भारत में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन क्यों मुश्किल है? लागत और चुनौतियाँ
लेखक: आकाश दीप | युगबोध
भारत ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव की तैयारी कर रहा है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों के बाद अब ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य के स्वच्छ ईंधन के रूप में देखा जा रहा है। इसका उपयोग उन उद्योगों में भी किया जा सकता है, जहाँ केवल बिजली से प्रदूषण कम करना आसान नहीं है। लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल है: जब भारत के पास प्रचुर धूप, बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और बड़े औद्योगिक बाजार हैं, तो फिर ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन तेजी से क्यों नहीं बढ़ रहा?
इसका जवाब केवल तकनीक में नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र, बिजली की उपलब्धता, पानी, भंडारण, परिवहन और उद्योगों की खरीद क्षमता में छिपा है। ग्रीन हाइड्रोजन बनाना एक चुनौती है, लेकिन उसे पारंपरिक ईंधन के मुकाबले प्रतिस्पर्धी कीमत पर लगातार उपलब्ध कराना उससे भी बड़ी चुनौती है।
सरकार के राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक प्रतिवर्ष 50 लाख मीट्रिक टन यानी 5 मिलियन मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करना है। हालांकि, लक्ष्य, घोषित परियोजना, स्थापित क्षमता और वास्तव में उत्पादित हाइड्रोजन एक ही चीज नहीं हैं। भारत की प्रगति को समझने के लिए इन सभी के बीच अंतर करना जरूरी है।
ग्रीन हाइड्रोजन क्या है और इसकी जरूरत क्यों है?
हाइड्रोजन अपने आप में कोई प्राथमिक ऊर्जा स्रोत नहीं है। इसे पानी, प्राकृतिक गैस या अन्य पदार्थों से अलग करके तैयार करना पड़ता है। जब पानी का इलेक्ट्रोलिसिस नवीकरणीय बिजली की मदद से किया जाता है, तो निर्धारित उत्सर्जन मानकों और पूरी उत्पादन प्रक्रिया की शर्तें पूरी होने पर प्राप्त हाइड्रोजन को ग्रीन हाइड्रोजन कहा जाता है। इलेक्ट्रोलिसिस में बिजली की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है।
आज कई उद्योगों में हाइड्रोजन का उपयोग पहले से होता है। उदाहरण के लिए, रिफाइनरियों में पेट्रोलियम उत्पादों के प्रसंस्करण और उर्वरक उद्योग में अमोनिया बनाने के लिए हाइड्रोजन की जरूरत होती है। इस मांग का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों से उत्पादित हाइड्रोजन से पूरा किया जाता है। ग्रीन हाइड्रोजन का उद्देश्य इस मौजूदा मांग के एक हिस्से को कम उत्सर्जन वाले विकल्प से बदलना और आगे नए उपयोग विकसित करना है।
इसकी अहमियत खास तौर पर उन क्षेत्रों में बढ़ जाती है जहाँ सीधे बिजली का इस्तेमाल करना कठिन है या जहाँ रासायनिक प्रक्रिया के लिए हाइड्रोजन कच्चे माल के रूप में जरूरी है। फिर भी, हर जगह ग्रीन हाइड्रोजन सबसे सस्ता या सबसे प्रभावी समाधान नहीं है। जिन कामों को सीधे नवीकरणीय बिजली से पूरा किया जा सकता है, वहाँ बिजली का सीधा इस्तेमाल कई बार अधिक ऊर्जा-कुशल हो सकता है।
भारत का राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: लक्ष्य कितना बड़ा है?
