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Kishau Dam Project: 60 साल बाद बनी सहमति, पूरी जानकारी

लेखक: आकाश दीप | युगबोध

Kishau Dam Project को दर्शाता इन्फोग्राफिक — Tons नदी पर बनने वाला भारत का दूसरा सबसे ऊंचा बांध, 6 राज्यों की सहमति

1963 में देखा गया एक सपना, जो 6 दशक बाद जाकर आखिरकार कागज़ से ज़मीन की तरफ बढ़ा

कभी-कभी किसी परियोजना की उम्र, उसके बनने में लगने वाले समय से भी लंबी हो जाती है। Kishau Dam एक ऐसी ही परियोजना है जिसका विचार पहली बार 1963 में आया था, यानी आज से करीब 62 साल पहले। तब से यह परियोजना बार-बार खारिज होती रही, अटकती रही, कभी seismic (भूकंपीय) सुरक्षा को लेकर सवाल उठे, कभी आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) पर, और कभी राज्यों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर झगड़े होते रहे।

और फिर, 16 सितंबर 2026 को, केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah की मौजूदगी में, Uttar Pradesh, Uttarakhand, Himachal Pradesh, Rajasthan, Delhi, और Haryana छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने एक साथ बैठकर इस पर औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। छह दशकों का इंतज़ार, आखिरकार एक ठोस समझौते में बदल गया।

आज हम इस पूरी परियोजना को हर एक पहलू से, बिना कुछ छोड़े समझेंगे: यह क्या है, कहां बनेगा, कितना बड़ा होगा, इसमें इतनी देर क्यों लगी, इसका फायदा किसे मिलेगा, और इसके पीछे की चिंताएं और विवाद क्या हैं।

Kishau Dam — एक नज़र में सब कुछ

Key Facts विवरण
नदी Tons River — यमुना नदी की सबसे बड़ी सहायक नदियों में से एक
स्थान Uttarakhand के Dehradun ज़िले और Himachal Pradesh के Sirmaur ज़िले की सीमा पर
बांध की ऊंचाई 232.6 से 236 मीटर (अलग-अलग स्रोतों में थोड़ा अंतर, क्योंकि design में बदलाव होते रहे हैं)
बांध का प्रकार Concrete Gravity Dam (कंक्रीट गुरुत्वाकर्षण बांध)
भारत में स्थान (ऊंचाई के हिसाब से) दूसरा सबसे ऊंचा बांध — सिर्फ Tehri Dam (260.5 मीटर) के बाद
Installed Capacity 660 MW (4 x 165 MW Francis-type टर्बाइन)
Live Storage Capacity लगभग 1,324 से 1,562 Million Cubic Metres (MCM)
सिंचाई क्षमता लगभग 97,000 हेक्टेयर
पीने के पानी की आपूर्ति सालाना 517 Million Cubic Metres — Delhi, Rajasthan, Haryana को
कुल परियोजना लागत लगभग ₹11,500 करोड़ (2018 के अनुमान अनुसार)
पूरा होने का अनुमानित साल 2028 (मई 2025 के अनुमान अनुसार)
लाभार्थी राज्य Delhi, Uttar Pradesh, Rajasthan, Haryana, Uttarakhand, Himachal Pradesh — कुल 6 राज्य

यह बांध बनता कहां है, और यह "multipurpose" क्यों कहलाता है

Kishau Dam का निर्माण स्थल दो districts में फैला है Uttarakhand की तरफ Dehradun ज़िला (Jaunsar-Bawar क्षेत्र), और Himachal Pradesh की तरफ Sirmaur ज़िला। यह Dehradun से करीब 70 किलोमीटर दूर, Tiyuni कस्बे के रास्ते पर स्थित है जो dam backwaters का zero point है।

इसे "multipurpose" (बहुउद्देश्यीय) परियोजना इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह एक साथ तीन बड़े काम करेगा:

उद्देश्य विवरण
1. बिजली उत्पादन (Power) 660 MW की hydroelectric क्षमता — यह छह राज्यों के बीच बांटी जाएगी
2. सिंचाई (Irrigation) करीब 97,000 हेक्टेयर खेतों को सिंचाई का पानी मिलेगा
3. पेयजल आपूर्ति (Drinking Water) Delhi, Rajasthan, Haryana जैसे पानी की कमी वाले राज्यों को सालाना 517 MCM पानी

