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Kavach System 2026: भारतीय रेलवे में चुनौतियाँ और ट्रेन सुरक्षा

लेखक: आकाश दीप | युगबोध

भारतीय रेलवे में कवच सिस्टम से ट्रेन सुरक्षा और ऑटोमैटिक ब्रेकिंग तकनीक का चित्रण

भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है। हर दिन करोड़ों यात्रियों की आवाजाही, लंबी दूरी की ट्रेनें, मालगाड़ियां और व्यस्त रेलवे जंक्शन इस नेटवर्क को बेहद जटिल बनाते हैं। ऐसे में ट्रेन सुरक्षा केवल पटरियों और सिग्नल की व्यवस्था तक सीमित नहीं रह सकती। तकनीक की मदद से मानवीय भूल के कारण होने वाले जोखिम को कम करना भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से भारतीय रेलवे में स्वदेशी कवच (Kavach) ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम लागू किया जा रहा है।

कवच को इस तरह विकसित किया गया है कि जब ट्रेन निर्धारित गति सीमा का उल्लंघन करे या लोको पायलट किसी खतरे वाले सिग्नल के बावजूद समय पर कार्रवाई न करे, तो परिस्थितियों के अनुसार यह सिस्टम चेतावनी देने और अपने आप ब्रेक लगाने में मदद कर सके। हालांकि, इतनी बड़ी रेलवे व्यवस्था में इस तकनीक को लागू करना आसान नहीं है। इसके लिए ट्रैक, स्टेशन, लोकोमोटिव, संचार नेटवर्क, सिग्नलिंग सिस्टम और प्रशिक्षित कर्मचारियों के बीच तालमेल जरूरी है।

इस लेख में हम समझेंगे कि कवच सिस्टम क्या है, यह कैसे काम करता है, इसे लागू करने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और भारतीय रेलवे के लिए इसकी सफलता क्यों महत्वपूर्ण है।

कवच सिस्टम क्या है?

कवच भारतीय रेलवे का स्वदेशी Automatic Train Protection (ATP) सिस्टम है। इसका उद्देश्य ट्रेन परिचालन के दौरान सुरक्षा की एक अतिरिक्त तकनीकी परत उपलब्ध कराना है। यह ट्रेन की गति, सिग्नल से जुड़ी जानकारी और निर्धारित परिचालन सीमाओं के आधार पर लोको पायलट की सहायता करता है। यदि ट्रेन की स्थिति में सुरक्षा संबंधी जोखिम पैदा होता है, तो सिस्टम निर्धारित परिस्थितियों में चेतावनी और स्वचालित ब्रेकिंग के माध्यम से हस्तक्षेप कर सकता है।

कवच को Research Designs and Standards Organisation (RDSO) और भारतीय रेलवे की तकनीकी व्यवस्था के अंतर्गत विकसित किया गया। यात्री ट्रेनों पर इसके शुरुआती फील्ड ट्रायल फरवरी 2016 में शुरू हुए और जुलाई 2020 में इसे भारतीय रेलवे की राष्ट्रीय Automatic Train Protection प्रणाली के रूप में अपनाया गया। कवच के लिए SIL-4 स्तर का सुरक्षा प्रमाणन महत्वपूर्ण है, जो रेलवे सिग्नलिंग में अत्यंत उच्च सुरक्षा आवश्यकताओं से जुड़ा है।

कवच सिस्टम की जरूरत क्यों पड़ी?

