Est. 2025 · लेखक: आकाश दीप

राजनीति, इतिहास, रक्षा और अर्थव्यवस्था

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भारत UN सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और वीटो पावर क्यों चाहता है?

लेखक: आकाश दीप | युगबोध

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता और वीटो पावर की मांग

दुनिया में युद्ध होता है, किसी देश पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने का सवाल उठता है, समुद्री सुरक्षा को खतरा पैदा होता है या किसी बड़े संघर्ष को रोकने के लिए सामूहिक कार्रवाई की जरूरत पड़ती है, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council—UNSC) की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यह संयुक्त राष्ट्र का वह प्रमुख अंग है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

लेकिन यहां एक बड़ा सवाल है: जिस दुनिया की सुरक्षा से जुड़े फैसले लिए जा रहे हैं, क्या उन फैसलों को लेने वाली संस्था की संरचना आज की दुनिया का सही प्रतिनिधित्व करती है? क्या एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी वास्तविक भूमिका के अनुरूप स्थान मिला हुआ है? और क्या कुछ देशों को मिला विशेष वीटो अधिकार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को प्रभावी बनाने में मदद करता है या कई बार उसे रोक देता है?

भारत का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में व्यापक सुधार की जरूरत है। भारत चाहता है कि परिषद में स्थायी और गैर-स्थायी दोनों प्रकार की सदस्यता का विस्तार हो, विकासशील देशों और वैश्विक दक्षिण (Global South) को बेहतर प्रतिनिधित्व मिले तथा नए स्थायी सदस्यों को भी मौजूदा स्थायी सदस्यों के समान अधिकार दिए जाएं। भारत के लिए यह केवल एक स्थायी सीट हासिल करने का प्रश्न नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधिक, जवाबदेह और प्रभावी बनाने का मुद्दा है।

आखिर भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता क्यों चाहता है? वीटो पावर का विवाद क्या है? भारत की दावेदारी कितनी मजबूत है? अमेरिका, चीन और अन्य शक्तियों की भूमिका क्या है? और दशकों से चल रही सुधार प्रक्रिया अब तक अपने लक्ष्य तक क्यों नहीं पहुंच पाई? इन सवालों को समझने के लिए पूरी व्यवस्था को सरल भाषा में देखना जरूरी है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता की मांग

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद क्या है और इसके फैसले क्यों महत्वपूर्ण हैं?

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुई थी। उस युद्ध में करोड़ों लोगों की जान गई, अनेक शहर तबाह हुए और दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था बदल गई। भविष्य में ऐसे विनाशकारी संघर्ष को रोकने और देशों के बीच सहयोग के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाने की जरूरत महसूस हुई। इसी उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई।

संयुक्त राष्ट्र के कई अंग हैं, जिनमें महासभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक एवं सामाजिक परिषद, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और सचिवालय शामिल हैं। महासभा में सभी सदस्य देशों को भाग लेने और मतदान करने का अवसर मिलता है। इसके विपरीत, सुरक्षा परिषद की सदस्यता सीमित है और इसके पास अंतरराष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा से जुड़े मामलों में विशेष अधिकार हैं।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 24 के अनुसार, सदस्य देशों ने अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी सुरक्षा परिषद को सौंपी है। परिषद किसी संघर्ष पर विचार कर सकती है, बातचीत और मध्यस्थता जैसे उपायों की सिफारिश कर सकती है, प्रतिबंध लगा सकती है और चार्टर के प्रावधानों के अंतर्गत आवश्यक परिस्थितियों में बल प्रयोग को अधिकृत कर सकती है। अनुच्छेद 25 के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश सुरक्षा परिषद के फैसलों को चार्टर के अनुरूप स्वीकार करने और लागू करने के लिए सहमत हैं।

यही कारण है कि सुरक्षा परिषद में किस देश को जगह मिलती है और किसके पास निर्णय रोकने की शक्ति है, यह सामान्य कूटनीतिक प्रतिष्ठा से कहीं बड़ा मुद्दा है। इसका संबंध इस बात से है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाले फैसलों में किस देश की आवाज कितनी प्रभावशाली होगी।

सुरक्षा परिषद में कितने सदस्य हैं और पांच स्थायी सदस्य कौन हैं?

वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य और दस गैर-स्थायी सदस्य शामिल हैं। पांच स्थायी सदस्य हैं:

  • अमेरिका (United States)
  • रूस (Russia)
  • चीन (China)
  • ब्रिटेन (United Kingdom)
  • फ्रांस (France)

इन पांच देशों को स्थायी सदस्यता के साथ वीटो पावर भी मिली हुई है। बाकी दस सदस्य संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा चुने जाते हैं। गैर-स्थायी सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष होता है और उन्हें तत्काल अगले कार्यकाल के लिए फिर से नहीं चुना जा सकता। चुनाव में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और देशों के योगदान को ध्यान में रखा जाता है।

विशेषता स्थायी सदस्य गैर-स्थायी सदस्य
सीटों की संख्या 5 10
कार्यकाल स्थायी 2 वर्ष
वीटो पावर हां नहीं
चुनाव चार्टर में नामित महासभा द्वारा चुनाव
तत्काल दोबारा चुनाव लागू नहीं अगले कार्यकाल के लिए तत्काल पुनर्निर्वाचन नहीं

इस व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण अंतर है। सुरक्षा परिषद में हर सदस्य का एक वोट होता है, लेकिन गैर-प्रक्रियात्मक मामलों में किसी प्रस्ताव को पारित करने के लिए कम-से-कम नौ सदस्यों के समर्थन के साथ स्थायी सदस्यों की सहमति से जुड़ी शर्त भी लागू होती है। किसी स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत प्रस्ताव को रोक सकता है। यही वीटो व्यवस्था है।

1945 में बनी व्यवस्था आज सवालों के घेरे में क्यों है?

सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना को समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों को याद करना होगा, जब संयुक्त राष्ट्र बनाया गया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। संयुक्त राष्ट्र के संस्थापकों ने इन शक्तियों को स्थायी सदस्यता और विशेष मतदान अधिकार दिए, ताकि बड़ी शक्तियों की भागीदारी के बिना अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था चलाने की कोशिश न करनी पड़े।

उस समय का वैश्विक शक्ति-संतुलन आज से काफी अलग था। अनेक एशियाई और अफ्रीकी देश औपनिवेशिक शासन के अधीन थे। कई देश स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य भी नहीं बने थे। बाद के दशकों में उपनिवेशवाद समाप्त हुआ, नए स्वतंत्र देश संयुक्त राष्ट्र में शामिल हुए और वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा राजनीति में नए केंद्र उभरे।

आज संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देश हैं, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या अब भी पांच है। इससे प्रतिनिधित्व का सवाल उठता है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बड़े हिस्से को स्थायी श्रेणी में पर्याप्त जगह नहीं मिली है। भारत का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय संस्था की संरचना को केवल 1945 की शक्ति-संरचना के आधार पर नहीं चलाया जा सकता, जबकि दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताएं बदल चुकी हैं।

यहां इतिहास का एक महत्वपूर्ण तथ्य भी है। 1963 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सुरक्षा परिषद के विस्तार से जुड़े चार्टर संशोधनों को स्वीकार किया, जो 1965 में लागू हुए। इससे परिषद की कुल सदस्य संख्या 11 से बढ़कर 15 हो गई और गैर-स्थायी सीटें छह से बढ़कर दस हो गईं। लेकिन स्थायी सदस्यों की संख्या पांच ही रही। उसके बाद सुरक्षा परिषद की सदस्य संख्या में कोई और विस्तार नहीं हुआ।

इसका मतलब है कि परिषद का विस्तार पहले संभव हुआ था, लेकिन उस सुधार ने स्थायी सदस्यता और वीटो के मूल ढांचे को नहीं बदला। भारत अब इसी अधूरे प्रतिनिधित्व को सुधारने की मांग कर रहा है।

भारत स्थायी सदस्यता क्यों चाहता है?

भारत की दावेदारी को केवल बड़ी आबादी या आर्थिक आकार के आधार पर नहीं समझना चाहिए। भारत इसके समर्थन में कई तर्क रखता है—जनसंख्या, अंतरराष्ट्रीय भूमिका, शांति अभियानों में योगदान, विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व की जरूरत और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक संतुलन।

भारत की जनसंख्या और वैश्विक महत्व

भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। वैश्विक स्तर पर लिए गए फैसलों का असर भारत के नागरिकों, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा जरूरतों, व्यापार, खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है। ऐसे में भारत का तर्क है कि इतने बड़े देश को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में स्थायी भागीदारी मिलनी चाहिए।

