ISRO 2004-2026: UPA बनाम Modi काल का पूरा तुलनात्मक विश्लेषण
लेखक: आकाश दीप | युगबोध
"पैसे नहीं हैं" से "दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी space startup ecosystem" तक
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की कहानी हमेशा से "कम पैसे में ज़्यादा काम" की कहानी रही है Mangalyaan को Hollywood की फिल्म "Gravity" से भी कम बजट में बनाना, या Chandrayaan-3 को Russia के Luna-25 से ढाई गुना कम खर्च में पूरा करना। लेकिन असली सवाल बजट की मात्रा नहीं, बल्कि यह है पिछले 22 सालों में, दो अलग-अलग दौर की सरकारों में, ISRO को किस तरह का institutional और नीतिगत समर्थन मिला, और उसका असर मिशनों की संख्या, गति, और scope पर कैसे पड़ा?
आज हम बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के, सिर्फ तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर, 2004-2014 (UPA/Congress काल) और 2014-2026 (NDA/Modi काल) के दो दशकों में ISRO के काम की विस्तृत तुलना करेंगे — मिशनों की संख्या से लेकर बजट, नीतिगत सुधारों, और private sector की भागीदारी तक।
2004-2014 — UPA काल में ISRO की उपलब्धियां
इस दशक को समझने के लिए एक बात स्पष्ट करनी ज़रूरी है — यह दौर पूरी तरह "उपलब्धिहीन" नहीं था। इसी दशक में भारत ने अपनी पहली Moon mission और पहली Mars mission — दोनों में सफलता हासिल की, जो निस्संदेह ऐतिहासिक थीं।
| वर्ष | मिशन / उपलब्धि |
|---|---|
| 2008 | Chandrayaan-1 लॉन्च — भारत की पहली चंद्र मिशन। इसने चांद पर पानी के अणुओं की खोज की, जो एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि थी। इस project को सैद्धांतिक मंज़ूरी 2003 में (Vajpayee सरकार के दौरान) मिली थी। |
| 2013 (नवंबर) | Mars Orbiter Mission (Mangalyaan) लॉन्च — भारत की पहली अंतरग्रहीय (interplanetary) मिशन। सिर्फ $74 मिलियन (करीब ₹450 करोड़) की लागत से — NASA के समकक्ष MAVEN मिशन ($671 मिलियन) से लगभग 9 गुना सस्ता। |
| 2014 (24 सितंबर) | Mangalyaan ने Mars की कक्षा में प्रवेश किया — भारत दुनिया का पहला देश बना जिसने अपने पहले ही प्रयास में Mars mission में सफलता हासिल की। यह घटना तकनीकी रूप से Modi सरकार के कार्यकाल में हुई (मई 2014 में सरकार बदल चुकी थी), लेकिन mission की पूरी योजना, funding approval, और launch, UPA सरकार के दौरान हुए थे। |
| 2008 (मंज़ूरी) | Chandrayaan-2 project को तत्कालीन प्रधानमंत्री Manmohan Singh ने मंज़ूरी दी — हालांकि इसका असली launch 2019 में (Modi सरकार के दौरान) हुआ। |
बजट और संसाधनों की स्थिति — "पैसे नहीं हैं" वाली छवि कहां से आई
2011 में भारत का पूरा space budget सिर्फ ₹5,778 करोड़ (लगभग $1.26 बिलियन) था — जो उस समय दुनिया में छठे स्थान पर था, और भारत के GDP का सिर्फ 0.14% था। यह उस दौर में एक व्यापक रूप से प्रचलित सोच बन गई थी — कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए space program को "luxury" कहा जाता था, और अक्सर सवाल उठाया जाता था कि "गरीब देश में rocket science पर पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है, जबकि बुनियादी ज़रूरतों के लिए पैसे की कमी है।"