परंपरागत रेलवे परिचालन में लोको पायलट को ट्रैक के किनारे लगे सिग्नल देखकर ट्रेन की गति नियंत्रित करनी होती है। आधुनिक सिग्नलिंग और इंटरलॉकिंग सिस्टम सुरक्षा बढ़ाते हैं, लेकिन ट्रेन चलाने वाले व्यक्ति को भी सिग्नल की स्थिति समझकर सही समय पर निर्णय लेना पड़ता है। कम दृश्यता, घना कोहरा, सिग्नल को गलत समझना, अचानक बदलती परिचालन परिस्थितियां और अधिक गति जैसी स्थितियां जोखिम बढ़ा सकती हैं।

कवच इस व्यवस्था में अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता है। इसका उद्देश्य लोको पायलट की जगह लेना नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण परिस्थितियों में उसकी सहायता करना है। यह अंतर समझना जरूरी है, क्योंकि ट्रेन सुरक्षा केवल किसी एक तकनीक पर निर्भर नहीं करती। सुरक्षित ट्रैक, सही सिग्नल, प्रभावी ट्रेन नियंत्रण, नियमित रखरखाव और प्रशिक्षित कर्मचारी भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

कवच सिस्टम कैसे काम करता है?

कवच की कार्यप्रणाली ट्रैक पर लगे उपकरणों, स्टेशन के सिग्नलिंग सिस्टम, संचार नेटवर्क और ट्रेन में लगाए गए उपकरणों के बीच समन्वय पर आधारित है। इसके प्रमुख हिस्से निम्नलिखित हैं:

  • लोको कवच: ट्रेन में लगाया जाने वाला उपकरण, जो आवश्यक परिचालन जानकारी प्राप्त करता है और निर्धारित परिस्थितियों में ट्रेन की सुरक्षा में हस्तक्षेप कर सकता है।
  • स्टेशन और ट्रैकसाइड उपकरण: स्टेशन तथा संबंधित रेल खंड की सिग्नलिंग और परिचालन जानकारी के साथ सिस्टम का समन्वय करते हैं।
  • RFID टैग: ट्रैक पर निर्धारित स्थानों पर लगाए गए टैग ट्रेन की लोकेशन पहचानने में सहायता करते हैं।
  • ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC): विभिन्न स्थानों के बीच आवश्यक संचार नेटवर्क उपलब्ध कराने में मदद करती है।
  • टेलीकॉम टावर और रेडियो संचार: ट्रैकसाइड तथा ट्रेन में लगे उपकरणों के बीच आवश्यक डेटा संचार को संभव बनाते हैं।

जब ट्रेन आगे बढ़ती है, तो सिस्टम उपलब्ध सिग्नलिंग और लोकेशन संबंधी जानकारी के आधार पर उसकी स्थिति का आकलन करता है। यदि ट्रेन निर्धारित सुरक्षा सीमा से आगे बढ़ने लगे या गति नियंत्रित करने की जरूरत हो, तो सिस्टम चेतावनी दे सकता है और निर्धारित परिस्थितियों में ब्रेक लगाने की कार्रवाई कर सकता है। वास्तविक हस्तक्षेप सिस्टम की उपलब्ध जानकारी, कॉन्फिगरेशन और सुरक्षा नियमों पर निर्भर करता है।

कवच सिस्टम लागू करने की प्रमुख चुनौतियां

1. विशाल रेलवे नेटवर्क पर इंस्टॉलेशन

भारतीय रेलवे का नेटवर्क हजारों किलोमीटर में फैला हुआ है। कवच को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए केवल कुछ प्रमुख स्टेशनों पर उपकरण लगाना पर्याप्त नहीं है। संबंधित रेल खंडों में ट्रैकसाइड सिस्टम, स्टेशन उपकरण, RFID टैग, संचार नेटवर्क और लोकोमोटिव पर आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था करनी होती है।

यह काम चरणबद्ध तरीके से करना पड़ता है। व्यस्त रेल मार्गों पर इंस्टॉलेशन के दौरान नियमित ट्रेन परिचालन भी जारी रखना होता है। इसके कारण कार्य की योजना, ट्रैफिक ब्लॉक, उपकरणों की आपूर्ति, इंजीनियरिंग टीमों की उपलब्धता और सुरक्षा परीक्षण का समन्वय बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