हालांकि, केवल बड़ी जनसंख्या होना स्थायी सदस्यता का स्वतः अधिकार नहीं बनाता। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में ऐसा कोई नियम नहीं है कि सबसे अधिक आबादी वाला देश अपने आप स्थायी सदस्य बन जाएगा। भारत की दावेदारी जनसंख्या के साथ-साथ उसकी आर्थिक और रणनीतिक भूमिका, अंतरराष्ट्रीय योगदान तथा वैश्विक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर भी आधारित है।

बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक भूमिका

भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था, डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, अंतरिक्ष कार्यक्रम, दवा उत्पादन, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हिंद महासागर के किनारे स्थित होने के कारण भारत समुद्री सुरक्षा और प्रमुख व्यापार मार्गों के संदर्भ में भी रणनीतिक महत्व रखता है। ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई के लिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत सहित अनेक देशों के हित में है।

भारत का तर्क है कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले देशों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी स्थायी स्थान मिलना चाहिए। यदि भारत अंतरराष्ट्रीय संकटों, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद और क्षेत्रीय स्थिरता पर योगदान देता है, तो उसकी भागीदारी केवल कुछ वर्षों के गैर-स्थायी कार्यकाल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में योगदान

भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में लंबे समय से योगदान देता रहा है। भारतीय सैनिकों, पुलिसकर्मियों और अन्य वर्दीधारी कर्मियों ने विभिन्न देशों में शांति स्थापना, नागरिकों की सुरक्षा और संघर्ष के बाद स्थिरता कायम करने से जुड़े अभियानों में भाग लिया है।

भारत का तर्क है कि जो देश अंतरराष्ट्रीय शांति व्यवस्था को बनाए रखने में मानव संसाधन और अन्य योगदान देते हैं, उनकी आवाज उन फैसलों में भी महत्वपूर्ण होनी चाहिए जो इन अभियानों का दायरा, जिम्मेदारियां और संसाधन तय करते हैं। भारत चाहता है कि शांति अभियानों में योगदान देने वाले देशों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त भूमिका मिले।

यह तर्क केवल भारत तक सीमित नहीं है। कई विकासशील देश मानते हैं कि शांति अभियानों में सैनिक और पुलिस भेजने वाले देशों को परिषद के विमर्श में अधिक प्रभावी भागीदारी मिलनी चाहिए, क्योंकि फैसलों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी अक्सर उन्हीं पर आती है।

विकासशील देशों की आवाज मजबूत करना

भारत अपनी दावेदारी को वैश्विक दक्षिण (Global South) के व्यापक प्रतिनिधित्व से जोड़ता है। वैश्विक दक्षिण कोई एक औपचारिक संगठन नहीं है। यह एक व्यापक राजनीतिक और आर्थिक अवधारणा है, जिसका उपयोग एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य विकासशील क्षेत्रों के देशों की साझा चिंताओं को समझने के लिए किया जाता है। इन देशों की प्राथमिकताओं में विकास, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, कर्ज, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी पहुंच और आर्थिक अवसर शामिल हैं।

भारत का कहना है कि इन देशों को केवल अंतरराष्ट्रीय फैसलों के प्रभावों का सामना करने वाला पक्ष नहीं होना चाहिए। उन्हें फैसले तैयार करने और वैश्विक सुरक्षा से जुड़ी प्राथमिकताएं तय करने में भी प्रभावी भूमिका मिलनी चाहिए। भारत की स्थायी सदस्यता से एशिया और विकासशील देशों की चिंताओं को परिषद में अधिक नियमित रूप से उठाने का अवसर मिल सकता है।

हालांकि, भारत यह दावा नहीं कर सकता कि वह वैश्विक दक्षिण के सभी देशों की ओर से अकेले बोलता है। इन देशों के हित और प्राथमिकताएं अलग-अलग भी होती हैं। इसलिए भारत की रणनीति के लिए दूसरे विकासशील देशों का समर्थन जुटाना और उनकी क्षेत्रीय मांगों को गंभीरता से लेना आवश्यक है।

वीटो पावर क्या है? यह पूरी बहस का सबसे कठिन हिस्सा क्यों है?