Human Spaceflight Programme (जो आगे चलकर Gaganyaan बना) के लिए 2008-09 में सिर्फ ₹42 करोड़ का बजट allocation था — जो Chandrayaan-1 की सफलता के बाद बढ़ाकर ₹230 करोड़ किया गया, लेकिन उस समय ISRO ने जो ₹12,000 करोड़ का पूरा प्रस्ताव सरकार को दिया था, उसकी तुलना में यह अभी भी शुरुआती चरण ही था — और उस दशक में human spaceflight programme launch नहीं हो सका।
क्या नहीं हुआ इस दशक में — Private Sector पूरी तरह बाहर
शायद इस दशक की सबसे बड़ी सीमा यह थी — space sector पूरी तरह से ISRO और सरकार के हाथों में केंद्रित था। 2014 में भारत में सिर्फ एक (1) registered space startup था। कोई private company किसी satellite या launch vehicle को स्वतंत्र रूप से design, build, या launch नहीं कर सकती थी — यह क्षेत्र पूरी तरह एक सरकारी एकाधिकार (monopoly) था।
2014-2026 — Modi काल में ISRO का विस्तार
इस 12 साल के दौर को सिर्फ मिशनों की संख्या से नहीं, बल्कि चार अलग-अलग dimensions से समझना ज़रूरी है — मिशन उपलब्धियां, बजट वृद्धि, नीतिगत सुधार, और private sector का विस्फोटक विस्तार।
प्रमुख मिशन — साल-दर-साल
| वर्ष | मिशन / उपलब्धि |
|---|---|
| 2015 | AstroSat — भारत का पहला multi-wavelength space observatory, जो black holes और दूर की galaxies का अध्ययन करता है। |
| 2017 (फरवरी) | PSLV-C37 — एक ही मिशन में 104 satellites launch करके world record बनाया, जिसमें ज़्यादातर विदेशी satellites थे। |
| 2019 | Chandrayaan-2 launch — orbiter सफल रहा (आज 2026 तक भी काम कर रहा है), लेकिन Vikram lander crash हो गया। यह एक आंशिक सफलता थी, लेकिन इसने अगले प्रयास की नींव रखी। |
| 2023 (अगस्त) | 🔴 Chandrayaan-3 — भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) के पास सफलतापूर्वक soft-landing करने वाला दुनिया का पहला देश बना, और सिर्फ चौथा देश जिसने किसी भी तरह से चांद पर soft-landing की। इसी दिन (23 अगस्त) को अब National Space Day के रूप में मनाया जाता है। लागत — सिर्फ $75 मिलियन। |
| 2023 (सितंबर) | Aditya-L1 — भारत की पहली सौर (solar) मिशन, जो सूरज-पृथ्वी L1 Lagrange Point पर 15 लाख किलोमीटर दूर पहुंची। |
| 2024 | XPoSat — भारत की पहली X-ray Polarimeter Satellite, जो black holes और neutron stars का अध्ययन करती है। |
| 2025 (जनवरी) | SpaDeX — दो satellites की सफल docking, भारत को Russia, USA, China के बाद दुनिया का चौथा देश बनाया जिसने यह advanced docking technology हासिल की। |
| 2025 (जून-जुलाई) | Wg Cdr Shubhanshu Shukla Axiom-4 मिशन पर ISS गए — 1984 के बाद Rakesh Sharma के बाद दूसरे भारतीय अंतरिक्ष यात्री, और ISS पर जाने वाले पहले भारतीय। |
| 2026 (लक्ष्य) | Gaganyaan-1 — मानव रहित (uncrewed) test flight, जिसमें रोबोट Vyommitra उड़ान भरेगा। दिसंबर 2025 तक 80% tests (लगभग 7,700 में से) पूरे हो चुके थे। |
