Est. 2025 · लेखक: आकाश दीप

राजनीति, इतिहास, रक्षा और अर्थव्यवस्था

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Critical Minerals War: Lithium, Rare Earths और China से भारत की बड़ी चुनौती

लेखक: आकाश दीप | युगबोध

Critical Minerals की वैश्विक दौड़ में भारत, चीन और Rare Earth Supply Chain

एक विरोधाभास जो सब कुछ कहता है

बीसवीं सदी में जब भी कोई देश किसी दूसरे देश पर दबाव बनाना चाहता था, तो सबसे पहला हथियार तेल होता था। जिसके पास तेल के भंडार थे, या जिसकी तेल तक पहुंच थी, वही दुनिया की राजनीति तय करता था। लेकिन 2026 में आकर यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज अगर किसी देश को झुकाना हो, तो तेल के कुएं बंद करने की ज़रूरत नहीं, सिर्फ कुछ खास खनिजों के निर्यात पर रोक लगा देना काफी है। और यह कोई काल्पनिक बात नहीं, यह ठीक वही हो चुका है, 2025 की शुरुआत में जब चीन ने कुछ भारी दुर्लभ खनिजों के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा किया, तो भारत की इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों और सटीक उपकरण बनाने वाली फैक्ट्रियों में तुरंत देरी, मजबूरन विकल्प तलाशना, और मुनाफे पर दबाव शुरू हो गया।

23 सितंबर 2026 को Observer Research Foundation ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की, जिसमें बताया गया कि भारत के पास रक्षा-महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिज चुंबकों का जो भंडार इस्तेमाल करने लायक है, वह सिर्फ दो से तीन हफ्तों का है। और यह तब है जब भारत के पास दुनिया के तीसरे सबसे बड़े दुर्लभ मृदा खनिज भंडार मौजूद हैं। सोचिए, अगर कल को कोई बड़ा भू-राजनीतिक संकट खड़ा हो जाए और आपूर्ति रुक जाए, तो भारत की रक्षा उत्पादन प्रणाली सिर्फ कुछ हफ्तों में ही लड़खड़ा सकती है। यही वह विरोधाभास है जिसे समझना आज सबसे ज़रूरी हो गया है, संसाधन मौजूद हैं, लेकिन उन्हें इस्तेमाल लायक बनाने की क्षमता नहीं।

आज हम इसी पूरी लड़ाई को विस्तार से समझेंगे, क्रिटिकल मिनरल्स आखिर हैं क्या, इनकी मांग इतनी तेज़ी से क्यों बढ़ रही है, चीन की यह लगभग-एकाधिकार जैसी स्थिति कैसे बनी, इलेक्ट्रिक वाहन से लेकर रक्षा उपकरणों तक हर क्षेत्र में इसका असर क्या पड़ रहा है, भारत की रणनीति कितनी मज़बूत या कमज़ोर है, और यह वैश्विक लड़ाई आगे किस दिशा में जा सकती है।

Critical Minerals की परिभाषा

महत्वपूर्ण खनिज वे धातु और तत्व हैं जो आधुनिक तकनीक की रीढ़ बन चुके हैं, लेकिन जिनका उत्पादन दुनिया में बेहद गिनी-चुनी जगहों पर केंद्रित है। इनमें लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तांबा, ग्रेफाइट और दुर्लभ मृदा तत्व यानी रेयर अर्थ एलिमेंट्स शामिल हैं। अमेरिका इस सूची में पचास खनिज गिनता है, यूरोपीय संघ चौंतीस, और भारत ने भी अपनी एक सूची में तीस ऐसे खनिज चिह्नित किए हैं, जिनमें सत्रह दुर्लभ मृदा तत्व भी शामिल हैं।

