भारत में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन क्यों मुश्किल है? लागत और चुनौतियाँ
लेखक: आकाश दीप | युगबोध भारत ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के बाद अब ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य के स्वच्छ ईंधन के रूप में देखा जा रहा है। इसका उपयोग उन उद्योगों में भी किया जा सकता है, जहाँ केवल बिजली से प्रदूषण कम करना आसान नहीं है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल है: जब भारत के पास प्रचुर धूप, बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और बड़े औद्योगिक बाजार हैं, तो फिर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन तेजी से क्यों नहीं बढ़ रहा? इसका जवाब केवल तकनीक में नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र, बिजली की उपलब्धता, पानी, भंडारण, परिवहन और उद्योगों की खरीद क्षमता में छिपा है। ग्रीन हाइड्रोजन बनाना एक चुनौती है, लेकिन उसे पारंपरिक ईंधन के मुकाबले प्रतिस्पर्धी कीमत पर लगातार उपलब्ध कराना उससे भी बड़ी चुनौती है। सरकार के राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन यानी 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है। हालांकि, लक्ष्य, घोषित परियोजना, स्थापित क्षमता और वास्तव में उत्पादित हाइड्रोजन एक ही चीज नहीं...