2. भारी लागत और वित्तीय प्रबंधन

कवच सिस्टम के विस्तार के लिए ट्रैकसाइड उपकरण, स्टेशन सिस्टम, लोकोमोटिव उपकरण, संचार नेटवर्क और तकनीकी परीक्षणों पर निवेश करना पड़ता है। इसके अलावा भविष्य में रखरखाव, सॉफ्टवेयर अपडेट, खराब उपकरणों को बदलने और कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने का खर्च भी जुड़ता है।

रेलवे मंत्रालय की 11 मार्च 2026 की सरकारी जानकारी के अनुसार, ट्रैकसाइड और स्टेशन उपकरण लगाने की अनुमानित लागत लगभग ₹50 लाख प्रति किलोमीटर तथा लोकोमोटिव पर कवच उपकरण लगाने की लागत लगभग ₹80 लाख प्रति लोकोमोटिव बताई गई थी। ये अनुमानित लागतें हैं; वास्तविक परियोजना लागत स्थान, काम के दायरे और संबंधित उपकरणों के अनुसार अलग हो सकती है।

खर्च का प्रकार सरकारी अनुमान
ट्रैकसाइड और स्टेशन उपकरण लगभग ₹50 लाख प्रति किलोमीटर
लोकोमोटिव में कवच उपकरण लगभग ₹80 लाख प्रति लोकोमोटिव

इस स्तर के निवेश के कारण रेलवे को प्राथमिकता वाले मार्गों का चयन, बजट का प्रभावी उपयोग और परियोजनाओं की समय पर निगरानी करनी पड़ती है। केवल शुरुआती इंस्टॉलेशन के लिए बजट रखना पर्याप्त नहीं है; सिस्टम को लंबे समय तक विश्वसनीय बनाए रखना भी जरूरी है।

3. पुराने सिग्नलिंग सिस्टम के साथ तालमेल

भारतीय रेलवे में अलग-अलग समय पर विकसित किए गए सिग्नलिंग और इंटरलॉकिंग सिस्टम मौजूद हैं। कुछ स्थानों पर पुराने उपकरण हैं, जबकि अन्य जगहों पर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग का उपयोग होता है। कवच को इन व्यवस्थाओं के साथ सुरक्षित और विश्वसनीय तरीके से जोड़ना एक तकनीकी चुनौती है।

कवच संस्करण 4.0 में लोकेशन की बेहतर सटीकता, बड़े यार्ड में सिग्नल की जानकारी और मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम के साथ इंटरफेस जैसे सुधार किए गए हैं। फिर भी हर रेल खंड की स्थानीय परिस्थितियों का आकलन करना और आवश्यक परीक्षण करना जरूरी रहता है।

4. सुरक्षा परीक्षण और प्रमाणन

रेलवे सुरक्षा प्रणाली में छोटी-सी तकनीकी गलती भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। इसलिए कवच को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले उपकरणों, सॉफ्टवेयर, संचार व्यवस्था और ट्रेन के साथ उसके व्यवहार का परीक्षण करना आवश्यक है। सुरक्षा प्रमाणन, स्वतंत्र मूल्यांकन और विभिन्न परिचालन परिस्थितियों में सिस्टम का सत्यापन इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा हैं।

तेज गति से इंस्टॉलेशन पूरा करने की जरूरत और कठोर सुरक्षा परीक्षणों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होता। परीक्षणों को जल्दबाजी में पूरा करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य ही ट्रेन परिचालन में सुरक्षा बढ़ाना है।

5. विभिन्न कंपनियों के उपकरणों में इंटरऑपरेबिलिटी

कवच के विस्तार के लिए कई प्रकार के उपकरणों और तकनीकी प्रणालियों को एक साथ काम करना पड़ता है। यदि अलग-अलग निर्माताओं के उपकरणों के बीच तालमेल की समस्या आती है, तो परीक्षण, स्थापना और रखरखाव में अतिरिक्त समय लग सकता है।