🔴 60 साल की देरी — असली वजहें, विस्तार से

यह समझना बेहद ज़रूरी है कि आखिर क्यों एक परियोजना, जिसकी कल्पना 1963 में हुई थी, 2026 तक यानी छह दशक तक सिर्फ कागज़ों में अटकी रही।

देरी की वजह विवरण
Seismic Safety (भूकंपीय सुरक्षा) यह क्षेत्र एक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र (active seismic zone) में स्थित है — Himalayan region में इतना ऊंचा (236 मीटर) बांध बनाना, इंजीनियरिंग की दृष्टि से बेहद संवेदनशील और जोखिम भरा माना जाता रहा है
आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability) का अभाव दशकों तक विशेषज्ञों ने इस परियोजना की लागत-फायदे (cost-benefit) की गणना पर सवाल उठाए — क्या इतनी भारी लागत ($11,500 करोड़) के मुकाबले इसका फायदा उतना ही बड़ा होगा
अंतरराज्यीय जल-बंटवारा विवाद Uttarakhand, Himachal Pradesh, Rajasthan, Delhi जैसे राज्यों के बीच पानी और बिजली के हिस्से को लेकर लगातार असहमति बनी रही — ठीक वैसे ही जैसे हमने अपने पिछले "Sone River" वाले article में बिहार-झारखंड के बीच देखा था
Site Selection में बदलाव मूल रूप से चुनी गई जगह (Kishau गांव के पास) निर्माण के लिए अनुपयुक्त (unsuitable) पाई गई, जिसके बाद site को Himachal की तरफ 15 किलोमीटर दूर, Vaas नामक जगह पर स्थानांतरित करना पड़ा
Environmental Clearance में देरी Ministry of Environment and Forests की मंज़ूरी सिर्फ 2018 में जाकर मिली — यानी विचार आने के 55 साल बाद

पूरी Timeline — 1963 से 2026 तक

वर्ष घटना
1963 Kishau Dam का सबसे पहला विचार सामने आया
1994 Upper Yamuna Basin के जल-बंटवारे को लेकर एक अंतरराज्यीय समझौता हुआ, जो आज भी इस परियोजना का मूल आधार (guiding formula) माना जाता है
2013 केंद्र सरकार ने परियोजना लागत का 90% वहन करने का फैसला किया, जिससे इसे एक बड़ा बढ़ावा मिला
2015 निर्माण शुरू होने की मूल समयसीमा थी, लेकिन राज्यों के बीच बातचीत की वजह से यह टल गया
2017 Uttarakhand और Himachal Pradesh सरकारों ने मिलकर Kishau Corporation Limited नाम की एक joint-venture कंपनी बनाई
2018 Ministry of Environment and Forests से मंज़ूरी मिली
2022-2024 परियोजना फिर से 50+ साल पुराने सवालों (seismic safety, viability) के साथ चर्चा में आई; एक नई Detailed Project Report (DPR) की उम्मीद जताई गई
जून 2026 Kishau परियोजना पर औपचारिक सहमति बनी — power component की ₹2,000 करोड़ की लागत को लेकर केंद्र और लाभार्थी राज्यों के बीच 8 साल का गतिरोध (deadlock) खत्म हुआ
16 सितंबर 2026 Amit Shah की मौजूदगी में, छह मुख्यमंत्रियों ने औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए

🔴 16 सितंबर 2026 की Signing Ceremony — किसने क्या कहा

मौजूद नेता भूमिका
Amit Shah केंद्रीय गृह मंत्री — मुख्य अतिथि, समझौते की अध्यक्षता
C.R. Patil केंद्रीय जल शक्ति मंत्री
Yogi Adityanath मुख्यमंत्री, Uttar Pradesh
Pushkar Singh Dhami मुख्यमंत्री, Uttarakhand
Sukhvinder Singh Sukhu मुख्यमंत्री, Himachal Pradesh
Bhajanlal Sharma मुख्यमंत्री, Rajasthan
Rekha Gupta मुख्यमंत्री, Delhi
Nayab Singh Saini मुख्यमंत्री, Haryana

Amit Shah का बयान — "दसवां जल-विवाद जो सुलझने जा रहा है"

