Est. 2025 · लेखक: आकाश दीप

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महिला मतदाता: भारतीय चुनावों की नई निर्णायक ताकत

लेखक: आकाश दीप | युगबोध

भारतीय चुनावों में महिला मतदाताओं की बढ़ती राजनीतिक ताकत को दर्शाता इन्फोग्राफिक, Bihar Bengal UP का विश्लेषण

जिस जाति और धर्म के गणित पर हमने अपने पिछले लेख में बात की थी, उसी गणित को आज एक नया समीकरण चुनौती दे रहा है

बिहार में नवंबर 2025 में जब वोटों की गिनती शुरू हुई, तो एक आंकड़े ने सबसे ज़्यादा हैरान किया। महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से करीब नौ प्रतिशत अंक ज़्यादा था, और सुपौल जैसे कुछ ज़िलों में यह अंतर बीस प्रतिशत अंक से भी ऊपर चला गया। कुछ महीनों बाद, मई 2026 में जब पश्चिम बंगाल के नतीजे आए, तो तस्वीर बिल्कुल पलट गई थी, जिन महिलाओं ने दो चुनावों तक ममता बनर्जी को सत्ता में बनाए रखा, उन्हीं में से एक बड़ा हिस्सा अब भाजपा की तरफ खिसक चुका था, और तृणमूल कांग्रेस 207 सीटों की हार के साथ सत्ता से बाहर हो गई।

यह दोनों नतीजे मिलकर एक बात बिल्कुल साफ करते हैं, महिला मतदाता अब किसी पार्टी की स्थायी जागीर नहीं रह गई हैं। वे एक ऐसा वोट बैंक बन चुकी हैं जो हर चुनाव में खुद अपना फैसला करता है, और जो पार्टी इस फैसले को समझने में चूक जाए, उसे उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। आज हम इसी सवाल को विस्तार से समझेंगे, बिहार और बंगाल में क्या हुआ, उत्तर प्रदेश में महिलाओं के लिए कौन सी योजनाएं चल रही हैं, विपक्ष क्या वादे कर रहा है, महिला सुरक्षा की असली तस्वीर क्या है, और 2017 से पहले और आज के हालात में क्या फर्क है।

पहले यह समझिए कि महिला वोट बैंक इतना अलग क्यों है

जाति और धर्म आधारित वोट बैंकों की एक बुनियादी सीमा होती है, हर जाति समूह के भीतर भी आर्थिक और वैचारिक मतभेद मौजूद रहते हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की एक दिलचस्प व्याख्या यह है कि महिलाएं हर दूसरी पहचान में हमेशा दूसरे नंबर पर रखी जाती रही हैं, चाहे वह जाति हो, धर्म हो, क्षेत्र हो या सामाजिक हैसियत। यही सार्वभौमिक हाशिए पर होना उन्हें एक साझा आधार देता है, और यही वजह है कि जब महिलाएं किसी मुद्दे पर लामबंद होती हैं, तो यह लामबंदी जाति और धर्म की दीवारों को पार कर जाती है।

बिहार 2025, जहां महिलाओं ने खुलकर अपना फैसला सुनाया

बिहार का उदाहरण इस बदलाव को समझने के लिए सबसे उपयुक्त है, क्योंकि यहां आंकड़े बेहद स्पष्ट हैं। पहले चरण में महिलाओं का मतदान पुरुषों से 7.48 प्रतिशत अंक ज़्यादा रहा, और दूसरे चरण में यह अंतर बढ़कर 9.93 प्रतिशत अंक हो गया। यह बिहार के पहले विधानसभा चुनाव 1951 से तुलना करने पर और स्पष्ट होता है, जब महिलाओं का मतदान पुरुषों से छह प्रतिशत कम था। यानी सात दशकों में यह रिश्ता पूरी तरह उलट चुका है।

इस बदलाव के पीछे नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना का बड़ा हाथ माना जा रहा है, जिसके तहत सितंबर 2025 में करीब पचहत्तर लाख महिलाओं के बैंक खातों में सीधे दस हज़ार रुपये भेजे गए, और बाद में कुल एक करोड़ दस लाख से ज़्यादा महिलाओं को इसका लाभ मिला। द ट्रिब्यून के विश्लेषण के अनुसार यह सिर्फ एक चुनावी रिश्वत नहीं थी, बल्कि इसे जानबूझकर रोज़गार-सहायता के तौर पर पेश किया गया, न कि दया या भीख के तौर पर, और यही फ्रेमिंग इसे कारगर बना गई।