मार्च 2026 में रेल मंत्रालय ने Universal Braking Algorithm (UBA) जैसे तकनीकी सुधारों की जानकारी दी थी। इसका उद्देश्य अलग-अलग निर्माताओं के लिए ब्रेकिंग संबंधी गणनाओं को अधिक मानकीकृत करना और बार-बार परीक्षण की जरूरत कम करके विस्तार को आसान बनाना है। हालांकि, इंटरऑपरेबिलिटी सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी मानकों और सुरक्षा सत्यापन का पालन फिर भी आवश्यक है।

6. लोकोमोटिव पर उपकरण लगाना

कवच के लाभ प्राप्त करने के लिए संबंधित रेल खंड के ट्रैकसाइड सिस्टम के साथ ट्रेन में आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है। भारतीय रेलवे के पास बड़ी संख्या में लोकोमोटिव हैं और अलग-अलग प्रकार की ट्रेनों का परिचालन होता है। प्रत्येक उपयुक्त लोकोमोटिव में उपकरण लगाना, उनका परीक्षण करना और सही तरीके से चालू रखना एक बड़ा कार्य है।

रेलवे को उपकरणों की उपलब्धता, लोकोमोटिव के रखरखाव कार्यक्रम, तकनीकी कर्मचारियों और परिचालन शेड्यूल के बीच तालमेल बैठाना पड़ता है। यदि किसी मार्ग पर ट्रैकसाइड उपकरण उपलब्ध हों लेकिन संबंधित ट्रेन में आवश्यक कवच उपकरण न हो, तो उस ट्रेन के लिए कवच-आधारित सुरक्षा की उपलब्धता सीमित हो सकती है।

7. कर्मचारियों की ट्रेनिंग और तकनीकी दक्षता

नई सुरक्षा तकनीक को सफल बनाने के लिए मशीनें और सॉफ्टवेयर ही पर्याप्त नहीं हैं। लोको पायलट, सहायक लोको पायलट, सिग्नलिंग कर्मचारी, इंजीनियर और रखरखाव टीमों को सिस्टम की कार्यप्रणाली और आपात परिस्थितियों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया की जानकारी होनी चाहिए।

रेलवे मंत्रालय की 11 मार्च 2026 की जानकारी के अनुसार, उस समय तक 55,000 से अधिक तकनीशियनों, ऑपरेटरों और इंजीनियरों को कवच तकनीक से संबंधित प्रशिक्षण दिया जा चुका था। इसमें लगभग 47,500 लोको पायलट और सहायक लोको पायलट शामिल थे। नेटवर्क का विस्तार जारी रहने पर नए कर्मचारियों के प्रशिक्षण और मौजूदा कर्मचारियों की दक्षता बनाए रखना भी लगातार जरूरी रहेगा।

8. रखरखाव और तकनीकी खराबियों की निगरानी

किसी भी डिजिटल सुरक्षा प्रणाली को लंबे समय तक प्रभावी रखने के लिए नियमित निरीक्षण, सॉफ्टवेयर अपडेट, उपकरणों की जांच और खराबियों की समय पर पहचान जरूरी है। ट्रैक पर लगे उपकरण मौसम, धूल, कंपन और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों के संपर्क में रहते हैं। दूर-दराज के रेल खंडों में तकनीकी सहायता पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

रेलवे को यह सुनिश्चित करना होगा कि उपकरणों में खराबी आने पर उसकी पहचान और मरम्मत के लिए स्पष्ट प्रक्रिया हो। सिस्टम की उपलब्धता, तकनीकी घटनाओं का रिकॉर्ड, नियमित परीक्षण और प्रशिक्षित रखरखाव टीम सुरक्षा व्यवस्था का जरूरी हिस्सा हैं।

9. घने कोहरे और कठिन भौगोलिक परिस्थितियां

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में मौसम और भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं। उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान घना कोहरा, कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और अन्य स्थानों पर कठिन भूभाग रेलवे परिचालन को प्रभावित कर सकते हैं। कवच का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों में ट्रेन सुरक्षा को मजबूत करना भी है, लेकिन इसे विश्वसनीय बनाने के लिए संबंधित क्षेत्र में उचित उपकरण, संचार और परीक्षण आवश्यक हैं।