यह खनिज इतने अहम क्यों हैं, इसे एक उदाहरण से समझिए। लिथियम के बिना कोई भी इलेक्ट्रिक वाहन की बैटरी नहीं बन सकती, कोबाल्ट और निकेल भी उसी बैटरी का अहम हिस्सा हैं, और नियोडिमियम, प्रेसियोडिमियम, डिस्प्रोसियम तथा टर्बियम जैसे दुर्लभ मृदा तत्व उन शक्तिशाली चुंबकों में इस्तेमाल होते हैं जो पवन टरबाइन, इलेक्ट्रिक वाहन के मोटर, और लड़ाकू विमानों के गाइडेंस सिस्टम तक में लगते हैं। कुछ खनिज, जैसे एल्युमिनियम और पैलेडियम, ज़मीन में इतनी भरपूर मात्रा में मौजूद हैं कि 2050 तक और उससे आगे भी दुनिया की मांग आसानी से पूरी हो सकती है, लेकिन लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में यह बात लागू नहीं होती, क्योंकि यह बेहद सीमित भौगोलिक इलाकों में ही केंद्रित हैं।

रिफाइनिंग का असली खेल

यह समझना इस पूरी बहस की सबसे ज़रूरी कुंजी है। बहुत से लोग सोचते हैं कि चीन की ताकत इसलिए है क्योंकि उसके पास सबसे ज़्यादा खनिज भंडार हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं। International Energy Agency के मुताबिक, लिथियम, निकेल और कोबाल्ट जैसे कई खनिजों में चीन की कच्चे माल के खनन में हिस्सेदारी सिर्फ दस से तीस प्रतिशत के बीच है, लेकिन उसकी रिफाइनिंग यानी प्रसंस्करण में हिस्सेदारी साठ से सत्तर प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

यानी असली ताकत कच्चा माल निकालने में नहीं, बल्कि उसे इस्तेमाल करने लायक शुद्ध रूप में बदलने में है, और यही वह हिस्सा है जहां चीन ने पिछले तीन दशकों में इतना भारी, लगातार निवेश किया है कि आज कोई भी देश उसकी बराबरी नहीं कर पाता। 2025 में दुनिया के कुल रिफाइंड लिथियम का नब्बे प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन और चिली से आया, जिसमें चीन सबसे ऊपर रहा। रेयर अर्थ एलिमेंट्स की बात करें तो चीन दुनिया के नब्बे प्रतिशत रिफाइनिंग पर काबिज़ है, और बीस प्रमुख ऊर्जा-संबंधी खनिजों में से उन्नीस में वह दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनर है, जिसकी औसत वैश्विक हिस्सेदारी करीब सत्तर प्रतिशत बैठती है।

खनिज चीन की रिफाइनिंग हिस्सेदारी
रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट करीब नब्बे प्रतिशत
रिफाइंड कोबाल्ट करीब पचहत्तर प्रतिशत
रिफाइंड लिथियम करीब साठ प्रतिशत
निकेल रिफाइनिंग इंडोनेशिया में भारी चीनी निवेश के ज़रिए बड़ा हिस्सा

एक और दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चीन का यह दबदबा सिर्फ कच्चे माल के निर्यात के आंकड़ों में नहीं दिखता, क्योंकि चीन की अपनी बैटरी और चुंबक बनाने वाली इंडस्ट्री ही ज़्यादातर रिफाइंड माल खुद खपा लेती है। यानी अमेरिका भले ही सीधे चीन से रिफाइंड लिथियम न खरीदता हो, लेकिन वह चीन में बनी लिथियम-आयन बैटरियों पर भारी निर्भर है, क्योंकि अमेरिका अपनी लिथियम-आयन बैटरियों का करीब तीन-चौथाई हिस्सा चीन से ही आयात करता है। यही अप्रत्यक्ष निर्भरता असली खतरे को और गहरा बना देती है, क्योंकि आंकड़ों में दिखने वाली निर्भरता हमेशा असली निर्भरता से कम दिखती है।

मांग में विस्फोट

UNCTAD की जून 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले लिथियम की मांग 2024 से 2040 के बीच तीन सौ तिरपन प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। यह बढ़ोतरी मुख्यतः इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम से आ रही है, जो मिलकर भविष्य की कुल खनिज मांग का करीब साठ प्रतिशत हिस्सा अकेले तय करेंगे। पवन टरबाइन और इलेक्ट्रिक वाहन मोटरों के लिए ज़रूरी दुर्लभ मृदा चुंबकों की मांग भी इसी रफ़्तार से बढ़ रही है।