वीटो पावर वह विशेष अधिकार है जिसके माध्यम से सुरक्षा परिषद का कोई स्थायी सदस्य गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्ताव को रोक सकता है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 27 के अनुसार, ऐसे मामलों में प्रस्ताव पारित करने के लिए कम-से-कम नौ सदस्यों के सकारात्मक मत और स्थायी सदस्यों की सहमति से जुड़ी शर्त लागू होती है। यदि पांच स्थायी सदस्यों में से कोई एक नकारात्मक मत देता है, तो प्रस्ताव पारित नहीं होता।

उदाहरण के लिए, यदि किसी प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद के 14 सदस्य समर्थन दें, लेकिन एक स्थायी सदस्य उसके विरुद्ध वीटो कर दे, तो वह प्रस्ताव पारित नहीं होगा। दूसरी ओर, स्थायी सदस्य का मतदान से परहेज करना अपने आप में वीटो नहीं है। यदि आवश्यक समर्थन प्राप्त हो और कोई स्थायी सदस्य नकारात्मक मत न दे, तो प्रस्ताव पारित हो सकता है। प्रक्रिया से जुड़े मामलों पर वीटो लागू नहीं होता।

वीटो की मूल सोच यह थी कि विश्व की प्रमुख शक्तियों की सहमति के बिना अंतरराष्ट्रीय शांति से जुड़े बड़े फैसलों को लागू करना कठिन हो सकता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब किसी संघर्ष में किसी स्थायी सदस्य का अपना राष्ट्रीय हित शामिल हो, तो वह वीटो के जरिए परिषद को कार्रवाई करने से रोक सकता है। इस स्थिति में परिषद की प्रभावशीलता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

भारत का आधिकारिक रुख इस बहस में स्पष्ट है। अप्रैल 2026 में संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कहा कि सुरक्षा परिषद की असमानता के दो मुख्य पहलू हैं—सदस्यता की संरचना और वीटो। भारत के अनुसार, यदि स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाए बिना केवल गैर-स्थायी सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो वीटो रखने वाले देशों का तुलनात्मक प्रभाव और अधिक मजबूत हो सकता है।

भारत ने यह भी कहा कि जब तक वीटो की व्यवस्था बनी रहती है, नए स्थायी सदस्यों को उससे वंचित रखकर स्थायी सदस्यता की एक नई श्रेणी बनाना वास्तविक सुधार नहीं होगा। भारत नए स्थायी सदस्यों को मौजूदा स्थायी सदस्यों के समान वीटो अधिकार दिए जाने का समर्थन करता है। यह भारत की आधिकारिक स्थिति है, लेकिन इस पर सभी सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए। भारत का वीटो अधिकार की मांग करना और सभी देशों का इस मांग को स्वीकार कर लेना दो अलग बातें हैं। कुछ देश वीटो के विस्तार का विरोध करते हैं। कुछ नए स्थायी सदस्य तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें शुरुआत में वीटो देने के पक्ष में नहीं हैं। कुछ देश मौजूदा वीटो के इस्तेमाल पर रोक या जवाबदेही बढ़ाने की मांग करते हैं। यही मतभेद सुधार प्रक्रिया को कठिन बनाते हैं।

क्या वीटो पावर खत्म कर देना ही समाधान है?

इस सवाल का कोई ऐसा सरल उत्तर नहीं है जिस पर सभी देश सहमत हों। एक विचार यह है कि वीटो को समाप्त कर दिया जाए, ताकि एक देश के विरोध के कारण सुरक्षा परिषद का फैसला न रुके। लेकिन मौजूदा स्थायी सदस्यों को विशेष अधिकार देने वाली व्यवस्था संयुक्त राष्ट्र चार्टर का हिस्सा है। इसमें बदलाव के लिए चार्टर संशोधन की कठिन प्रक्रिया से गुजरना होगा, जिसमें सभी मौजूदा स्थायी सदस्यों की पुष्टि आवश्यक है।

दूसरा विचार वीटो के इस्तेमाल को सीमित करने का है। उदाहरण के लिए, कुछ देश चाहते हैं कि सामूहिक अत्याचार या बड़े मानवीय संकटों की स्थिति में वीटो का इस्तेमाल न किया जाए या उसके इस्तेमाल के लिए अधिक जवाबदेही हो। लेकिन ऐसे प्रस्तावों पर भी सभी स्थायी सदस्यों की सहमति नहीं है।

