर subsidy दी जा रही है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह enough है?

EV के सामने सबसे बड़ी चुनौती: charging infrastructure

EV adoption में सबसे बड़ी बाधा charging infrastructure है। Bureau of Energy Efficiency (BEE) के आँकड़ों के अनुसार मार्च 2024 तक भारत में लगभग 12,000 public EV charging stations थे।

यह संख्या सुनने में ठीक लग सकती है, लेकिन जब इसे perspective में देखें तो तस्वीर साफ होती है। भारत में इस समय लगभग 80,000 से अधिक petrol pumps हैं। यानी charging stations की संख्या petrol pumps का केवल 15 प्रतिशत है।

इसके अलावा जो charging stations हैं, वे ज्यादातर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में हैं। छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण इलाकों में EV charging की सुविधा अभी भी बेहद सीमित है।

भारत जैसे देश में जहाँ लाखों लोग छोटे शहरों और गाँवों में रहते हैं, वहाँ charging infrastructure के बिना EV adoption की बात करना अभी premature लगती है।

EV की कीमत: क्या आम भारतीय afford कर सकता है?

EV adoption में दूसरी बड़ी बाधा कीमत है।

Society of Indian Automobile Manufacturers के आँकड़ों के अनुसार एक entry-level electric car जैसे Tata Punch EV की शुरुआती कीमत लगभग 10-12 लाख रुपये है। वहीं एक similar petrol car 6-8 लाख रुपये में मिल जाती है।

Electric two-wheelers में यह gap कम है। Ola S1X जैसे entry-level electric scooters 80,000-1,00,000 रुपये में मिलते हैं, जबकि petrol scooters 65,000-80,000 रुपये में। लेकिन यहाँ भी range anxiety और charging infrastructure की समस्या है।

World Bank के एक analysis के अनुसार भारत में लगभग 60 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी मासिक आय 15,000 रुपये से कम है। इस income bracket के लिए EV अभी भी एक expensive option है।

यानी EV revolution अभी मुख्यतः urban middle class और upper-middle class तक सीमित है। इसे truly mass movement बनाने के लिए या तो कीमतें काफी कम होनी होंगी, या subsidies बहुत बड़े scale पर देनी होंगी।

अगर भारत पेट्रोल-डीजल आयात कम कर दे तो अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?

PPAC के आँकड़ों के अनुसार भारत का oil import bill 2023-24 में 132 अरब डॉलर था। अगर यह 20-25 प्रतिशत भी कम हो जाए, तो सालाना 25-30 अरब डॉलर की बचत हो सकती है।

इसका सबसे सीधा असर रुपये की स्थिति पर होगा। Dollar के मुकाबले rupee की कमजोरी का एक बड़ा कारण यही है कि हर साल तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में dollars बाहर जाते हैं। तेल import कम होगा तो dollar outflow कम होगा और rupee को कुछ stability मिल सकती है।

दूसरा असर महँगाई पर होगा। तेल की कीमतें कम होने से transportation costs घटेंगी। Transportation costs घटने से vegetables, fruits, groceries — सब चीजों के दाम पर असर पड़ेगा। Reserve Bank of India के अनुमानों के अनुसार तेल की कीमत में 10 dollar प्रति barrel की गिरावट से India की inflation लगभग 0.3-0.4 प्रतिशत कम हो सकती है।

तीसरा असर Current Account Deficit पर होगा। RBI के अनुसार oil import भारत के current account deficit का सबसे बड़ा कारण है। Import कम होगा तो deficit कम होगा।

क्या EV से पेट्रोल-डीजल companies और workers को नुकसान होगा?

यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है जिसे अक्सर ignore किया जाता है।

Petroleum sector में IOCL, BPCL, HPCL जैसी सरकारी companies के साथ लाखों petrol pump dealers, mechanics, service station workers और oil-related industries के लोग जुड़े हैं।

Confederation of All India Traders (CAIT) के अनुसार भारत में petrol pump retail network से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार की संख्या 20 लाख से अधिक है।

अगर EV adoption तेज हुई, तो यह transition करोड़ों रुपये के infrastructure और लाखों jobs को disrupt कर सकती है। Government को इसके लिए re-skilling programs और alternative livelihood plans तैयार करने होंगे। यही कारण है कि EV transition को aggressive pace पर push करना economically risky भी हो सकता है। इसे phased और well-planned manner में करना होगा।

भारत में EV के लिए बिजली कहाँ से आएगी?