| 2027 (लक्ष्य) | Gaganyaan-H1 — पहली crewed मानव अंतरिक्ष उड़ान, जिससे भारत USA, Russia, China के बाद दुनिया का चौथा देश बनेगा जो स्वतंत्र रूप से इंसानों को अंतरिक्ष में भेज सकता है। |
कुल मिलाकर, ISRO अब तक 133 spacecraft missions और 104 launch missions पूरे कर चुका है, साथ ही 434 विदेशी satellites भी launch कर चुका है — इनमें से बड़ा हिस्सा 2014 के बाद के 12 सालों में जुड़ा है।
बजट में वृद्धि — आंकड़े खुद बोलते हैं
| वर्ष | Department of Space बजट |
|---|---|
| 2011 (UPA) | ₹5,778 करोड़ (~$1.26 बिलियन) — दुनिया में 6वें स्थान पर, GDP का 0.14% |
| 2018-19 | ₹11,200 करोड़ (Revised Estimate) |
| 2019-20 | ₹12,473.26 करोड़ (Budget Estimate) |
| 2024-25 | ₹11,725.75 करोड़ (Revised Estimate) |
| 2025-26 | ₹13,416.20 करोड़ — पिछले साल से लगभग 14-15% की सीधी वृद्धि, जिसमें ₹6,455.99 करोड़ revenue head के लिए और ₹6,059.01 करोड़ capital acquisitions के लिए। |
इस बजट वृद्धि के पीछे एक ठोस वजह भी है — हाल ही में Cabinet ने कई बड़े-बड़े मिशनों को मंज़ूरी दी है, जिनमें Chandrayaan-4, Venus Orbiter Mission, Next Generation Launch Vehicle (NGLV), और Sriharikota में एक तीसरा launch pad बनाना शामिल है — यानी बजट सिर्फ आंकड़ों में नहीं बढ़ा, बल्कि उसके पीछे एक स्पष्ट, महत्वाकांक्षी roadmap भी है।
🔴 सबसे बड़ा फर्क — Private Sector के लिए दरवाज़े खुलना
अगर 2004-2014 और 2014-2026 के बीच सबसे बड़ा structural फर्क खोजना हो, तो वह है space sector का सरकारी एकाधिकार टूटना। यह वह बदलाव है जो सिर्फ मिशनों की गिनती से नहीं, बल्कि एक पूरी नई इंडस्ट्री के जन्म से समझा जा सकता है।
| तारीख | नीतिगत बदलाव |
|---|---|
| मई 2020 | वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने घोषणा की कि space sector — जो पहले पूरी तरह ISRO का domain था — अब private participation के लिए खोला जाएगा। |
| 2020 (आगे) | Indian National Space Promotion and Authorisation Centre (IN-SPACe) की स्थापना — एक single-window regulatory body, जो non-governmental space entities को approve और supervise करती है। |
| अप्रैल 2023 | Indian Space Policy 2023 लागू — इसने पूरी space value chain (launch vehicles, satellite manufacturing, applications, downstream services) को private players के लिए खोल दिया। |
| अक्टूबर 2024 | सरकार ने IN-SPACe के तहत ₹1,000 करोड़ का venture capital fund मंज़ूर किया — space startups की funding ज़रूरतों को पूरा करने के लिए। |
| फरवरी 2026 | ₹500 करोड़ के Technology Adoption Fund की योजना — startups को आगे बढ़ाने के लिए। |
| जुलाई 2026 | Skyroot Aerospace का Vikram-1 — भारत की पहली private company द्वारा बनाई गई rocket ने 450 km की कक्षा में सफलतापूर्वक 4 payloads पहुंचाए। यह भारत को USA और China के बाद दुनिया का तीसरा देश बनाता है जहां किसी private company ने (सरकारी agency नहीं) orbital launch हासिल किया हो। |
1 Startup से 400+ Startups तक — 12 साल का चमत्कार