तीसरा विचार नए स्थायी सदस्यों को शामिल करने का है, लेकिन उन्हें तत्काल वीटो न देने का। इसके समर्थक इसे राजनीतिक समझौते का रास्ता मानते हैं। भारत और उसके कुछ सहयोगियों का तर्क है कि इससे स्थायी सदस्यता के भीतर ही दो श्रेणियां बन जाएंगी और मौजूदा असमानता कायम रहेगी।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2022 में प्रस्ताव 76/262 अपनाया था, जिसके तहत सुरक्षा परिषद के किसी स्थायी सदस्य द्वारा वीटो इस्तेमाल किए जाने पर महासभा में चर्चा का अवसर मिलता है। इसका उद्देश्य वीटो के इस्तेमाल पर राजनीतिक जवाबदेही बढ़ाना है। लेकिन यह व्यवस्था वीटो को समाप्त नहीं करती और न ही अपने आप किसी प्रस्ताव को पारित करा सकती है।

भारत का मानना है कि सुधार को केवल वीटो पर चर्चा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। सदस्यता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, कार्यप्रणाली और वीटो—इन सभी मुद्दों पर समग्र सुधार जरूरी है।

भारत की दावेदारी और G4 समूह की भूमिका

भारत अपनी स्थायी सदस्यता की मांग को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे देशों के साथ सहयोग करता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण समूह G4 है, जिसमें भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान शामिल हैं। ये चारों देश सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता के विस्तार का समर्थन करते हैं।

G4 का प्रस्ताव सुरक्षा परिषद को 25 या 26 सदस्यों तक विस्तारित करने का रहा है। इसके मॉडल में छह नए स्थायी सदस्यों और चार या पांच अतिरिक्त गैर-स्थायी सदस्यों को शामिल करने की बात है। इस तरह परिषद के आकार और स्थायी सदस्यता दोनों में बदलाव प्रस्तावित है। यह G4 का प्रस्ताव है, न कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत या लागू किया गया निर्णय।

G4 का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह भारत की मांग को केवल एक देश की दावेदारी के बजाय व्यापक संस्थागत सुधार के प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत करता है। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान के क्षेत्रीय अनुभव तथा अंतरराष्ट्रीय भूमिकाएं अलग-अलग हैं, लेकिन वे इस बात पर सहमत हैं कि सुरक्षा परिषद का मौजूदा ढांचा आज की दुनिया के अनुरूप नहीं है।

22 सितंबर 2026 को G4 देशों के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान बैठक की। संयुक्त बयान में उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करती। उन्होंने स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार तथा अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका एवं कैरेबियाई क्षेत्र के बेहतर प्रतिनिधित्व की जरूरत दोहराई।

G4 ने यह भी कहा कि सुधार की प्रक्रिया में ठोस प्रगति नहीं हुई है और लिखित प्रस्तावों के आधार पर वास्तविक बातचीत आगे बढ़ाना जरूरी है। इसका मतलब है कि भारत की रणनीति केवल समर्थन जुटाने तक सीमित नहीं है; वह सुधार पर औपचारिक और स्पष्ट वार्ता शुरू कराने पर भी जोर देता है।

अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण के लिए सुधार क्यों महत्वपूर्ण है?

सुरक्षा परिषद सुधार की बहस केवल भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील की सदस्यता तक सीमित नहीं है। अफ्रीकी देशों की मांग भी इस प्रक्रिया का केंद्रीय हिस्सा है। अफ्रीका के कई देश लंबे समय से कहते रहे हैं कि जिस महाद्वीप के मुद्दे सुरक्षा परिषद के एजेंडे में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, उसे स्थायी सदस्यता में भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

अफ्रीकी देशों की साझा मांग को अक्सर Ezulwini Consensus और Sirte Declaration के संदर्भ में समझा जाता है। इस रुख में सुरक्षा परिषद के स्थायी और गैर-स्थायी दोनों प्रकार के विस्तार तथा अफ्रीका को स्थायी सदस्यता में प्रभावी स्थान देने पर जोर है। वीटो के मामले में भी अफ्रीकी पक्ष का कहना है कि जब तक वीटो बना हुआ है, नए स्थायी सदस्यों को उससे वंचित नहीं रखा जाना चाहिए।

भारत ने अफ्रीका की स्थायी सदस्यता की मांग के समर्थन की बात कही है। यह भारत की रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि व्यापक सुधार के लिए अलग-अलग क्षेत्रों की चिंताओं को साथ लेकर चलना जरूरी है। यदि सुधार केवल कुछ बड़े देशों की नई सीटों तक सीमित रह जाए और अफ्रीका तथा अन्य कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों की मांगों को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो उसकी स्वीकार्यता कमजोर पड़ सकती है।

फिर भी, वैश्विक दक्षिण एक समान विचार वाला समूह नहीं है। विभिन्न देशों की क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और राष्ट्रीय हित अलग हो सकते हैं। इसलिए भारत के लिए जरूरी है कि वह व्यापक समर्थन जुटाने के साथ-साथ ऐसे प्रस्तावों पर भी काम करे जो अलग-अलग क्षेत्रों के लिए न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकें।

भारत के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाएं क्या हैं?