जनवरी 2023 में शुरू किए गए राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के लिए सरकार ने कुल ₹19,744 करोड़ का वित्तीय प्रावधान किया। मिशन का उद्देश्य भारत में ग्रीन हाइड्रोजन और उसके डेरिवेटिव का उत्पादन, उपयोग और निर्यात बढ़ाना है। इसके तहत इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, उत्पादन प्रोत्साहन, अनुसंधान, पायलट परियोजनाओं और जरूरी बुनियादी ढाँचे को बढ़ावा दिया जा रहा है।
| मुख्य पहलू | लक्ष्य या स्थिति | इसका अर्थ |
|---|---|---|
| राष्ट्रीय मिशन का वित्तीय प्रावधान | ₹19,744 करोड़ | उत्पादन, निर्माण और संबंधित गतिविधियों को प्रोत्साहन |
| 2030 का उत्पादन लक्ष्य | 50 लाख मीट्रिक टन प्रतिवर्ष | उत्पादन को बड़े औद्योगिक स्तर तक पहुँचाना |
| इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण | 3,000 MW प्रतिवर्ष की निर्माण क्षमता के लिए प्रोत्साहन आवंटित | घरेलू उपकरण निर्माण को बढ़ावा देना |
| फरवरी 2026 तक चालू उत्पादन क्षमता | लगभग 8,000 टन प्रतिवर्ष | यह चालू क्षमता का आँकड़ा है, वास्तविक वार्षिक उत्पादन का नहीं |
स्रोतों में उपलब्ध आँकड़े भारत की शुरुआती प्रगति और आगे के लक्ष्य के बीच बड़ा अंतर दिखाते हैं। मार्च 2026 में प्रकाशित सरकारी जानकारी के अनुसार, फरवरी 2026 तक लगभग 8,000 टन प्रतिवर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता चालू की जा चुकी थी। वहीं, मिशन के तहत कंपनियों को इससे कहीं अधिक क्षमता की परियोजनाएँ आवंटित की गई हैं। आवंटित क्षमता को चालू उत्पादन मान लेना गलत होगा।
इसलिए भारत के सामने केवल नई परियोजनाओं की घोषणा करने का लक्ष्य नहीं है। असली काम परियोजनाओं का वित्तपोषण, निर्माण, बिजली और पानी की व्यवस्था, खरीदारों के साथ समझौते और नियमित व्यावसायिक उत्पादन सुनिश्चित करना है।
1. सबसे बड़ी बाधा: प्रति किलोग्राम ग्रीन हाइड्रोजन की लागत
ग्रीन हाइड्रोजन की आर्थिक व्यवहार्यता समझने के लिए सबसे पहले उसकी प्रति किलोग्राम लागत देखनी होगी। यदि कोई उद्योग पारंपरिक तरीके से हाइड्रोजन अपेक्षाकृत कम कीमत पर खरीद सकता है, तो वह केवल पर्यावरण के नाम पर कई गुना महँगा विकल्प अपनाने के लिए हमेशा तैयार नहीं होगा। उद्योगों को लागत, गुणवत्ता, आपूर्ति की निरंतरता और निवेश पर मिलने वाले लाभ का हिसाब रखना पड़ता है।
ग्रीन हाइड्रोजन की लागत मुख्य रूप से नवीकरणीय बिजली, इलेक्ट्रोलाइजर की कीमत, संयंत्र के उपयोग की दर, वित्तपोषण, पानी के उपचार और संचालन पर निर्भर करती है। इसके अलावा, हाइड्रोजन को दबाव में रखने, संग्रहित करने, परिवहन करने और खरीदार तक पहुँचाने का खर्च भी जुड़ सकता है। इसलिए संयंत्र के गेट पर उत्पादन लागत और ग्राहक तक पहुँचने वाली अंतिम कीमत अलग-अलग हो सकती हैं।
CEEW और Climate Finance Leadership Initiative India की 2024 की रिपोर्ट में उद्योग के अनुमानों के आधार पर ग्रीन हाइड्रोजन की लागत लगभग 3.5 से 5 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम बताई गई थी। यह एक संदर्भ सीमा है, कोई सार्वभौमिक या आज की हर परियोजना पर लागू होने वाली दर नहीं। स्थान, बिजली की कीमत, तकनीक, वित्तपोषण और परियोजना की संरचना के अनुसार लागत बदल सकती है।