यह मांग सिर्फ स्वच्छ ऊर्जा तक सीमित नहीं। हमारे पिछले सेमीकंडक्टर नीति वाले विश्लेषण में हमने देखा था कि चिप बनाने के लिए भी गैलियम और जर्मेनियम जैसे दुर्लभ तत्व ज़रूरी होते हैं, और यही वे खनिज हैं जिन पर चीन ने अमेरिकी टैरिफ के जवाब में सबसे पहले नियंत्रण लगाया था। आपूर्ति की तरफ देखें तो 2025 में, Democratic Republic of Congo ने दुनिया के चौहत्तर प्रतिशत कोबाल्ट खनन पर कब्ज़ा रखा, इंडोनेशिया ने सड़सठ प्रतिशत निकेल खनन पर, और चीन ने उनहत्तर प्रतिशत दुर्लभ मृदा खनन पर। यानी सोलर पैनल, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, पवन ऊर्जा और सेमीकंडक्टर, यह सभी उद्योग मिलकर एक ही, बेहद संकरी और कुछ गिनी-चुनी जगहों पर टिकी हुई सप्लाई चेन पर निर्भर हैं। और सरकारों की बेचैनी का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 2020 से अब तक दुनिया भर में लगभग एक सौ नए निर्यात-नियंत्रण उपाय लागू किए जा चुके हैं।

रक्षा क्षेत्र का तात्कालिक खतरा

सबसे ज़्यादा चिंता रक्षा क्षेत्र को लेकर है, क्योंकि यहां देरी का मतलब सिर्फ आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर सीधा खतरा है। दुर्लभ मृदा चुंबकों का इस्तेमाल इलेक्ट्रोमैग्नेट, गाइडेंस सिस्टम, लड़ाकू विमानों और मिसाइलों में होता है, और इन सबके लिए चीन की हिस्सेदारी खनन से भी कहीं ज़्यादा, प्रसंस्करण में है। यह वह क्षेत्र है जहां China ने पहले भी जापान के खिलाफ अपनी बाज़ार-ताकत का इस्तेमाल किया था, जिसकी वजह से जापान को बड़े पैमाने पर, सफलतापूर्वक, अपनी आपूर्ति विविधता लाने के प्रयास करने पड़े थे।

ORF की सितंबर 2026 की रिपोर्ट में यह बेहद साफ शब्दों में कहा गया है, भारत का रक्षा-महत्वपूर्ण दुर्लभ मृदा चुंबकों का इस्तेमाल करने लायक भंडार सिर्फ दो से तीन हफ्तों का है। यही वजह है कि सितंबर 2026 की शुरुआत में, Larsen & Toubro और Coal India सहित बीस कंपनियों ने भारत के पहले एकीकृत रेयर अर्थ मैग्नेट प्लांट बनाने के लिए बोली लगाई, लेकिन इनमें से सिर्फ पांच परियोजनाएं चुनी गई हैं, और इन्हें भी पूरी क्षमता तक पहुंचने में सालों लगेंगे। ORF की रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि सरकार की अब तक की सभी पहलें, भले ही कितनी भी महत्वाकांक्षी हों, असली, तत्काल मुद्दे को नहीं छूतीं, यानी स्पष्ट संस्थागत स्वामित्व और एक ठोस, तुरंत लागू होने वाली आपातकालीन रणनीति की कमी।

भारत का विरोधाभास

भारत की कहानी इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प है, क्योंकि यहां संसाधन की कमी नहीं, क्षमता की कमी है। भारत के पास करीब साढ़े छह लाख मीट्रिक टन दुर्लभ मृदा ऑक्साइड के भंडार हैं, जो इसे दुनिया में तीसरे स्थान पर रखता है। Geological Survey of India ने चौंतीस अन्वेषण परियोजनाओं के ज़रिए और भी चार सौ बयासी दशमलव छह मिलियन टन दुर्लभ मृदा अयस्क संसाधन खोज निकाले हैं। यानी ज़मीन के अंदर संसाधन की कोई कमी नहीं।