भारत की दावेदारी के पक्ष में कई तर्क हैं, लेकिन स्थायी सदस्यता हासिल करना आसान नहीं है। इसके पीछे राजनीतिक, क्षेत्रीय और कानूनी बाधाएं हैं।

मौजूदा स्थायी सदस्यों की सहमति

मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद में विशेष अधिकार प्राप्त हैं। नए स्थायी सदस्य जुड़ने से परिषद के भीतर शक्ति-संतुलन बदल सकता है। इसलिए सुधार पर बातचीत में उनके राष्ट्रीय हित महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सभी पांच स्थायी सदस्य हर प्रस्ताव पर एक जैसा रुख नहीं रखते, लेकिन चार्टर में संशोधन लागू करने के लिए अंततः पांचों की पुष्टि आवश्यक है।

चीन और भारत की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा

भारत की स्थायी सदस्यता की चर्चा में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि चीन मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों में से एक है। भारत और चीन के बीच सीमा, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक प्रभाव से जुड़े मतभेद हैं। भारत की सदस्यता के प्रस्ताव पर चीन का रुख इस व्यापक राजनीतिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि सुरक्षा परिषद सुधार की पूरी प्रक्रिया केवल चीन के कारण रुकी हुई है। सदस्य देशों के बीच विस्तार के आकार, नए स्थायी सदस्यों की संख्या, वीटो अधिकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर कई अलग-अलग मतभेद हैं। इसलिए किसी एक देश को पूरी समस्या का एकमात्र कारण बताना वास्तविक स्थिति को सरल बनाकर पेश करना होगा।

क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और वैकल्पिक प्रस्ताव

कुछ देश नए स्थायी सदस्यों को जोड़ने के बजाय गैर-स्थायी सीटों को बढ़ाने पर जोर देते हैं। Uniting for Consensus समूह, जिसमें इटली और पाकिस्तान जैसे देश शामिल हैं, नई स्थायी सदस्यता के विस्तार पर आपत्ति जताता रहा है। उसका तर्क है कि अधिक गैर-स्थायी सीटों और क्षेत्रीय चुनाव की व्यवस्था से अधिक देशों को परिषद में आने का अवसर मिलेगा।

भारत और G4 इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि केवल गैर-स्थायी सीटें बढ़ाने से स्थायी सदस्यों के विशेष अधिकारों का असंतुलन बना रहेगा। यही कारण है कि सुधार की बहस में सिर्फ इस बात पर मतभेद नहीं है कि कितनी सीटें बढ़ाई जाएं, बल्कि इस पर भी है कि स्थायी सदस्यता का स्वरूप कैसा हो।

वीटो के अधिकार पर असहमति

यदि नए स्थायी सदस्य बनाए जाते हैं, तो क्या उन्हें तुरंत वीटो दिया जाए? क्या कुछ वर्षों के बाद यह अधिकार दिया जाए? या उन्हें स्थायी सदस्यता तो मिले, लेकिन वीटो न मिले? इन सवालों पर देशों की राय अलग-अलग है। भारत के लिए समान अधिकारों का सिद्धांत महत्वपूर्ण है, जबकि कुछ देश बिना वीटो वाली स्थायी सदस्यता को समझौते का रास्ता मानते हैं।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की कठिन प्रक्रिया

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 108 के अनुसार, चार्टर संशोधन को महासभा में दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से स्वीकार किया जाना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र के दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा उनकी संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार इसकी पुष्टि जरूरी है। इसमें सभी पांच मौजूदा स्थायी सदस्यों की पुष्टि भी शामिल है।

इसका मतलब है कि व्यापक समर्थन होने के बावजूद सुधार अपने आप लागू नहीं हो सकता। प्रस्ताव को राजनीतिक समर्थन के साथ-साथ औपचारिक कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा। मौजूदा स्थायी सदस्यों में से किसी एक की पुष्टि न मिलने पर भी संशोधन लागू होने में बाधा आ सकती है। यही सुधार की राह की सबसे बड़ी संस्थागत कठिनाइयों में से एक है।

संयुक्त राष्ट्र में सुधार की बातचीत अब कहां तक पहुंची है?