भारत में निविदाओं के परिणाम इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू दिखाते हैं। मार्च 2026 में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, रिफाइनरियों को आपूर्ति के लिए कुछ निविदाओं में ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत ₹387 से ₹397 प्रति किलोग्राम तक मिली थी, जिसमें 18 प्रतिशत GST शामिल था। वहीं, Numaligarh Refinery के लिए एक अन्य निविदा में ₹279 प्रति किलोग्राम की कीमत बताई गई, जो करों से पहले की दर थी। इन कीमतों की तुलना करते समय कर, आपूर्ति की शर्तें और परियोजना-विशिष्ट परिस्थितियाँ ध्यान में रखनी चाहिए।
| लागत का हिस्सा | क्यों महत्वपूर्ण है? |
|---|---|
| नवीकरणीय बिजली | इलेक्ट्रोलिसिस में बिजली की खपत बहुत अधिक होती है, इसलिए बिजली की दर सीधे उत्पादन लागत को प्रभावित करती है। |
| इलेक्ट्रोलाइजर और अन्य उपकरण | संयंत्र लगाने की शुरुआती पूँजी लागत और उपकरणों की दक्षता का असर पड़ता है। |
| वित्तपोषण और क्षमता का उपयोग | महँगा कर्ज और कम समय तक चलने वाला संयंत्र प्रति किलोग्राम लागत बढ़ा सकता है। |
| भंडारण और परिवहन | हाइड्रोजन को सुरक्षित रूप से ग्राहक तक पहुँचाने के लिए अतिरिक्त उपकरण और नेटवर्क चाहिए। |
| पानी और रखरखाव | पानी का शुद्धीकरण, शीतलन, मरम्मत और अन्य संचालन खर्च भी अंतिम कीमत में जुड़ते हैं। |
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कम उत्पादन लागत का दावा तभी उपयोगी है जब वह वास्तविक परियोजना के आँकड़ों से समर्थित हो। केवल सस्ती बिजली मिलने से पूरी लागत अपने आप कम नहीं हो जाती। यदि इलेक्ट्रोलाइजर महँगा है, संयंत्र पर्याप्त समय तक नहीं चलता या तैयार हाइड्रोजन को दूर स्थित खरीदार तक पहुँचाना पड़ता है, तो आर्थिक लाभ कम हो सकता है।
2. सस्ती नवीकरणीय बिजली: भारत का फायदा, लेकिन पूरी कहानी नहीं
भारत के पास ग्रीन हाइड्रोजन के लिए एक महत्वपूर्ण लाभ है। देश के कई क्षेत्रों में सौर और पवन ऊर्जा की अच्छी संभावनाएँ हैं। राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में बड़े सौर संयंत्रों की क्षमता, जबकि तटीय क्षेत्रों में पवन ऊर्जा की उपलब्धता, ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के लिए अवसर पैदा करती है।
लेकिन नवीकरणीय बिजली की सबसे कम दिखाई देने वाली कीमत और संयंत्र को चौबीसों घंटे उपलब्ध बिजली की वास्तविक लागत में अंतर हो सकता है। सौर बिजली दिन में अधिक उपलब्ध होती है और पवन ऊर्जा मौसम तथा स्थान के अनुसार बदलती है। यदि इलेक्ट्रोलाइजर को बिजली उपलब्ध होने पर ही चलाया जाए, तो उसकी उपयोग दर कम हो सकती है। संयंत्र और उपकरणों पर किया गया निवेश कम उत्पादन पर भी लागत पैदा करता है।