लेकिन इसके बावजूद, भारत वैश्विक वार्षिक आपूर्ति का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा पैदा करता है, जो 2024 में सिर्फ करीब उनतीस सौ मीट्रिक टन मिश्रित दुर्लभ मृदा क्लोराइड रहा। IREL के मार्केटिंग निदेशक रजनीश खले ने अप्रैल 2026 में इस समस्या को बेहद सटीक तरीके से बयान किया, भारत के पास पर्याप्त दुर्लभ मृदा संसाधन हैं, लेकिन मूल्य श्रृंखला में मध्य और अंतिम चरण के उद्योगों की अनुपस्थिति ही उत्पादन क्षमता को सीमित करती है।

इस कमी का सीधा असर उद्योग पर पड़ता है। 2025 में भारत का परमानेंट मैग्नेट आयात तीस करोड़ डॉलर से ऊपर गया, जिसमें सत्तर से अस्सी प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन से आया। जब चीन ने शुरुआती 2025 में भारी दुर्लभ मृदा तत्वों के निर्यात नियंत्रण कड़े किए, तो भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन कंपनियों और सटीक पुर्ज़े बनाने वालों को तुरंत देरी, मजबूरी में विकल्प तलाशने और मुनाफे पर दबाव का सामना करना पड़ा। यह सिर्फ एक अस्थायी झटका नहीं था, बल्कि यह दिखाने के लिए काफी था कि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था की पूरी इलेक्ट्रिक वाहन और सटीक-इंजीनियरिंग इंडस्ट्री, एक ही देश के फैसले पर कितनी निर्भर है।

भारत की चार-स्तंभ रणनीति

भारत की जवाबी रणनीति को चार बड़े स्तंभों में बांटकर समझा जा सकता है, जो एक साथ, अलग-अलग मोर्चों पर काम कर रहे हैं।

National Critical Mineral Mission

जनवरी 2025 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने National Critical Mineral Mission यानी NCMM को मंज़ूरी दी, जिसका कुल आवंटन चौंतीस हज़ार तीन सौ करोड़ रुपये है, जिसमें सीधे सरकारी खर्च के तौर पर सोलह हज़ार तीन सौ करोड़ रुपये शामिल हैं, बाकी हिस्सा सरकारी कंपनियों के निवेश से आने की उम्मीद है। इसका लक्ष्य है 2030 तक एक हज़ार दो सौ खनिज भंडारों की पहचान करना, और KABIL के ज़रिए विदेशों में पचास खनिज संपत्तियां हासिल करना। यह मिशन पूरी मूल्य श्रृंखला को कवर करता है, अन्वेषण और खनन से लेकर बेनिफिशिएशन, प्रसंस्करण और रीसाइक्लिंग तक।

Rare Earth Permanent Magnet Scheme

सात हज़ार दो सौ अस्सी करोड़ रुपये की इस योजना का लक्ष्य छह हज़ार टन सिंटर्ड NdFeB चुंबक क्षमता बनाना है। इसके साथ ही ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में चार समर्पित रेयर अर्थ कॉरिडोर भी बनाए जा रहे हैं, ताकि कच्चे माल से लेकर तैयार चुंबक तक की पूरी प्रक्रिया एक भौगोलिक दायरे में हो सके। विशाखापट्टनम में एक रणनीतिक चुंबक संयंत्र भी स्थापित किया गया है, जो समारियम-कोबाल्ट चुंबक बनाता है, जो खासतौर पर रक्षा और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।

KABIL और विदेशी अधिग्रहण

Khanij Bidesh India Limited, नेशनल एल्युमिनियम कंपनी, हिंदुस्तान कॉपर और मिनरल एक्सप्लोरेशन एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड, इन तीन सरकारी कंपनियों का एक संयुक्त उद्यम है, जिसका काम विदेशों में खनिज संपत्तियां खरीदना और विकसित करना है, ताकि भारत के घरेलू आधार को मज़बूत किया जा सके। इसने पहले ही अर्जेंटीना में लिथियम ब्राइन ब्लॉक हासिल किए हैं, जो भारत की पहली बड़ी विदेशी महत्वपूर्ण खनिज संपत्ति है, और आठ देशों के साथ खनिज समझौते कर चुका है। भारत फरवरी 2026 में अमेरिका के Critical Minerals Ministerial में भी शामिल हुआ, और Minerals Security Partnership जैसे बहुपक्षीय मंचों में भी सक्रिय भागीदारी कर रहा है, जो पश्चिमी देशों की सप्लाई चेन विविधीकरण रणनीति के साथ भारत के बढ़ते जुड़ाव को दिखाता है।