Amit Shah ने कहा कि यह समझौता सभी छह राज्यों को किसी-न-किसी तरीके से फायदा पहुंचाएगा, और मुख्यमंत्रियों व मंत्री Patil को इस परियोजना को इस मुकाम तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए बधाई दी। उन्होंने बताया कि Lakhwar और Renukaji परियोजनाओं से जुड़े विवाद सुलझने के बाद, Kishau पर काम आगे बढ़ा, और इस साल 16 जून को इस पर औपचारिक सहमति बनी।

सबसे महत्वपूर्ण बात Shah ने कहा कि Modi के प्रधानमंत्री बनने के बाद से, दशकों से चले आ रहे गंभीर विवादों को सुलझाने की पहल की गई है, और "यह परियोजना दसवां जल-विवाद है जो अब सुलझने जा रहा है।" उन्होंने Lakhwar Multipurpose Project, Shahpur Kandi Dam Project, Renukaji Multipurpose Dam Project, Ken-Betwa Link Project जैसी अन्य जल-संबंधी परियोजनाओं का हवाला दिया, और कहा कि 2018 से 2026 तक का यह दौर, Modi के नेतृत्व में, जल-विवाद समाधान के लिए याद रखा जाएगा।

Delhi CM Rekha Gupta — "यह Delhi की दीर्घकालिक जल-सुरक्षा को मज़बूत करेगा"

Delhi की मुख्यमंत्री Rekha Gupta ने कहा कि Kishau परियोजना की प्रगति, Delhi की जल-सुरक्षा को मज़बूत करेगी, और कम पानी उपलब्धता (low water availability) के दौर में राजधानी के लिए अतिरिक्त कच्चा पानी (raw water) उपलब्ध कराएगी।

Cabinet का बयान — यमुना के "पुनरुद्धार" से जुड़ाव

Cabinet ने कहा कि यह परियोजना Delhi की पेयजल-ज़रूरतों को दीर्घकालिक समर्थन देने के साथ-साथ, यमुना नदी के environmental flow (पर्यावरणीय प्रवाह) को बेहतर बनाने में भी मदद करेगी जो नदी के पुनरुद्धार (rejuvenation) के लिए एक ज़रूरी शर्त मानी जाती है। मानसून के दौरान जमा किए गए पानी को ज़रूरत के हिसाब से नियंत्रित तरीके से छोड़ा जा सकेगा, जिससे पूरे basin में पानी की उपलब्धता बेहतर होगी।

🔴 पैसा कैसे बंटेगा — पूरा Funding Formula

घटक फंडिंग व्यवस्था
Water Component (जल घटक) 90% केंद्र सरकार (central assistance के रूप में), बाकी 10% छह लाभार्थी राज्यों द्वारा
Power Component (बिजली घटक) इसे लेकर ही 8 साल का गतिरोध था — जून 2026 में केंद्र और राज्यों ने मिलकर इस ₹2,000 करोड़ की लागत को कवर करने पर सहमति बनाई
Himachal Pradesh का Water-Share Swap Himachal Pradesh के हिस्से का पानी Delhi और Rajasthan को दिया जाएगा, बदले में यह दोनों राज्य Himachal के power-component के खर्च में हिस्सा बांटेंगे — यह एक दिलचस्प "पानी बनाम पैसा" वाला अदला-बदली (swap) मॉडल है
आधार सिद्धांत सभी बंटवारा 1994 के मूल Upper Yamuna Basin समझौते के फॉर्मूले पर आधारित है

Kishau, Renukaji, और Lakhwar — तीन "बहन" परियोजनाएं

Kishau Dam कोई अकेली परियोजना नहीं है यह Upper Yamuna Basin में बनने वाली तीन बड़ी storage परियोजनाओं में से एक है, जो यमुना और उसकी दो सहायक नदियों Tons और Giri पर बन रही हैं।

परियोजना नदी स्थिति
Lakhwar Multipurpose Project Yamuna पहले ही समझौता हो चुका है, निर्माणाधीन
Renukaji Multipurpose Dam Giri समझौता हो चुका है — Environmental clearance को लेकर पहले चुनौतियां थीं
Kishau Multipurpose Project Tons 16 सितंबर 2026 को समझौता — अब निर्माण की तैयारी