इसके समाधान के लिए कंपनियाँ सौर और पवन ऊर्जा के मिश्रण, बिजली भंडारण, ग्रिड बिजली और अन्य ऊर्जा प्रबंधन विकल्पों का मूल्यांकन कर सकती हैं। लेकिन हर विकल्प की अपनी लागत और तकनीकी सीमाएँ हैं। बैटरी जोड़ने से अतिरिक्त निवेश होता है, जबकि ग्रिड से बिजली लेने पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि निर्धारित ग्रीन हाइड्रोजन मानकों के अनुसार बिजली की उत्पत्ति और उत्सर्जन का हिसाब रखा जा रहा है।
बिजली को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुँचाने के शुल्क, ओपन एक्सेस नियम, बिजली बैंकिंग, ग्रिड कनेक्शन और राज्य-स्तरीय शुल्क भी परियोजना की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के अंतर्गत नवीकरणीय बिजली की पहुँच आसान बनाने के लिए नीतिगत कदम उठाए गए हैं, लेकिन परियोजना की वास्तविक लागत उसके स्थान और लागू नियमों पर निर्भर करती है।
इसका सीधा अर्थ है कि भारत को सिर्फ सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता बढ़ाने पर ध्यान नहीं देना चाहिए। उसे ऐसी बिजली व्यवस्था भी चाहिए जो ग्रीन हाइड्रोजन संयंत्र को उचित कीमत पर, पर्याप्त समय तक और भरोसेमंद तरीके से बिजली उपलब्ध करा सके।
3. पानी की उपलब्धता: छोटा इनपुट, बड़ी योजना
ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से किया जाता है। रासायनिक प्रक्रिया के हिसाब से एक किलोग्राम हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए लगभग 9 लीटर शुद्ध पानी की जरूरत होती है। लेकिन वास्तविक संयंत्र में पानी के उपचार, शीतलन और अन्य आवश्यकताओं को जोड़ने पर कुल पानी की खपत इससे अधिक हो सकती है। NITI Aayog के एक अध्ययन में इन अतिरिक्त जरूरतों सहित लगभग 18 से 25 लीटर पानी प्रति किलोग्राम हाइड्रोजन का अनुमान दिया गया है। वास्तविक खपत संयंत्र के डिजाइन और पानी के पुनर्चक्रण पर निर्भर करेगी।
एक छोटी परियोजना में पानी की जरूरत संभालना आसान हो सकता है, लेकिन जब उत्पादन को लाखों टन प्रतिवर्ष तक बढ़ाने की योजना हो, तो पानी का स्रोत एक महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है। यदि बड़े संयंत्र ऐसे क्षेत्रों में लगाए जाएँ जहाँ भूजल पहले से दबाव में है, तो उद्योग और स्थानीय समुदाय के बीच पानी को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
इस समस्या का समाधान केवल अधिक पानी उपलब्ध कराने में नहीं है। परियोजनाओं को स्थान चुनते समय स्थानीय जल उपलब्धता, मौसमी बदलाव, औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार और पुनः उपयोग, समुद्री जल के विलवणीकरण की लागत तथा जल निकासी के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करना चाहिए। समुद्री जल को सीधे सामान्य इलेक्ट्रोलाइजर में डालना सरल विकल्प नहीं है; इसके लिए उपयुक्त शुद्धीकरण और उपचार व्यवस्था जरूरी होती है।
पानी की समस्या हर परियोजना में समान नहीं होगी। तटीय औद्योगिक क्षेत्रों, जल-समृद्ध क्षेत्रों और जल-संकट वाले अंतर्देशीय क्षेत्रों की परिस्थितियाँ अलग हैं। इसलिए देश-स्तर पर एक ही समाधान लागू करने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजना बनाना अधिक उपयोगी होगा।
4. भंडारण और परिवहन: हाइड्रोजन बनाना ही काफी नहीं