Recycling और Urban Mining

जब तक घरेलू खनन और प्रसंस्करण क्षमता पूरी तरह तैयार हो, तब तक एक तेज़ समाधान है, पुराने उपकरणों और बैटरियों से ही खनिज वापस निकाल लेना, जिसे "अर्बन माइनिंग" कहा जाता है। भारत सरकार ने इसके लिए डेढ़ हज़ार करोड़ रुपये की एक प्रोत्साहन योजना मंज़ूर की है, जो 2025-26 से 2030-31 तक चलेगी। इसका लक्ष्य है दो सौ सत्तर किलोटन रीसाइक्लिंग क्षमता बनाना, जिससे सालाना चालीस किलोटन महत्वपूर्ण खनिज वापस पाए जा सकें।

यह रणनीति इसलिए भी समझदारी भरी है क्योंकि घरेलू खनन और नई रिफाइनिंग फैक्ट्री बनाने में सालों लगते हैं, जबकि पुराने इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरियों से खनिज निकालना तुलनात्मक रूप से तेज़ और कम पूंजी-गहन है। एक Swarajya के विश्लेषण में तो यह सुझाव भी दिया गया है कि बंद पड़े इलेक्ट्रॉनिक्स और खर्च हो चुकी बैटरियों को "secondary strategic reserves" यानी द्वितीयक रणनीतिक भंडार में बदला जाए, ताकि हर पुराना मोबाइल फोन या लैपटॉप, भविष्य के लिए एक छोटा सा खनिज-भंडार बन सके।

Strategic Reserves की धीमी शुरुआत

जिस तरह भारत के पास कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार है, ताकि किसी आपूर्ति-संकट के समय देश कुछ समय तक बिना बाहरी मदद के काम चला सके, ठीक वैसी ही सोच अब महत्वपूर्ण खनिजों के लिए भी अपनाई जा रही है। National Critical Mineral Stockpile के तहत सरकार की योजना है कि कम-से-कम पांच प्राथमिकता वाले खनिजों, लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, तांबा और दुर्लभ मृदा तत्वों का एक राष्ट्रीय भंडार बनाया जाए। इसे एक सार्वजनिक-निजी हाइब्रिड मॉडल के तौर पर डिज़ाइन किया जा रहा है, जो अमेरिका के Defense Logistics Agency Strategic Materials जैसे, पूरी तरह सरकार-नियंत्रित और कानूनी रूप से अनिवार्य मॉडल से थोड़ा अलग है।

लेकिन यहां एक ईमानदार सच्चाई भी स्वीकार करनी होगी, मध्य-2026 तक यह पूरी स्टॉकपाइल योजना अभी भी सिर्फ योजना और ढांचा-निर्माण के चरण में ही है, ज़मीन पर अभी तक कोई ठोस, भरा हुआ भंडार तैयार नहीं हुआ। दुर्लभ मृदा तत्वों को इस पूरी सूची में सबसे ऊंची रणनीतिक प्राथमिकता दी गई है, ठीक इसी वजह से कि इनकी प्रसंस्करण-सघनता सबसे ज़्यादा जोखिम भरी है।

ईमानदार आकलन

एक संतुलित नज़रिए से देखें तो भारत की रणनीति में प्रशंसा और चिंता, दोनों की गुंजाइश है। प्रशंसा इसलिए कि एक साल के भीतर इतनी व्यापक, बहु-स्तरीय नीतिगत संरचना खड़ी करना, जिसमें खनन, प्रसंस्करण, रीसाइक्लिंग और विदेशी अधिग्रहण, चारों शामिल हों, कोई मामूली उपलब्धि नहीं। चिंता इसलिए कि यह सभी पहलें अपने स्वभाव से ही दीर्घकालिक हैं, जबकि असली खतरा, जैसा रक्षा-चुंबक के दो-तीन हफ्तों वाले भंडार से ज़ाहिर होता है, बिल्कुल तात्कालिक है।