किसी तकनीक की सफलता केवल सामान्य परिस्थितियों में उसके काम करने से तय नहीं होती। उसे उन परिस्थितियों में भी निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुसार काम करना चाहिए, जिनमें ट्रेन संचालन अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

10. नियमित ट्रेन परिचालन के बीच काम पूरा करना

भारतीय रेलवे को कवच लगाने के लिए हर जगह लंबे समय तक ट्रेन परिचालन रोकना संभव नहीं है। यात्री ट्रेनें और मालगाड़ियां लगातार चलती रहती हैं। इसलिए कई स्थानों पर उपकरण लगाने, केबल बिछाने, कनेक्शन करने और परीक्षण के लिए सीमित समय उपलब्ध होता है।

रेलवे को ट्रैफिक ब्लॉक की योजना बनानी होती है ताकि सुरक्षा कार्य भी हो सके और परिचालन पर अनावश्यक असर भी न पड़े। यदि किसी खंड में काम की योजना, उपकरण आपूर्ति या परीक्षण में देरी होती है, तो पूरे प्रोजेक्ट की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है।

कवच 4.0 की प्रगति: सरकारी आंकड़े क्या बताते हैं?

कवच का विस्तार चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। मार्च 2026 और जुलाई 2026 में जारी सरकारी जानकारी में चालू किए गए मार्गों और चल रहे काम के अलग-अलग आंकड़े दिए गए हैं। आंकड़ों की तुलना करते समय उनकी तारीख और यह अंतर समझना जरूरी है कि कोई मार्ग चालू हो चुका है या वहां केवल इंस्टॉलेशन का काम चल रहा है।

प्रगति का विवरण सरकारी आंकड़ा तारीख
कवच 4.0 चालू 1,452 रूट किलोमीटर 11 मार्च 2026
कवच 4.0 चालू 2,633 रूट किलोमीटर 31 जुलाई 2026 तक
ट्रैकसाइड कवच कार्य का दायरा 24,427 रूट किलोमीटर 11 मार्च 2026 की जानकारी
कवच कार्यों पर संचयी खर्च ₹3,875 करोड़ जून 2026 तक

स्रोत: रेल मंत्रालय की प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की 11 मार्च 2026 और 5 अगस्त 2026 की विज्ञप्तियां। अलग-अलग तारीखों के आंकड़े हैं, इसलिए इन्हें एक ही समय के आंकड़ों के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कवच का विस्तार हो रहा है, लेकिन चालू किए गए मार्गों और प्रस्तावित या निर्माणाधीन मार्गों के बीच अंतर बना हुआ है। वास्तविक सफलता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि कितने महत्वपूर्ण मार्गों पर सिस्टम चालू है, संबंधित ट्रेनों में उपकरण उपलब्ध हैं और पूरे सिस्टम का रखरखाव कितनी प्रभावी ढंग से हो रहा है।

क्या कवच सभी रेल दुर्घटनाओं को रोक सकता है?

कवच ट्रेन सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसे सभी प्रकार की रेल दुर्घटनाओं का पूर्ण समाधान मानना सही नहीं होगा। इसका प्रमुख उद्देश्य निर्धारित परिचालन परिस्थितियों में ट्रेन की गति और सिग्नल से संबंधित जोखिमों को कम करना है। दुर्घटनाओं के अन्य कारणों के लिए अलग सुरक्षा उपायों की जरूरत होती है।

उदाहरण के लिए, ट्रैक में टूट-फूट, पुल या संरचना की खराबी, पटरियों पर बाहरी वस्तु, रखरखाव की कमी और अन्य तकनीकी या परिचालन समस्याओं के लिए अलग निरीक्षण एवं सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है। कवच के साथ-साथ ट्रैक मॉनिटरिंग, सिग्नलिंग, इंटरलॉकिंग, कर्मचारियों की ट्रेनिंग, रखरखाव और दुर्घटना जांच की व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।

कवच सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने के लिए क्या जरूरी है?