हाइड्रोजन एक हल्की गैस है। इसे सुरक्षित तरीके से संग्रहित और परिवहन करने के लिए विशेष तकनीकी व्यवस्था चाहिए। सामान्य तापमान और दबाव पर इसे बड़ी मात्रा में संग्रहित करना आसान नहीं है। इसलिए परियोजना की जरूरत के अनुसार उच्च दबाव वाले टैंक, द्रवीकरण, पाइपलाइन या अमोनिया जैसे डेरिवेटिव में बदलने के विकल्पों पर विचार किया जाता है। हर विकल्प की अपनी ऊर्जा जरूरत, पूँजी लागत और सुरक्षा संबंधी शर्तें होती हैं।
यदि हाइड्रोजन उत्पादन स्थल से बहुत दूर किसी रिफाइनरी या उर्वरक संयंत्र तक पहुँचाना है, तो परिवहन की लागत अंतिम कीमत को बढ़ा सकती है। हाइड्रोजन को तरल बनाने के लिए अत्यंत कम तापमान चाहिए, जबकि उच्च दबाव पर संग्रहण के लिए मजबूत और विशेष रूप से डिजाइन किए गए उपकरण आवश्यक होते हैं। इसलिए केवल उत्पादन संयंत्र की लागत देखकर पूरी आपूर्ति-श्रृंखला का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
अमोनिया इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकल्प है, क्योंकि मौजूदा उर्वरक उद्योग में इसका उपयोग पहले से होता है और इसे हाइड्रोजन के वाहक के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन ग्रीन हाइड्रोजन से ग्रीन अमोनिया बनाने में अतिरिक्त प्रक्रिया, ऊर्जा और निवेश की जरूरत पड़ती है। यदि बाद में अमोनिया से हाइड्रोजन दोबारा निकालना हो, तो और लागत तथा ऊर्जा खपत जुड़ सकती है। इसलिए डेरिवेटिव चुनने का निर्णय अंतिम उपयोग और परिवहन दूरी के आधार पर होना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण पहलू सुरक्षा है। हाइड्रोजन के रिसाव, ज्वलनशीलता, सामग्री के साथ उसकी अनुकूलता और उच्च दबाव वाले उपकरणों के संचालन के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी, स्पष्ट मानक और नियमित निरीक्षण जरूरी हैं। भारत में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ भंडारण, परिवहन और उपयोग के लिए सुरक्षित तथा भरोसेमंद नेटवर्क विकसित करना भी आवश्यक होगा।
5. उद्योगों की वास्तविक मांग: खरीदार तैयार हैं या सिर्फ घोषणाएँ हो रही हैं?
ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग की सफलता का अंतिम परीक्षण उत्पादन नहीं, बल्कि उसकी लगातार खरीद है। कोई कंपनी संयंत्र लगाने में तभी बड़ा निवेश करेगी जब उसे भरोसा हो कि खरीदार लंबे समय तक उत्पाद खरीदेंगे और कीमत परियोजना को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाएगी। दूसरी ओर, उद्योग तभी ग्रीन हाइड्रोजन अपनाने के लिए तैयार होंगे जब इसकी कीमत, आपूर्ति और तकनीकी गुणवत्ता उनकी जरूरतों के अनुकूल होगी।
भारत में रिफाइनरी और उर्वरक क्षेत्र शुरुआती मांग के महत्वपूर्ण स्रोत हो सकते हैं, क्योंकि इन उद्योगों में हाइड्रोजन या अमोनिया की मौजूदा खपत है। इस तरह नए उपयोग के लिए पूरी तरह नया बाजार बनाने के बजाय कुछ मौजूदा औद्योगिक जरूरतों को कम उत्सर्जन वाले विकल्प में बदला जा सकता है। स्टील क्षेत्र में भी ग्रीन हाइड्रोजन के उपयोग के पायलट प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, लेकिन तकनीकी प्रदर्शन, लागत और बड़े पैमाने पर संचालन के परिणामों का मूल्यांकन जरूरी है।