🔴 अब सबसे संवेदनशील हिस्सा — असली कीमत कौन चुकाएगा

यह वह हिस्सा है जो अक्सर सरकारी घोषणाओं में सबसे कम जगह पाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में सबसे ज़्यादा मायने रखता है। Kishau Dam बनने से, दो राज्यों के 17 गांव पूरी तरह जलमग्न (submerge) हो जाएंगे, और 701 परिवार, कुल मिलाकर लगभग 5,498 लोग, अपने घर-ज़मीन से विस्थापित होंगे।

विस्थापन का आंकड़ा विवरण
कुल Submergence Area लगभग 2,950 हेक्टेयर (44.5 किलोमीटर तक फैला हुआ इलाका)
Uttarakhand से प्रभावित गांव 9 गांव (Dehradun ज़िला)
Himachal Pradesh से प्रभावित गांव 8 गांव (6 Sirmour ज़िले से, 2 Shimla ज़िले से)
कृषि योग्य निजी भूमि करीब 512 हेक्टेयर — यह वह उपजाऊ, समतल भूमि है जो नदी किनारे स्थित है और साल में कई फसलें (अदरक जैसी नकदी फसलें भी) देती है
वन भूमि करीब 2,438 हेक्टेयर
प्रभावित परिवार 701 परिवार
कुल प्रभावित जनसंख्या लगभग 5,498 लोग

आदिवासी और अनुसूचित जाति समुदायों पर असर

एक बेहद महत्वपूर्ण, कम-चर्चित पहलू यह है कि जो इलाका जलमग्न होगा, वह Jaunsar-Bawar क्षेत्र का हिस्सा है जो Uttarakhand की तरफ एक Schedule-V क्षेत्र है, यानी वहां मुख्यतः आदिवासी समुदाय बसते हैं।

यहां रहने वाले Jaunsari और Bawar जनजाति के लोग खुद को महाभारत के कौरवों और पांडवों का वंशज मानते हैं यह इलाका सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध और प्राचीन है। इसके अलावा, यहां Bajgis और Koltas जैसे अनुसूचित जाति (Dalit) समुदाय भी बड़ी संख्या में रहते हैं, जो अक्सर भूमिहीन होते हैं और अपनी आजीविका के लिए जंगलों और ऊंची जाति के परिवारों पर निर्भर रहते हैं।

Kushraad गांव के एक निवासी, Tekam Singh (जो Bajgis समुदाय से आते हैं), ने अपनी चिंता एक साक्षात्कार में बेहद स्पष्ट शब्दों में व्यक्त की "मुझे नहीं पता कि अगर सारी खेती की ज़मीन डूब जाए, तो मैं कहां जाऊंगा और क्या करूंगा।"

आपसी सांस्कृतिक और आर्थिक जुड़ाव भी टूटेगा

नदी के दोनों किनारों पर बसे गांवों के बीच गहरे धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते रहे हैं दाहिने किनारे (Sirmour, Himachal) के गांव, rope trolleys के ज़रिए Tiyuni-Dehradun सड़क से जुड़े हुए हैं। बांध बनने से यह पुरानी, पीढ़ियों पुरानी कनेक्टिविटी और सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित होगा।

🔴 विरोध क्यों हो रहा है — तीन मुख्य आपत्तियां

प्रभावित गांवों के निवासी और पर्यावरण-कार्यकर्ता, लंबे समय से इस परियोजना का विरोध करते आए हैं। मुख्य आपत्तियां तीन हैं:

आपत्ति विवरण
1. Rehabilitation (पुनर्वास) विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास को लेकर स्पष्टता और भरोसे की कमी — कृषि और पशुपालन पर निर्भर परिवारों के लिए नई जगह ढूंढना आसान नहीं
2. जैव-विविधता का नुकसान (Loss of Biodiversity) यह पूरा क्षेत्र घने जंगलों से भरा और जैव-विविधता में समृद्ध है — 2,438 हेक्टेयर वन भूमि डूबने का सीधा मतलब है बड़े पैमाने पर पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) का नुकसान
3. भूकंपीय क्षेत्र में सुरक्षा (Seismic Safety) एक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र में इतना ऊंचा (236 मीटर) gravity dam बनाना — विशेषज्ञ दशकों से इस पर सवाल उठाते रहे हैं, और यह चिंता आज भी पूरी तरह दूर नहीं हुई है

Himdhara Collective एक पर्यावरण शोध संस्था ने 2014-15 में इस क्षेत्र का एक विस्तृत field-study किया था, जिसका शीर्षक था "Submerging Jaunsar-Bawar" इस रिपोर्ट ने इन सभी चिंताओं को विस्तार से दस्तावेज़ी रूप दिया।