यह ठीक वैसी ही स्थिति है जैसे किसी घर में आग लगने का खतरा हो, और परिवार उसी समय एक नया, मज़बूत अग्निशमन विभाग बनाने की योजना बना रहा हो, जो तैयार होने में पांच साल लेगा। योजना सही दिशा में है, लेकिन अगले कुछ महीनों में अगर वाकई आग लग जाए, तो क्या होगा, इसका कोई ठोस, तुरंत लागू होने वाला जवाब अभी मौजूद नहीं। यही वह अंतर है जिसे नीति-निर्माताओं को सबसे पहले पाटना होगा, दीर्घकालिक क्षमता-निर्माण और तात्कालिक आपातकालीन तैयारी, दोनों को साथ-साथ चलाना।

निष्कर्ष

बीसवीं सदी में जिन देशों के पास तेल था, वे दुनिया की राजनीति तय करते थे। इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में, वह ताकत धीरे-धीरे लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्वों की तरफ खिसक रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह ताकत सिर्फ ज़मीन के अंदर मौजूद भंडार से नहीं, बल्कि उस कच्चे माल को इस्तेमाल करने लायक बनाने की क्षमता से तय हो रही है, और यही वह मैदान है जहां चीन ने दशकों पहले ही अपनी जगह पक्की कर ली।

भारत के पास इस लड़ाई में जीतने के लिए संसाधन मौजूद हैं, जो किसी और की तुलना में कम नहीं, तीसरे सबसे बड़े भंडार इसका सीधा सबूत हैं। असली सवाल यह नहीं कि भारत के पास क्या है, असली सवाल यह है कि क्या भारत उस संसाधन को समय रहते, इतनी तेज़ी से इस्तेमाल करने लायक बना पाता है, जिससे अगली बार जब कोई भू-राजनीतिक झटका आए, तो देश के रक्षा कारखाने, इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग और सेमीकंडक्टर मिशन, किसी और देश की दया पर निर्भर न रहें। जवाब अगले कुछ सालों में मिलेगा, लेकिन घड़ी अभी से टिक-टिक कर रही है, और दो-तीन हफ्तों वाला वह रक्षा-भंडार हर दिन यह याद दिलाता रहेगा कि समय कितना कम बचा है।

आपको क्या लगता है, क्या भारत को अपनी घरेलू प्रसंस्करण क्षमता पर ज़्यादा ज़ोर देना चाहिए, या विदेशों में खनिज संपत्तियां खरीदने की रणनीति पर दांव लगाना बेहतर रहेगा? नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताएं।

स्रोत / Sources:

1. ORF, "India's Rare Earth Vulnerability, Building a Strategic Defence Reserve", September 23, 2026
2. Resources for the Future, "Resource Nationalism and the Resilience of Critical Mineral Supply Chains"
3. Resources for the Future, "Just How Dependent Is the World on Chinese Supply Chains"
4. UNCTAD, "Global Trade Update (June 2026), The shifting dynamics of critical minerals trade"
5. Belfer Center, "Critical Minerals Explained, Why They Matter for Geopolitics, Clean Energy & Tech"
6. World Economic Forum, "What are the critical minerals for the energy transition"
7. World Resources Institute, "Critical Minerals, Explained"
8. PIB, "India's Rare Earth Strategy, Manufacturing, Corridors, and Global Integration"
9. Drishti IAS, "Securing India's Critical Mineral Future"
10. Drishti IAS, "News & Editorials 15 January 2026"
11. NextIAS, "Rare Earth Magnets in India, Value Chain, Challenges & Steps", September 21, 2026
12. Swarajya, "Building The Muscle For Tech Sovereignty, Critical Minerals Must Underpin India's Semiconductor and Manufacturing Ambition"
13. Rare Earth Mining, "India Rare Earth, Reserves, IREL & Supply Gap"
14. Lapaas Voice, "India's Critical Minerals Mission Explained (2026)"
15. Discovery Alert, "India's Strategic Reserve of Critical Minerals Explained 2026"
16. NITI Aayog, "Critical Mineral Assessment, Demand and Supply"

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