मार्च 2026 में जारी सरकारी जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय मिशन के तहत 18 कंपनियों को कुल 8.62 लाख मीट्रिक टन प्रतिवर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता के लिए प्रोत्साहन आवंटित किए गए थे। ग्रीन अमोनिया के लिए 13 उर्वरक इकाइयों को आपूर्ति से जुड़ी निविदाओं में कुल 7.24 लाख मीट्रिक टन प्रतिवर्ष की मात्रा के लिए कीमतें तय की गई थीं। रिफाइनरी क्षेत्र में भी उत्पादन और आपूर्ति के लिए परियोजनाएँ आवंटित की गईं।
ये कदम बाजार तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आवंटित क्षमता, निविदा में तय कीमत, हस्ताक्षरित खरीद समझौता और वास्तव में वितरित उत्पाद अलग-अलग पड़ाव हैं। किसी परियोजना की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब संयंत्र चालू हो, उत्पाद तय गुणवत्ता के साथ उपलब्ध हो और खरीदार नियमित रूप से उसकी खरीद करे।
यदि पारंपरिक हाइड्रोजन या अन्य ईंधन सस्ते बने रहते हैं, तो उद्योगों के लिए ग्रीन विकल्प अपनाने का आर्थिक प्रोत्साहन कमजोर हो सकता है। इसके लिए लंबी अवधि के खरीद समझौते, स्पष्ट नियम, कार्बन उत्सर्जन के भरोसेमंद मानक और लागत का अंतर कम करने वाली नीतियाँ मददगार हो सकती हैं। लेकिन सरकारी सहायता को स्थायी व्यावसायिक मांग का विकल्प नहीं माना जा सकता।
6. इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और तकनीक में आत्मनिर्भरता
इलेक्ट्रोलाइजर ग्रीन हाइड्रोजन संयंत्र का प्रमुख उपकरण है। इसकी लागत, दक्षता, टिकाऊपन और रखरखाव की जरूरत उत्पादन की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। भारत ने घरेलू इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय मिशन के तहत सहायता योजनाएँ शुरू की हैं। मार्च 2026 की सरकारी जानकारी के अनुसार, 15 कंपनियों को कुल 3,000 मेगावाट प्रतिवर्ष की इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण क्षमता के लिए प्रोत्साहन आवंटित किया गया था।
घरेलू निर्माण से आयात पर निर्भरता घटाने, स्थानीय आपूर्ति-श्रृंखला विकसित करने और तकनीकी अनुभव बढ़ाने में मदद मिल सकती है। लेकिन निर्माण क्षमता घोषित होने का मतलब यह नहीं कि उपकरण तुरंत कम कीमत पर और बड़े पैमाने पर उपलब्ध हो जाएँगे। गुणवत्ता, दक्षता, उपकरणों की उम्र, सेवा नेटवर्क, जरूरी सामग्री और प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत पर भी ध्यान देना होगा।
इलेक्ट्रोलाइजर की तकनीक के अलग-अलग प्रकार हैं, जैसे अल्कलाइन और PEM इलेक्ट्रोलाइजर। इनके संचालन, लागत, सामग्री और बदलती बिजली आपूर्ति के साथ काम करने की विशेषताएँ अलग हो सकती हैं। किसी एक तकनीक को हर परियोजना के लिए सबसे बेहतर मानना उचित नहीं होगा। सही चुनाव बिजली की उपलब्धता, संचालन के तरीके, पानी की गुणवत्ता, रखरखाव और वित्तीय गणना पर निर्भर करता है।
7. सरकार की नीतियाँ क्या कर सकती हैं और उनकी सीमाएँ क्या हैं?
राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन उत्पादन प्रोत्साहन, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, पायलट परियोजनाओं, अनुसंधान और बुनियादी ढाँचे के विकास के जरिए बाजार को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। SIGHT कार्यक्रम के तहत इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को प्रोत्साहित करने के प्रावधान हैं। नवीकरणीय बिजली की उपलब्धता और अंतरराज्यीय पारेषण से संबंधित नीतियाँ भी परियोजनाओं की लागत पर असर डाल सकती हैं।
नीतिगत सहायता शुरुआती वर्षों में महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि नई तकनीक के संयंत्रों की पूँजी लागत अधिक होती है और उद्योग को बड़े पैमाने पर उत्पादन का अनुभव अभी विकसित करना है। लेकिन केवल सब्सिडी से स्थायी प्रतिस्पर्धात्मकता नहीं बनती। यदि उपकरण महँगे रहें, बिजली की लागत अधिक हो, संयंत्र कम चले या खरीदार तैयार न हों, तो सहायता समाप्त होने के बाद परियोजनाएँ आर्थिक दबाव में आ सकती हैं।
इसलिए सरकार और उद्योग के लिए जरूरी है कि सहायता को स्पष्ट परिणामों से जोड़ा जाए। उदाहरण के लिए, वास्तविक उत्पादन, प्रति किलोग्राम लागत में कमी, घरेलू उपकरणों की दक्षता, दीर्घकालिक खरीद समझौते और प्रमाणित उत्सर्जन में कमी जैसे संकेतकों पर निगरानी की जा सकती है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि सार्वजनिक धन से बाजार में टिकाऊ क्षमता बन रही है या केवल परियोजनाओं की घोषणा बढ़ रही है।
भारत के लिए आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?
भारत के लिए ग्रीन हाइड्रोजन में सफलता पाने का रास्ता एक साथ कई मोर्चों पर काम करने से निकलेगा। केवल बड़े संयंत्र लगाने या उत्पादन का लक्ष्य तय करने से काम पूरा नहीं होगा। परियोजनाओं को ऐसी जगह विकसित करना होगा जहाँ नवीकरणीय बिजली, पानी, परिवहन और खरीदारों की जरूरतों के बीच व्यावहारिक तालमेल हो।
| प्राथमिकता | क्या किया जाना चाहिए? | संभावित लाभ |
|---|---|---|
| सस्ती बिजली | सौर और पवन ऊर्जा का उचित मिश्रण, ग्रिड कनेक्शन और बिजली आपूर्ति की लागत का बेहतर प्रबंधन | प्रति किलोग्राम उत्पादन लागत घटाने में मदद |
| स्थानीय जल योजना | परियोजना स्थल पर पानी की उपलब्धता और पुनर्चक्रण का आकलन | जल-संकट और स्थानीय प्रतिस्पर्धा का जोखिम कम करना |
| मजबूत खरीदार आधार | रिफाइनरी, उर्वरक और अन्य उपयुक्त उद्योगों के साथ दीर्घकालिक खरीद समझौते | निवेशकों को मांग और राजस्व का भरोसा |
| भंडारण और परिवहन | उत्पादन केंद्रों के पास औद्योगिक मांग विकसित करना और सुरक्षित परिवहन विकल्प बनाना | आपूर्ति की लागत और जोखिम में कमी |
| तकनीकी आत्मनिर्भरता | घरेलू इलेक्ट्रोलाइजर, अनुसंधान, दक्षता और सेवा नेटवर्क में निवेश | लंबी अवधि में लागत और आयात निर्भरता घटाने की संभावना |
| पारदर्शी निगरानी | घोषित, निर्माणाधीन और चालू क्षमता के साथ वास्तविक उत्पादन की अलग-अलग रिपोर्टिंग | नीति के परिणामों और वास्तविक प्रगति का बेहतर आकलन |
भारत को उन उद्योगों और स्थानों से शुरुआत करनी चाहिए जहाँ हाइड्रोजन की मौजूदा मांग पहले से है और जहाँ आपूर्ति की लागत को नियंत्रित करना संभव है। उत्पादन केंद्रों को औद्योगिक खरीदारों के पास विकसित करने से परिवहन की जरूरत घट सकती है। साथ ही, परियोजनाओं के आर्थिक आकलन में केवल संयंत्र की लागत नहीं, बल्कि बिजली, पानी, भंडारण, परिवहन और वित्तपोषण को भी शामिल करना चाहिए।