एक निष्पक्ष नज़रिया — विकास बनाम विस्थापन की पुरानी बहस

Kishau Dam असल में भारत की उस पुरानी, बार-बार दोहराई जाने वाली बहस का एक और उदाहरण है बड़े पैमाने पर होने वाला "राष्ट्रीय विकास" (national development) बनाम स्थानीय समुदायों का विस्थापन।

एक तरफ, यह परियोजना वाकई एक बड़ी ज़रूरत को पूरा करती है Delhi जैसे शहर की बढ़ती जल-ज़रूरत, 97,000 हेक्टेयर खेतों की सिंचाई, 660 MW स्वच्छ जल-विद्युत, और यमुना नदी के प्रवाह में सुधार। दूसरी तरफ, इसकी कीमत 701 परिवारों का विस्थापन, सदियों पुराने सांस्कृतिक रिश्तों का टूटना, और एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का जलमग्न होना भी उतनी ही वास्तविक है।

यह एक ऐसा सवाल है, जिसका कोई आसान जवाब नहीं असली परीक्षा यह होगी कि क्या सरकार, इस बार, प्रभावित परिवारों के लिए एक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और समय पर होने वाला पुनर्वास (fair and timely rehabilitation) सुनिश्चित कर पाती है, या यह इतिहास के उन कई अन्य बांध-परियोजनाओं की तरह बन जाती है, जहां विकास तो हुआ, लेकिन विस्थापित समुदायों को न्याय नहीं मिल पाया।

निष्कर्ष — एक 62 साल पुराना सपना, अब हकीकत की तरफ

Kishau Dam की कहानी 1963 के पहले विचार से लेकर 2026 के छह-राज्यीय समझौते तक भारत की जल-प्रबंधन नीति की जटिलताओं, संघीय ढांचे की चुनौतियों, और विकास बनाम विस्थापन की पुरानी बहस, सबका एक साथ प्रतिनिधित्व करती है। जैसा Amit Shah ने कहा, यह "दसवां जल-विवाद" है जो हाल के सालों में सुलझा है Lakhwar, Shahpur Kandi, Renukaji, Ken-Betwa जैसी परियोजनाओं की कतार में एक और नाम जुड़ गया है।

Delhi की प्यास बुझाने से लेकर 97,000 हेक्टेयर खेतों को सींचने तक, और 660 MW स्वच्छ बिजली बनाने से लेकर यमुना के प्रवाह को बेहतर करने तक इस परियोजना के फायदे बड़े और वास्तविक हैं। लेकिन 701 परिवारों के विस्थापन, आदिवासी-दलित समुदायों की चिंताएं, और एक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र में इतना विशाल निर्माण यह चुनौतियां भी उतनी ही गंभीर हैं। 2028 तक इस बांध के पूरा होने तक, असली सवाल यही रहेगा क्या विकास और मानवीय संवेदनशीलता, दोनों साथ-साथ चल पाएंगे।

आप क्या सोचते हैं क्या Kishau Dam जैसी बड़ी परियोजनाओं का फायदा, उनकी सामाजिक-पर्यावरणीय कीमत से ज़्यादा है? नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताएं।

स्रोत / Sources:

1. The Statesman — "Kishau project agreement to boost Delhi's long-term water security: CM"
2. The Federal — "Kishau Project: Six CMs sign agreement in presence of Amit Shah"
3. Vajiram & Ravi — "Kishau Dam Project, Location, Capacity, Latest News", June 18, 2026
4. Wikipedia — "Kishau Dam"
5. Uttarakhand Irrigation Department — "Kishau Dam"
6. Kishau Corporation Limited — "Salient features of Kishau MPP (4X165MW)"
7. Himdhara Collective — "Submerging Jaunsar-Bawar: The Dam Onslaught Continues", 2018
8. Mongabay India — "A twin-state hydropower project could drown livelihoods and biodiversity", September 24, 2024
9. Scroll.in — "Indian government is yet again considering a dam that has been rejected repeatedly over 50 years", May 6, 2022
10. Land Conflict Watch — "Community members protest the interstate Kishau dam project in north India"
11. The Tribune — "Agreement on sharing of benefits from dams"
12. The Tribune — "Stage set for Kishau project pact"

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