सुरक्षा परिषद में सुधार पर अंतर-सरकारी वार्ताएं (Intergovernmental Negotiations—IGN) संयुक्त राष्ट्र महासभा के तहत चलती हैं। इन वार्ताओं में सदस्य देश परिषद की सदस्यता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, वीटो और कामकाज से जुड़े मुद्दों पर अपने प्रस्ताव रखते हैं।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपने 80वें सत्र में भी सुरक्षा परिषद सुधार पर अंतर-सरकारी वार्ताओं को जारी रखने का निर्णय लिया। 2026 में इन वार्ताओं के दौरान सदस्य देशों ने प्रतिनिधित्व और वीटो सहित विभिन्न विषयों पर चर्चा की। इससे स्पष्ट है कि सुधार का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में बना हुआ है, लेकिन चर्चा जारी रहने का अर्थ यह नहीं है कि स्थायी सदस्यता के विस्तार पर अंतिम सहमति बन गई है।

सितंबर 2026 के G4 संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि वार्ताओं के लंबे समय से चलने के बावजूद वास्तविक सुधार की दिशा में ठोस परिणाम नहीं मिले हैं। G4 ने लिखित प्रस्तावों के आधार पर बातचीत आगे बढ़ाने और उन देशों के साथ सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जो सुरक्षा परिषद के वास्तविक विस्तार का समर्थन करते हैं।

इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सदस्य देश केवल अपने पुराने रुख दोहराते रहेंगे या किसी ऐसे प्रस्ताव पर आगे बढ़ेंगे जिसमें सदस्यता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और वीटो जैसे मुद्दों पर स्पष्ट विकल्प रखे जाएं। जब तक इन विषयों पर व्यापक राजनीतिक समझ नहीं बनेगी, सुधार की प्रक्रिया आगे बढ़ना कठिन रहेगा।

भारत की स्थायी सदस्यता से दुनिया को क्या फायदा हो सकता है?

भारत की स्थायी सदस्यता से सुरक्षा परिषद में एशिया और विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व मजबूत हो सकता है। भारत को परिषद की दीर्घकालिक निर्णय प्रक्रिया में नियमित भागीदारी मिलेगी और वह शांति अभियानों, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय संघर्षों तथा वैश्विक दक्षिण से जुड़े मुद्दों पर लगातार अपनी बात रख सकेगा।

इससे परिषद की वैधता और स्वीकार्यता बढ़ने की संभावना भी है। यदि अधिक क्षेत्र निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं, तो परिषद के फैसलों को व्यापक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से तैयार करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, प्रतिनिधित्व बढ़ने से हर फैसला अपने आप प्रभावी हो जाएगा, इसकी गारंटी नहीं है। सदस्य देशों के बीच राजनीतिक मतभेद बने रहने पर गतिरोध आगे भी संभव है।

इसलिए सुधार का लक्ष्य केवल अधिक सीटें जोड़ना नहीं होना चाहिए। इसमें पारदर्शिता, निर्णय प्रक्रिया में जवाबदेही, महासभा के साथ बेहतर संवाद और शांति अभियानों में योगदान देने वाले देशों की भूमिका को भी महत्व देना चाहिए। स्थायी सदस्यता में विस्तार के साथ-साथ परिषद के कामकाज में सुधार भी आवश्यक है।

क्या स्थायी सदस्यता भारत की विदेश नीति बदल देगी?

स्थायी सदस्यता मिलने पर भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका अधिक संस्थागत और निरंतर हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत की विदेश नीति अपने आप बदल जाएगी। भारत के राष्ट्रीय हित, रणनीतिक स्वायत्तता, क्षेत्रीय सुरक्षा और विभिन्न देशों के साथ संबंध तब भी उसकी विदेश नीति के महत्वपूर्ण आधार रहेंगे।