  • प्राथमिकता वाले मार्ग: अधिक यातायात और अधिक परिचालन महत्व वाले मार्गों पर योजनाबद्ध तरीके से काम पूरा करना।
  • समयबद्ध इंस्टॉलेशन: उपकरणों की आपूर्ति, निर्माण, परीक्षण और कमीशनिंग के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय करना।
  • सुरक्षा परीक्षण: सिस्टम चालू करने से पहले निर्धारित मानकों के अनुसार सभी जरूरी परीक्षण पूरे करना।
  • कर्मचारियों का प्रशिक्षण: लोको पायलटों और तकनीकी टीमों के लिए नियमित प्रशिक्षण एवं अभ्यास सुनिश्चित करना।
  • रखरखाव की व्यवस्था: खराबी की पहचान, मरम्मत और सिस्टम की उपलब्धता पर नियमित निगरानी रखना।
  • तकनीकी तालमेल: अलग-अलग निर्माताओं के उपकरणों के बीच मानकों और इंटरऑपरेबिलिटी को सुनिश्चित करना।
  • पारदर्शी प्रगति रिपोर्ट: चालू मार्गों, इंस्टॉलेशन के अधूरे काम, खर्च और समय-सीमा की नियमित जानकारी सार्वजनिक करना।

निष्कर्ष: तकनीक के साथ मजबूत सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी

कवच भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण और ट्रेन सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण स्वदेशी पहल है। यह लोको पायलट की सहायता कर सकता है और निर्धारित परिस्थितियों में स्वचालित ब्रेकिंग के माध्यम से जोखिम कम करने में भूमिका निभा सकता है। लेकिन इतने बड़े नेटवर्क में इसका विस्तार केवल उपकरण लगाने का काम नहीं है। इसमें लागत, संचार नेटवर्क, सिग्नलिंग सिस्टम, सुरक्षा प्रमाणन, कर्मचारियों की ट्रेनिंग और लंबे समय तक रखरखाव जैसी कई चुनौतियां शामिल हैं।

आने वाले समय में कवच की वास्तविक प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी सावधानी से लागू किया जाता है और इसके साथ रेलवे की दूसरी सुरक्षा व्यवस्थाओं को कितना मजबूत बनाया जाता है। यात्रियों की सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक, अनुशासित परिचालन और नियमित रखरखाव—तीनों का साथ जरूरी है।

स्रोत / Sources:

1. Press Information Bureau, Ministry of Railways, "Kavach 4.0 Successfully Commissioned on 1,452 Route Km Covering High-Density Delhi–Mumbai and Delhi–Howrah Routes", 11 March 2026. आधिकारिक स्रोत

2. Press Information Bureau, Ministry of Railways, "Kavach 4.0 Successfully Commissioned on 2,633 Route Kilometres", 5 August 2026. आधिकारिक स्रोत

3. Press Information Bureau, "On Safer Tracks: How Kavach and AI Are Strengthening Railway Safety in India", 6 February 2026. आधिकारिक स्रोत

4. Press Information Bureau, Ministry of Railways, "Indian Railways Commissions KAVACH 4.0 for the First Time on South Central Railway", 23 September 2026. आधिकारिक स्रोत

Disclaimer: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी जानकारी और आधिकारिक स्रोतों के आधार पर सामान्य जानकारी देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। आंकड़े संबंधित स्रोतों में दी गई तारीखों के अनुसार हैं और समय के साथ बदल सकते हैं। किसी भी नवीनतम प्रगति या आधिकारिक निर्णय के लिए भारतीय रेलवे और रेल मंत्रालय की आधिकारिक घोषणाओं को देखें।

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