एक अन्य जरूरी कदम यह है कि ग्रीन हाइड्रोजन के इस्तेमाल को हर क्षेत्र में समान रूप से बढ़ाने की कोशिश न की जाए। जहाँ सीधे बिजली से काम हो सकता है, वहाँ बिजली का सीधा उपयोग बेहतर हो सकता है। ग्रीन हाइड्रोजन को प्राथमिकता उन अनुप्रयोगों में मिलनी चाहिए जहाँ वह तकनीकी रूप से उपयोगी हो और उत्सर्जन घटाने में वास्तविक योगदान दे सके।
निष्कर्ष: भारत की असली परीक्षा लागत और मांग के बीच संतुलन है
ग्रीन हाइड्रोजन भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और उत्सर्जन घटाने का महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है। लेकिन यह अवसर अपने आप आर्थिक सफलता में नहीं बदलेगा। प्रति किलोग्राम लागत कम करनी होगी, सस्ती और भरोसेमंद नवीकरणीय बिजली सुनिश्चित करनी होगी, पानी की स्थानीय उपलब्धता का ध्यान रखना होगा और भंडारण तथा परिवहन का सुरक्षित नेटवर्क तैयार करना होगा।
सबसे अहम बात यह है कि उद्योगों को ऐसा भरोसा मिलना चाहिए कि ग्रीन हाइड्रोजन लंबे समय तक उचित कीमत पर उपलब्ध रहेगा। भारत का 2030 का लक्ष्य महत्वाकांक्षी है, लेकिन उसकी वास्तविक सफलता घोषित क्षमता से नहीं, बल्कि चालू संयंत्रों, वास्तविक उत्पादन, नियमित खरीद और लागत में टिकाऊ कमी से मापी जानी चाहिए। ग्रीन हाइड्रोजन की दौड़ में आगे वही रहेगा जो केवल उत्पादन नहीं, बल्कि पूरी आपूर्ति-श्रृंखला को प्रतिस्पर्धी बना सके।
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स्रोत / Sources:
- Press Information Bureau (PIB), Ministry of New and Renewable Energy — India Commissions 8,000 TPA Green Hydrogen Capacity till February 2026; tender price details, 25 March 2026.
- Press Information Bureau (PIB), Ministry of New and Renewable Energy — Government Drives Green Hydrogen Expansion and Strengthens Clean Energy Transition, 24 March 2026.
- Press Information Bureau (PIB) — How National Green Hydrogen Mission seeks to Reduce Cost of Green Hydrogen, 9 August 2023.
- Council on Energy, Environment and Water (CEEW) / Climate Finance Leadership Initiative India — Financing Green Hydrogen in India, 18 June 2024.
- NITI Aayog — Harnessing Green Hydrogen: The Future of Hydrogen in India.
- NITI Aayog — पानी की जरूरत और ऊर्जा क्षेत्र के संसाधनों पर अध्ययन संबंधी जानकारी।
- International Energy Agency (IEA) — Strategic Interventions for Green Hydrogen Transition (SIGHT) Programme.
- Asian Development Bank (ADB) — India’s Green Hydrogen Review and Perspective, February 2025.
अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों, शोध रिपोर्टों और नीतिगत स्रोतों पर आधारित सूचनात्मक विश्लेषण है। लागत, निविदा दरें और उत्पादन क्षमता परियोजना, समय, करों तथा आपूर्ति की शर्तों के अनुसार बदल सकती हैं। घोषित या आवंटित क्षमता को वास्तविक उत्पादन नहीं माना जाना चाहिए। निवेश या व्यावसायिक निर्णय लेने से पहले संबंधित आधिकारिक दस्तावेजों और परियोजना की नवीनतम जानकारी की जाँच करें।

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