हालांकि एक ईमानदार पहलू यह भी है कि द डिप्लोमैट की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद, 2025 के चुनाव में पिछले पंद्रह सालों में सबसे कम महिला उम्मीदवार खड़ी हुईं, यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 9.8 प्रतिशत रह गया। यानी महिलाएं वोट देने में आगे हैं, लेकिन चुनाव लड़ने और नेतृत्व करने के मौके अभी भी बेहद सीमित हैं, यह एक विरोधाभास है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

बंगाल 2026, जहां वही रणनीति उलटी पड़ गई

2021 के चुनाव में महिला मतदाताओं ने ही ममता बनर्जी को उस समय जिताया था जब भाजपा के कुछ नेताओं की टिप्पणियों और योगी आदित्यनाथ के बंगाल में बदलाव के वादे ने महिलाओं में गहरी आशंका पैदा कर दी थी। द वायर की उस समय की रिपोर्ट के अनुसार, एनसीआरबी के आंकड़ों का हवाला देते हुए यह डर फैलाया गया था कि यूपी मॉडल बंगाल में लागू होने से महिलाओं की सुरक्षा और खतरे में पड़ जाएगी। उस चुनाव में लक्ष्मीर भंडार योजना, जो 2021 में शुरू हुई थी, ने महिलाओं के बीच तृणमूल कांग्रेस का जनाधार और मज़बूत किया।

लेकिन 2026 आते-आते यही रणनीति काम नहीं आई। इसकी दो बड़ी वजहें सामने आईं। पहली, आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुए बलात्कार और हत्या कांड ने कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया, खासकर शहरी और शिक्षित मध्यम वर्ग की महिलाओं में इसका गहरा असर पड़ा। दूसरी, एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34,691 मामले दर्ज हुए, जो देश में सबसे ज़्यादा में गिने जाते हैं, और राज्य में एसिड अटैक के मामले भी देश में सबसे अधिक रहे।

इसके साथ ही, एनडब्ल्यूएम इंडिया के विश्लेषण के अनुसार, जो महिलाएं शिक्षित होकर मध्यम वर्ग में शामिल हो चुकी हैं, उन्होंने लक्ष्मीर भंडार जैसी नकद-सहायता योजनाओं को समय के साथ नकारात्मक रूप से देखना शुरू कर दिया, उन्हें यह सम्मान देने वाली योजना कम और एक स्थायी निर्भरता बनाने वाली योजना ज़्यादा लगने लगी। यानी बंगाल का उदाहरण यह सिखाता है कि सिर्फ नकद योजना काफी नहीं, अगर सुरक्षा का भरोसा टूट जाए तो वही योजना असर खो देती है।

राज्य और साल क्या हुआ
बंगाल 2021 महिलाओं ने सुरक्षा की आशंका और लक्ष्मीर भंडार के दम पर ममता को जिताया
बिहार 2025 दस हज़ार रुपये की रोज़गार योजना और शराबबंदी के दम पर महिलाओं ने एनडीए को दोबारा जिताया
बंगाल 2026 आरजी कर कांड और सुरक्षा को लेकर बढ़े गुस्से ने महिला वोट का बड़ा हिस्सा भाजपा की तरफ मोड़ दिया, तृणमूल हारी

🔴 उत्तर प्रदेश, जहां महिला मतदाता कुल आबादी का 45 प्रतिशत से ज़्यादा हैं

उत्तर प्रदेश में महिला मतदाताओं की संख्या इतनी बड़ी है कि कोई भी पार्टी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती। यही वजह है कि 2027 के चुनाव से पहले, हर बड़ी पार्टी महिलाओं को लक्षित करने वाली योजनाओं की होड़ में जुटी है।

सत्तारूढ़ सरकार की मौजूदा योजनाएं

योजना विवरण
मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना बेटी के जन्म से लेकर स्नातक तक अलग-अलग चरणों में कुल पच्चीस हज़ार रुपये की आर्थिक सहायता, 2026-27 के बजट में करीब चार सौ करोड़ रुपये आवंटित
रानी लक्ष्मीबाई स्कूटी योजना मेधावी छात्राओं को शिक्षा जारी रखने के लिए स्कूटी वितरण
मिशन शक्ति 2020 से महिला सुरक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता के लिए चौबीस विभागों के समन्वय से चलने वाला अभियान
नई प्रस्तावित नकद योजना रिपोर्टों के अनुसार सरकार कुल पचास हज़ार रुपये की सहायता पर विचार कर रही है, जिसकी शुरुआत बीस हज़ार रुपये की पहली किस्त से होगी, इसके बाद सत्ता में बने रहने की शर्त पर दस-दस हज़ार रुपये की तीन और किस्तें