स्थायी सदस्यता भारत के लिए अधिक प्रभाव के साथ अधिक जिम्मेदारी भी लेकर आएगी। उसे अंतरराष्ट्रीय संकटों पर लगातार रुख अपनाना होगा, अन्य देशों के साथ समझौते बनाने होंगे और वैश्विक शांति तथा सुरक्षा से जुड़े फैसलों में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। भारत को यह भी दिखाना होगा कि उसकी भूमिका केवल राष्ट्रीय हितों तक सीमित नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करने में भी योगदान देती है।

इसलिए स्थायी सदस्यता को केवल प्रतिष्ठा या शक्ति का प्रतीक नहीं समझना चाहिए। यह एक ऐसी जिम्मेदारी भी होगी, जिसमें भारत को वैश्विक स्तर पर अधिक नियमित और जवाबदेह भूमिका निभानी पड़ेगी।

निष्कर्ष: भारत की मांग केवल एक सीट की नहीं, वैश्विक प्रतिनिधित्व की है

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की भारत की मांग तीन बुनियादी सवालों से जुड़ी है। पहला, क्या 1945 में बनी व्यवस्था आज की दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व करती है? दूसरा, क्या एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के फैसलों में पर्याप्त भागीदारी मिली हुई है? तीसरा, क्या स्थायी सदस्यता के भीतर पुराने और नए सदस्यों के अधिकारों में अंतर बनाए रखकर वास्तविक सुधार संभव है?

भारत का जवाब है कि सुरक्षा परिषद का ढांचा बदलती दुनिया के अनुरूप होना चाहिए। भारत अपनी जनसंख्या, आर्थिक और रणनीतिक भूमिका, शांति अभियानों में योगदान तथा विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व की जरूरत को अपनी दावेदारी का आधार बनाता है। वह स्थायी और गैर-स्थायी दोनों श्रेणियों में विस्तार चाहता है और जब तक वीटो व्यवस्था बनी रहती है, नए स्थायी सदस्यों को समान वीटो अधिकार देने का समर्थन करता है।

लेकिन भारत की दावेदारी के सामने मौजूदा स्थायी सदस्यों के हित, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा, वीटो पर मतभेद और संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की कठिन प्रक्रिया जैसी बाधाएं हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि सुधार कब लागू होगा या भारत को स्थायी सदस्यता कब मिलेगी।

अंततः, सुरक्षा परिषद सुधार का उद्देश्य केवल कुछ देशों को नई कुर्सियां देना नहीं होना चाहिए। इसका उद्देश्य ऐसी संस्था बनाना होना चाहिए जो अधिक प्रतिनिधिक, जवाबदेह और प्रभावी हो तथा आज की दुनिया की विविधता और शक्ति-संतुलन को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करे। भारत की स्थायी सदस्यता की मांग इसी व्यापक प्रश्न से जुड़ी है—क्या 21वीं सदी के वैश्विक फैसले अब भी 20वीं सदी की शक्ति-संरचना के आधार पर चलते रहेंगे, या संयुक्त राष्ट्र बदलती दुनिया के अनुरूप खुद को बदलेगा?

स्रोत / Sources:

1. United Nations — Security Council Reform and Intergovernmental Negotiations: संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक वेबसाइट

2. United Nations — UN Charter, Chapter V: Security Council: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पूरा पाठ

3. United Nations Security Council — Voting System and the Right to Veto: मतदान प्रणाली और वीटो अधिकार

4. Permanent Mission of India to the United Nations — IGN Meeting on Security Council Reforms, Statement by Ambassador Harish Parvathaneni, 14 April 2026: भारत का आधिकारिक वक्तव्य

5. Federal Foreign Office, Germany — G4 Joint Ministerial Statement on the Reform of the UN Security Council, 22 September 2026: G4 का संयुक्त वक्तव्य

6. United Nations — Charter Amendments, Articles 108 and 109: संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की प्रक्रिया

7. United Nations General Assembly — Resolution 76/262 on the use of veto: वीटो के इस्तेमाल पर महासभा की बहस से संबंधित प्रस्ताव

अस्वीकरण: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध संयुक्त राष्ट्र दस्तावेजों, भारत के आधिकारिक वक्तव्य और संबंधित संस्थागत स्रोतों पर आधारित जानकारीपरक विश्लेषण है। इसमें बताए गए सुधार प्रस्तावों को लागू हो चुके निर्णय के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना, वीटो अधिकार और नए स्थायी सदस्यों के चयन पर सदस्य देशों के बीच वार्ता जारी है। अंतिम व्यवस्था पर सहमति बनने और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही कोई बदलाव लागू हो सकता है।

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