यह आंकड़ा शायद इस पूरी तुलना का सबसे स्पष्ट संकेतक है — 2014 में भारत में सिर्फ 1 registered space startup था। 2026 की शुरुआत तक यह संख्या 400 से ज़्यादा हो चुकी थी, जिसमें sector में कुल निवेश $500 मिलियन को पार कर चुका है — अकेले 2025 में लगभग $150 मिलियन जुटाए गए।
IN-SPACe के Technical Director Rajesh Jothi के अनुसार — "भारत मुश्किल से पांच-छह space startup companies से बढ़कर आज 400 से ज़्यादा तक पहुंच चुका है, जो 2020 के सरकारी space reforms से प्रेरित है।"
| Space Startup Ecosystem — 2026 के आंकड़े | विवरण |
|---|---|
| कुल Startups | 400+ (Economic Survey 2026 के अनुसार 300+) |
| कुल निवेश | $500 मिलियन से ज़्यादा |
| पहला Space Unicorn | Skyroot Aerospace — $1.1 बिलियन valuation, कुल $160 मिलियन जुटाए |
| Direct Jobs | लगभग 22,000, साथ ही 45,000+ लोग adjacent industries में |
| Economic Multiplier | हर $1 निवेश पर $2.54 का return — broader industry average से 2.5 गुना ज़्यादा productive |
| प्रमुख Startups | Skyroot Aerospace, Agnikul Cosmos, Pixxel |
एक बेहद दिलचस्प तथ्य — Skyroot Aerospace की स्थापना 2018 में दो पूर्व ISRO वैज्ञानिकों, Pawan Kumar Chandana और Naga Bharath Daka ने की थी। यह दिखाता है कि ISRO सिर्फ अपने मिशनों तक सीमित नहीं रहा — बल्कि उसने वह talent pool भी तैयार किया, जिसने आगे चलकर एक पूरी नई private industry को जन्म दिया। यहां तक कि Skyroot के पहले rocket का solid motor भी ISRO की Sriharikota facility में ही cast और test हुआ था — यानी ISRO ने खुद को competitor नहीं, बल्कि enabler और catalyst के रूप में redefine किया।
Side-by-Side Comparison — दोनों दशकों को एक साथ देखें
| पहलू | 2004-2014 (UPA) | 2014-2026 (NDA) |
|---|---|---|
| प्रमुख Lunar/Mars Missions | Chandrayaan-1 (2008), Mangalyaan (2013-14) | Chandrayaan-2 (2019), Chandrayaan-3 (2023, South Pole landing), Chandrayaan-4 approved |
| Human Spaceflight | सिर्फ प्रस्ताव स्तर पर (₹12,000 करोड़ का plan submit हुआ, launch नहीं हुआ) | Gaganyaan कार्यक्रम सक्रिय, 2026 में uncrewed test, 2027 में crewed launch लक्षित; Axiom-4 पर astronaut ISS भेजा गया |
| Solar Mission | कोई नहीं | Aditya-L1 (2023) — सफलतापूर्वक L1 Point पर स्थापित |
| Docking Technology | कोई नहीं | SpaDeX (2025) — दुनिया का चौथा देश बना |
| Space Budget (सांकेतिक) | ₹5,778 करोड़ (2011) | ₹13,416.20 करोड़ (2025-26) — लगभग 2.3 गुना वृद्धि |
| Private Sector Participation | पूरी तरह प्रतिबंधित — सिर्फ ISRO का एकाधिकार | 2020 में सेक्टर खोला गया, IN-SPACe बना, Indian Space Policy 2023 लागू |
| Space Startups | 1 (2014 तक) | 400+ (2026 तक) |
| Private Orbital Launch | असंभव — कानूनी रूप से अनुमति नहीं थी | Skyroot का Vikram-1 (जुलाई 2026) — भारत तीसरा देश जहां private orbital launch हुआ |
| Record Satellite Launch | कोई world record नहीं | PSLV-C37 (2017) — एक मिशन में 104 satellites, world record |
एक निष्पक्ष नज़रिया — क्या 2004-2014 सच में "बेकार" दशक था?