विपक्ष का सबसे बड़ा वादा, अखिलेश यादव के चालीस हज़ार रुपये

मार्च 2026 में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने घोषणा की कि अगर उनकी सरकार बनती है तो हर पात्र महिला को हर साल चालीस हज़ार रुपये दिए जाएंगे, जिसे पार्टी स्त्री सम्मान समृद्धि योजना का नाम देगी। यह मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की योजनाओं से दोगुने से भी ज़्यादा है। लेकिन स्वराज्य पत्रिका के एक विस्तृत आर्थिक विश्लेषण ने इस वादे की व्यावहारिकता पर गंभीर सवाल उठाए।

अगर यह योजना अन्य राज्यों जैसी पात्रता शर्तों का पालन करे, यानी ढाई लाख रुपये सालाना से कम आय वाले परिवारों की कामकाजी उम्र की महिलाएं, तो उत्तर प्रदेश में करीब पांच से छह करोड़ महिलाएं इसके दायरे में आ सकती हैं। इतनी बड़ी संख्या को चालीस हज़ार रुपये सालाना देने पर कुल खर्च दो से सवा दो लाख करोड़ रुपये सालाना बैठता है। तुलना के लिए, उत्तर प्रदेश का अपना कुल कर राजस्व करीब दो लाख छब्बीस हज़ार करोड़ रुपये है, और राज्य का राजकोषीय घाटा इक्यानवे हज़ार चार सौ करोड़ रुपये है। यानी यह प्रस्तावित योजना अकेले राज्य के पूरे घाटे से दोगुनी और कुल कर राजस्व के लगभग बराबर बैठती है, जो वित्तीय रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है।

कांग्रेस का पुराना, लेकिन अभी भी प्रासंगिक वादा

2022 के चुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा ने कांग्रेस का अलग महिला घोषणापत्र जारी करते हुए सरकारी नौकरियों में चालीस प्रतिशत आरक्षण, हर थाने में एक महिला कांस्टेबल, हर गांव में महिला चौपाल, और मनरेगा में महिलाओं को प्राथमिकता जैसे वादे किए थे। पार्टी ने चालीस प्रतिशत टिकट भी महिलाओं को देने का वादा किया था। ये वादे 2027 की बहस में भी एक संदर्भ बिंदु बने हुए हैं, भले ही कांग्रेस उत्तर प्रदेश में उतनी मज़बूत स्थिति में न हो।

🔴 2017 से पहले उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा की स्थिति

2017 से पहले के दौर में उत्तर प्रदेश, महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर बार-बार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में रहा। सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर छेड़छाड़, जिसे आम बोलचाल में ईव-टीज़िंग कहा जाता था, एक आम समस्या मानी जाती थी, जिसके खिलाफ कोई संगठित, दिखने वाला पुलिस-तंत्र मौजूद नहीं था। इसी माहौल में 2020 में हाथरस में हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या कांड ने, जिसमें एक दलित युवती की जान गई, राज्य सरकार की छवि पर गहरी चोट पहुंचाई, और सरकार को तत्काल कदम उठाने के लिए मजबूर किया।

🔴 Anti-Romeo Squad, 2017 में शुरू हुई सबसे चर्चित पहल

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही, 2017 में सबसे पहला बड़ा कदम एंटी-रोमियो स्क्वॉड का गठन था। इसका मकसद स्कूलों, कॉलेजों, बाज़ारों, बस स्टैंड और पार्कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर तैनात सादे कपड़ों वाली टीमों के ज़रिए छेड़छाड़ और उत्पीड़न को रोकना था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2026 तक इन टीमों ने करोड़ों लोगों की जांच की और हज़ारों के खिलाफ मामले दर्ज कर कार्रवाई की।

लेकिन इस पहल की एक ईमानदार, संतुलित तस्वीर के लिए दोनों पक्षों को देखना ज़रूरी है। शुरुआती सालों में ही महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने योगी सरकार को एक याचिका सौंपी थी, जिसमें एंटी-रोमियो स्क्वॉड को भंग करने की मांग की गई थी, उनका तर्क था कि ये टीमें महिलाओं और लड़कियों की आवाजाही और सहमति के अधिकार पर ही अंकुश लगा रही हैं, जब यह जोड़ों को सार्वजनिक जगहों पर परेशान करती हैं। घरेलू हिंसा पीड़ितों के लिए काम करने वाली संस्था वनांगना की कार्यकर्ता पुष्पा का कहना था कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या घरेलू हिंसा है, न कि सार्वजनिक स्थानों की छेड़छाड़, और सरकार का ज़्यादातर ध्यान इसी एक मुद्दे पर केंद्रित होने से बलात्कार और एसिड अटैक जैसे गंभीर अपराध पीछे छूट सकते हैं।