EV का एक बड़ा सवाल जो कम discuss होता है वह यह है कि अगर करोड़ों EVs charge होंगी, तो बिजली कहाँ से आएगी?

Central Electricity Authority (CEA) के अनुसार भारत की total installed power capacity 2024 में लगभग 920 GW हो गई। इसमें से renewable energy की हिस्सेदारी लगभग 43 प्रतिशत है।

लेकिन अभी भी भारत के कई हिस्सों में power cuts आम हैं। खासकर गर्मियों में peak demand के दौरान कई राज्यों में बिजली की भारी कमी होती है।

Ministry of New and Renewable Energy के अनुसार अगर 2030 तक भारत की 30 प्रतिशत vehicles electric हो जाएं, तो देश की total electricity demand में 15-20 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।

यानी EV revolution के साथ-साथ power sector में भी massive investment करनी होगीखासकर renewable energy में।

नई पीढ़ी और EV: एक बदलती मानसिकता

शहरी युवाओं में EV को लेकर enthusiasm साफ दिखाई देता है। Ola Electric, Tata Motors, और Ather Energy के products को लेकर जो excitement है, वह दिखाती है कि attitude बदल रहा है।

JMK Research के अनुसार 2024 में India में electric two-wheelers की sales ने 10 लाख units का milestone पार कियाजो 2020 की तुलना में 5 गुना से अधिक है।

Bengaluru, Delhi, Mumbai और Pune जैसे शहरों में EV adoption सबसे तेज है। इन शहरों में petrol की high cost, traffic congestion और pollution awareness ने EV को attractive बना दिया है।

लेकिन यह enthusiasm अभी ज्यादातर urban educated youth तक सीमित है। Rural India और small towns में EV को लेकर awareness और adoption दोनों अभी कम हैं।

सरकार की EV Policy: कहाँ तक पहुँचे हैं?

भारत सरकार ने 2030 तक कुल vehicle sales में 30 प्रतिशत EV penetration का लक्ष्य रखा है।

इसके लिए FAME-II scheme के अलावा Production Linked Incentive (PLI) scheme के तहत EV manufacturing को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। PLI scheme में EV sector के लिए लगभग 26,058 करोड़ रुपये का incentive रखा गया है।

इसके अलावा import duty में बदलाव और Tesla जैसी global EV companies को India में manufacturing के लिए attract करने की कोशिश हो रही है।

लेकिन experts का मानना है कि 2030 का 30 प्रतिशत target ambitious है। अगर current pace पर रहे तो 2030 तक 15-20 प्रतिशत EV penetration realistic लग सकती है।

निष्कर्ष: पेट्रोल-डीजल से EV की तरफ जाना जरूरी है, लेकिन यह रातोरात नहीं होगा

अगर भारत सच में पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करे और EV को बड़े पैमाने पर अपनाए, तो उसका असर 132 अरब डॉलर के import bill से लेकर रुपये की strength, inflation, pollution और लाखों लोगों के रोजगार तक दिखाई देगा।

लेकिन यह transition easy नहीं है। Charging infrastructure, electricity supply, कीमत, rural reach और रोजगार displacement — ये सभी बड़ी चुनौतियाँ हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता।

मोदी की अपील सही दिशा में है। लेकिन अपील से बदलाव नहीं होताबदलाव होता है जब infrastructure ready हो, कीमतें accessible हों और आम नागरिक के लिए यह switch financially beneficial हो।

तब तक हर नागरिक अपने स्तर पर छोटे कदम उठा सकता है — unnecessary trips कम करना, public transport का उपयोग बढ़ाना, carpooling करना और EV two-wheelers की तरफ gradually shift करना।

आप क्या सोचते हैंक्या भारत 2030 तक EV revolution के लिए सच में तैयार है? क्या आपने EV खरीदने के बारे में सोचा है? नीचे comment में अपनी राय जरूर बताएं।

 

स्रोत / Sources:

1. Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) - India Oil Import Data 2023-24

2. Ministry of Petroleum and Natural Gas - Petroleum Consumption Statistics

3. Society of Indian Automobile Manufacturers (SIAM) - EV Sales Data 2023-24

4. Bureau of Energy Efficiency (BEE) - EV Charging Infrastructure Report

5. Central Electricity Authority (CEA) - Power Capacity Report 2024

6. Ministry of New and Renewable Energy - EV Power Demand Projection

7. JMK Research - India EV Market Report 2024

8. Reserve Bank of India - Current Account Deficit Analysis

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