ईमानदार विश्लेषण के लिए यह कहना ग़लत होगा कि UPA दौर में ISRO ने कुछ नहीं किया। Chandrayaan-1 की पानी की खोज और Mangalyaan की पहले-प्रयास-में Mars सफलता — दोनों वाकई ऐतिहासिक उपलब्धियां थीं, जिन्होंने दुनिया भर में भारत की वैज्ञानिक क्षमता को नई पहचान दी। यहां तक कि Congress पार्टी ने खुद भी 2019 में Chandrayaan-2 की सफलता पर बधाई देते हुए Manmohan Singh द्वारा 2008 में परियोजना को मंज़ूरी देने का श्रेय भी लिया था।
लेकिन जो फर्क साफ नज़र आता है, वह है scope और गति का। UPA दशक में मुख्यतः दो बड़े मिशन (Chandrayaan-1, Mangalyaan) थे, जबकि 2014-2026 के दौर में missions की संख्या, विविधता (solar, docking, human spaceflight), और सबसे महत्वपूर्ण — private sector का पूर्ण रूप से खुलना — यह एक structural transformation है, न कि सिर्फ "ज़्यादा rockets लॉन्च होना"।
"पैसे नहीं हैं" वाली सोच, जो 2004-2014 के दौर में एक आम धारणा थी, आज बदल चुकी है — अब भारत का narrative सिर्फ "cost-effective space missions" तक सीमित नहीं, बल्कि "global space economy में एक commercial player बनने" तक पहुंच चुका है, जहां private companies खुद अपने rockets बना और launch कर रही हैं।
महत्वपूर्ण Technology Developments
ईमानदार होने के लिए, कुछ और महत्वपूर्ण technological achievements भी हैं जिन्हें इस तुलना में शामिल करना ज़रूरी है — यह सिर्फ बड़े मिशनों तक सीमित कहानी नहीं है।
NavIC — भारत का अपना GPS सिस्टम
Indian Regional Navigation Satellite System (IRNSS), जिसे NavIC कहा जाता है, भारत और उसके आसपास के लगभग 1,500 किलोमीटर के क्षेत्र में सटीक Position, Velocity, और Timing (PVT) सेवाएं देता है — यानी भारत का अपना, अमेरिका के GPS पर निर्भर न रहने वाला navigation system। 28 जनवरी 2025 को GSLV F-15 ने NVS-02 satellite को launch करके ISRO का 100वां launch (Sriharikota से) पूरा किया — जो second-generation NavIC system का हिस्सा है। दिलचस्प बात यह भी है कि Pushpak reusable vehicle के landing tests में भी NavIC receiver का इस्तेमाल हुआ — यानी यह सिर्फ एक standalone उपलब्धि नहीं, बल्कि बाकी missions के लिए एक foundational technology भी बन चुकी है।
Reusable Launch Vehicle "Pushpak" — भारत की Reusability की तरफ पहला कदम
यह project SpaceX जैसी companies की reusable rocket technology को टक्कर देने की भारत की कोशिश है। इसकी timeline बेहद व्यवस्थित रही:
| Test | तारीख | परिणाम |
|---|---|---|
| HEX-01 | मई 2016 | Hypersonic suborbital flight — Bay of Bengal में उतरा (recover नहीं हुआ) |
| LEX-01 | अप्रैल 2023 | पहली autonomous runway landing — Chitradurga, Karnataka |
| LEX-02 | मार्च 2024 | Cross-range और down-range correction सफल |
| LEX-03 | जून 2024 | सबसे कठिन conditions में सफलता — वही vehicle बिना किसी बदलाव के दोबारा इस्तेमाल हुआ, यानी reusability directly साबित हुई। 4.5 किमी की ऊंचाई से Chinook helicopter द्वारा छोड़ा गया, 320+ km/h की रफ्तार से autonomous landing। |
अगला चरण है Orbital Re-entry Experiment (ORE) — जिसमें एक wing-body vehicle को असल में कक्षा में भेजा जाएगा, फिर वापस धरती पर runway पर उतारा जाएगा। इसमें सफलता मिलने पर भारत USA और China के बाद दुनिया का तीसरा देश बन जाएगा जिसने पूर्ण orbital re-entry और runway landing का प्रदर्शन किया हो।