🔴 2020 के बाद, Mission Shakti और आंकड़ों की बहस

हाथरस कांड के ठीक बाद, अक्टूबर 2020 में, नवरात्रि के पहले दिन मिशन शक्ति अभियान शुरू किया गया, जिसे बाद में एक स्थायी, चौबीस विभागों के समन्वय वाले कार्यक्रम में बदल दिया गया। इसके तहत पिंक बूथ, बीट पुलिसिंग, फास्ट ट्रैक कोर्ट और महिला सम्मान प्रकोष्ठ जैसी व्यवस्थाएं बनाई गईं, ताकि शिकायत दर्ज करने से लेकर सज़ा तक की प्रक्रिया तेज़ हो सके।

आंकड़ों को लेकर यहां भी दो अलग-अलग कहानियां मौजूद हैं, और एक निष्पक्ष विश्लेषण के लिए दोनों को साथ रखना ज़रूरी है। सरकार समर्थक विश्लेषण एनसीआरबी के 2019 के आंकड़ों का हवाला देते हैं, जिनके अनुसार उस साल उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध की दर प्रति लाख जनसंख्या पर 55.4 थी, जबकि राष्ट्रीय औसत 62.4 था, यानी राज्य राष्ट्रीय औसत से बेहतर स्थिति में दिखाया गया। दूसरी तरफ, द वायर में प्रकाशित एक विश्लेषण में यह दावा किया गया था कि 2017 में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने से लेकर 2019 तक, उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध में देश में सबसे ज़्यादा, 66.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई, और 2019 में अकेले उत्तर प्रदेश का हिस्सा देश के कुल दर्ज मामलों का करीब पंद्रह प्रतिशत था।

यह विरोधाभास असल में आंकड़ों की प्रकृति से जुड़ा है, दर (rate) प्रति लाख जनसंख्या पर मापी जाती है, जबकि वृद्धि प्रतिशत (percentage increase) दर्ज मामलों की कुल संख्या पर आधारित होती है। एक और अहम पहलू यह भी है कि दर्ज मामलों में वृद्धि का मतलब हमेशा अपराध बढ़ना नहीं होता, यह इस बात का भी संकेत हो सकता है कि पहले जो मामले दर्ज ही नहीं होते थे, अब रिपोर्टिंग बढ़ने से दर्ज होने लगे हैं। इसलिए इस विषय पर किसी एक तरफा निष्कर्ष तक पहुंचना जल्दबाज़ी होगी, दोनों आंकड़े अपनी जगह सही हो सकते हैं और फिर भी अलग कहानी कह सकते हैं।

पहलू 2017 से पहले आज
सार्वजनिक स्थानों पर पुलिस-निगरानी कोई संगठित, समर्पित तंत्र नहीं एंटी-रोमियो स्क्वॉड, बीट पुलिसिंग, पिंक बूथ
शिकायत और न्याय प्रक्रिया धीमी, कई बार लंबित फास्ट ट्रैक कोर्ट, महिला सम्मान प्रकोष्ठ
समर्पित सरकारी अभियान कोई एकीकृत अभियान नहीं मिशन शक्ति, चौबीस विभागों का समन्वय
आलोचकों का पक्ष सुरक्षा-तंत्र की कमी की आलोचना घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर कम ध्यान, और आंकड़ों की सत्यता पर सवाल

एक निष्पक्ष सवाल, क्या नकद योजनाएं ही अंतिम जवाब हैं

बिहार और बंगाल के नतीजों को साथ रखकर देखने पर एक ज़रूरी सबक निकलता है, नकद सहायता योजना अकेले किसी भी चुनाव को नहीं जिताती। बिहार में योजना काम आई क्योंकि उसके साथ शराबबंदी जैसा एक भावनात्मक, सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी जुड़ा था, जिसने महिलाओं के घरेलू जीवन को सीधे बेहतर बनाया। बंगाल में योजना नाकाम हुई क्योंकि सुरक्षा का भरोसा ही टूट गया था, और कोई भी नकद राशि उस डर की भरपाई नहीं कर पाई। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में भी असली मुकाबला सिर्फ चालीस हज़ार बनाम पचास हज़ार रुपये का नहीं, बल्कि इस बात का है कि कौन सी पार्टी महिलाओं को यह भरोसा दिला पाती है कि उनकी सुरक्षा और सम्मान, नकद राशि से भी ज़्यादा ज़रूरी प्राथमिकता है।