Next Generation Launch Vehicle (NGLV) — Bharatiya Antariksh Station और चांद पर इंसान भेजने की तैयारी
18 सितंबर 2024 को Union Cabinet ने Next Generation Launch Vehicle (NGLV) के विकास को मंज़ूरी दी — यह मौजूदा LVM3 से 3 गुना ज़्यादा payload capacity (Low Earth Orbit तक 30 टन तक) रखने वाला होगा, सिर्फ 1.5 गुना ज़्यादा लागत पर, और यह reusable भी होगा। इस vehicle का मकसद सिर्फ satellites भेजना नहीं — बल्कि दो बड़े दीर्घकालिक लक्ष्यों को साकार करना है: Bharatiya Antariksh Station (भारत का अपना space station) स्थापित करना, और 2040 तक चांद पर भारतीय अंतरिक्ष यात्री भेजना।
NewSpace India Limited (NSIL) — 2019 में बना commercial arm
2019 में स्थापित NSIL, ISRO का commercial arm है जो commercial satellite launches, transponder leasing, satellite manufacturing, और consultancy services संभालता है। हाल ही में NSIL ने भारतीय industry partners को LVM-3 rockets को PPP (Public-Private Partnership) framework के तहत बड़े पैमाने पर बनाने के लिए आमंत्रित किया है — यानी अब सिर्फ ISRO ही rockets नहीं बनाएगा, बल्कि private कंपनियां भी सरकारी launch vehicles के production में भागीदार बनेंगी।
100% FDI — Foreign Investment के लिए भी दरवाज़े खुले
2024 में Foreign Direct Investment (FDI) नीति में संशोधन करके satellite manufacturing, satellite data products, और ground/user segments में 100% FDI की अनुमति दी गई — जिसमें से 74% तक automatic route से (बिना सरकारी अनुमति के) और उससे ज़्यादा के लिए सरकारी मंज़ूरी के साथ। यह कदम global investors को सीधे भारत के space sector में निवेश करने का रास्ता खोलता है — जो 2004-2014 के दौर में सोचा भी नहीं जा सकता था, क्योंकि उस समय पूरा sector विदेशी निवेश के लिए बंद था।
100वां Launch — एक Symbolic Milestone
28-29 जनवरी 2025 को ISRO ने Sriharikota से अपना 100वां launch पूरा किया — GSLV F-15 के ज़रिए NVS-02 navigation satellite को कक्षा में भेजकर। यह GSLV की indigenous cryogenic stage वाली 8वीं operational उड़ान भी थी — यानी वह तकनीक जिसे भारत ने वर्षों की मेहनत के बाद पूरी तरह स्वदेशी बनाया।
निष्कर्ष — Space Program सिर्फ Rockets की कहानी नहीं, Institutional Change की कहानी है
यह तुलना सिर्फ यह गिनने की नहीं है कि किस दशक में ज़्यादा satellites launch हुए। असली फर्क इस बात में है — क्या space sector सिर्फ एक सरकारी विभाग बनकर रह गया, या उसने एक पूरी नई इंडस्ट्री, एक नई पीढ़ी के entrepreneurs, और एक नई commercial economy को जन्म दिया।
2004-2014 में ISRO ने साबित किया कि भारत कम बजट में बड़े काम कर सकता है। 2014-2026 में ISRO ने यह साबित किया कि वह सिर्फ खुद बड़े काम नहीं करेगा, बल्कि दूसरों को भी बड़े काम करने का मौका देगा। Chandrayaan-3 की South Pole landing से लेकर Skyroot के private orbital launch तक — यह यात्रा सिर्फ ISRO के विस्तार की नहीं, बल्कि पूरे भारतीय space ecosystem के लोकतंत्रीकरण (democratization) की कहानी है।
आपको इस तुलना में सबसे ज़्यादा दिलचस्प क्या लगा — Chandrayaan-3 की South Pole landing, या Private Sector का 1 से 400+ startups तक का सफर? नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताएं।

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