निष्कर्ष, महिला मतदाता अब एक स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति हैं

बिहार, बंगाल और अब उत्तर प्रदेश के उदाहरण मिलकर एक स्पष्ट सच्चाई बयां करते हैं, महिला मतदाता अब अपने परिवार, पति या पिता के राजनीतिक झुकाव को दोहराने वाली एक निष्क्रिय संख्या नहीं रह गई हैं। वे स्वतंत्र रूप से यह तय कर रही हैं कि कौन सी सरकार उनकी आर्थिक स्वतंत्रता, उनकी सुरक्षा, और उनके सम्मान को सबसे बेहतर तरीके से सुनिश्चित करती है, और उसी हिसाब से वोट डाल रही हैं। यही वजह है कि हर बड़ी पार्टी अब जाति और धर्म के पारंपरिक समीकरणों के साथ-साथ, महिलाओं के लिए एक अलग, समर्पित रणनीति बनाने पर मजबूर हो चुकी है।

2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव इस मायने में और भी दिलचस्प होगा, क्योंकि यहां नकद योजनाओं की एक सीधी प्रतिस्पर्धा तो है ही, साथ ही सुरक्षा को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच आंकड़ों और आख्यानों की एक गहरी लड़ाई चल रही है। असली सवाल यह नहीं कि कौन सी पार्टी ज़्यादा पैसा देने का वादा कर रही है, असली सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश की करोड़ों महिलाएं किस पर ज़्यादा भरोसा करती हैं, अपनी बेटी के स्कूल जाने के रास्ते की सुरक्षा पर, या अपने बैंक खाते में आने वाली अगली किस्त पर।

आपको क्या लगता है, महिला मतदाताओं के लिए नकद सहायता योजनाएं ज़्यादा मायने रखती हैं, या सुरक्षा और सम्मान का भरोसा उससे भी बड़ा मुद्दा है? नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताएं।

स्रोत / Sources:

1. India TV News, "Mahila Shakti in Bihar 2025, How female voter turnout shaped poll results and which alliance benefited most", November 14, 2025
2. The Federal, "Women in Bihar voted decisively in favour of NDA for good governance, BJP"
3. The Diplomat, "Why Bihar's Election Wasn't a Win for Women in Democracy", November 2025
4. Feminism in India, "Bihar Elections 2025 And Financial Inclusion, How Focus On Women Is Shaping The Politics"
5. The Tribune, "Why Bihar's woman voter is the real winner of 2025"
6. Deccan Herald, "Bihar Assembly elections 2025, Women voters key to Nitish Kumar's resounding victory", November 14, 2025
7. The Wire, "How the Women of Bengal Carried Mamata Banerjee to Victory"
8. The Aidem, "Exploring Mamata's Women Track Record, Welfare Schemes Versus Safety Concerns"
9. NWM India, "How SIR, Workplace Safety and Corruption Influenced Women's Votes in Bengal"
10. Wikipedia, "Electoral history of Mamata Banerjee"
11. Prokerala, "Women's safety in the Yogi government is not just a claim, but a visible change on the ground", May 2, 2026
12. WCSO, "Mission Shakti"
13. EastMojo, "Post-Hathras debacle Yogi Adityanath launches 'Mission Shakti' for women's safety"
14. Deccan Herald, "Uttar Pradesh's anti-Romeo squads back in action to check crimes against women in Hathras"
15. Pressreader, "Focus on 'Romeos' sidelines women's bigger concerns", Hindustan Times Lucknow
16. Pressreader, "NCRB figures bear testimony to CM Yogi's pro-active efforts for women safety", Hindustan Times Lucknow, February 12, 2021
17. Business Today, "UP Elections 2027, Akhilesh Yadav promises Rs 40,000 annual cash support for women", August 26, 2026
18. Swarajya, "Akhilesh Yadav Has Promised Women Rs 40,000 A Year, Can Yogi Adityanath Answer It Without Writing The Same Cheque"
19. Sarkari Yojana, "Kanya Sumangala Yojana UP 2026"
20. Deccan Herald, "Priyanka Gandhi Vadra promises 40% reservation for women in govt jobs"

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