Est. 2025 · लेखक: आकाश दीप

राजनीति, इतिहास, रक्षा और अर्थव्यवस्था

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India China Russia US Geopolitics 2026, भारत की भूमिका

लेखक: आकाश दीप | युगबोध

India China Russia US Geopolitics 2026 में भारत की संतुलन साधने वाली विदेश नीति को दर्शाता इन्फोग्राफिक

एक तस्वीर जो सब कुछ कह देती है, 12 सितंबर को नई दिल्ली में मोदी के साथ पुतिन और शी जिनपिंग एक साथ खड़े थे, और ठीक एक हफ्ते बाद वाशिंगटन में एक कानून पर दस्तखत हो रहे थे, जो भारत पर सौ फीसदी तक टैरिफ लगाने का रास्ता खोलता है

ज़रा सोचिए, आप एक ऐसे परिवार के बड़े बेटे हैं जिसके तीन बेहद ताकतवर, एक-दूसरे से होड़ करने वाले रिश्तेदार हैं। एक रिश्तेदार आपको पुराना, भरोसेमंद साथी मानता है, लेकिन अब वह कमज़ोर पड़ रहा है और दूसरे पर निर्भर हो गया है। दूसरा रिश्तेदार आपके घर की सीमा पर कई सालों से तनातनी कर रहा है, लेकिन अचानक मुस्कुराकर मिलने आया है। और तीसरा रिश्तेदार, जो सबसे अमीर और सबसे ताकतवर है, वह आपसे दोस्ती भी चाहता है, और साथ ही आपकी जेब पर हाथ भी डाल रहा है। अब आपको तय करना है कि किसके साथ कितना चलना है, बिना किसी को पूरी तरह नाराज़ किए। यही आज भारत की असली स्थिति है, और यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि सितंबर 2026 की बिल्कुल ताज़ा हकीकत है।

19 सितंबर 2026 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसे कानून पर दस्तखत किए जिसका नाम ही बता देता है कि यह किसके खिलाफ बनाया गया है, "Sanctioning Russia and Iran Act of 2026"। इस कानून के तहत ट्रंप के पास अब यह अधिकार है कि जो भी देश रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है, उस पर वे सौ फीसदी तक टैरिफ लगा सकते हैं। और इस सूची में भारत का नाम चीन के ठीक बगल में है, क्योंकि भारत रूस के कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। दिलचस्प बात यह है कि यह कानून ठीक उसी हफ्ते आया जब भारत मंडपम में हुए BRICS सम्मेलन में मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग एक साथ मंच पर मौजूद थे।

आज हम इसी पूरी तस्वीर को खोलकर समझेंगे, अमेरिका, चीन और रूस के साथ भारत के रिश्ते असल में कैसे बदल रहे हैं, हर एक रिश्ते की अपनी मजबूरी और अपना फायदा क्या है, और इन तीनों के बीच खड़े होकर भारत आखिर किस रणनीति पर चल रहा है।

सबसे पहले यह समझिए कि दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही

कुछ साल पहले तक दुनिया को समझना आसान था, एक तरफ अमेरिका और उसके साथी देश थे, दूसरी तरफ रूस और चीन। भारत जैसे देशों को अक्सर किसी एक खेमे में गिना जाने की कोशिश होती थी। लेकिन आज 2026 में यह तस्वीर पूरी तरह बिखर चुकी है। विशेषज्ञ अब इसे "बहुध्रुवीय" यानी multipolar दुनिया कहते हैं, जहां कोई एक ताकत पूरी दुनिया पर हावी नहीं है, बल्कि कई केंद्र अपनी-अपनी जगह मज़बूत हैं, और हर कोई अपने फायदे के हिसाब से गठजोड़ बना और तोड़ रहा है।

इसी बदलती दुनिया में भारत ने जो रणनीति अपनाई है, उसे कूटनीति की भाषा में "रणनीतिक स्वायत्तता" यानी strategic autonomy कहा जाता है। इसका सीधा मतलब है, भारत किसी एक गुट का पक्का सदस्य नहीं बनेगा, बल्कि हर बड़ी ताकत के साथ अपने हिसाब से, अपने फायदे के हिसाब से रिश्ता रखेगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इसे एक से ज़्यादा बार बेहद साफ शब्दों में समझाया है, भारत पश्चिम के साथ भी जुड़ेगा, अपनी स्वायत्तता भी बचाएगा, और बहुध्रुवीयता को भी बढ़ावा देगा। यह कोई कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ताकत है।

🔴 रूस, वह दोस्त जो कमज़ोर हो रहा है, लेकिन जिसे छोड़ा नहीं जा सकता

भारत और रूस की दोस्ती दशकों पुरानी है, शीत युद्ध के ज़माने से चली आ रही है, जब सोवियत संघ ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का कई बार साथ दिया और भारत को हथियार और तकनीक दी। आज भी भारत की सेना के पास मौजूद ज़्यादातर बड़े हथियार, चाहे लड़ाकू विमान हों या मिसाइल सिस्टम, रूसी मूल के हैं। लेकिन 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तब से यह दोस्ती एक नए, कहीं ज़्यादा जटिल मोड़ पर आ गई है।

युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर भारी प्रतिबंध लगाए, जिससे रूस को अपना तेल बेचने के लिए नए खरीदार चाहिए थे। भारत ने इसी मौके का फायदा उठाया, और भारी छूट पर रूसी कच्चा तेल खरीदना शुरू कर दिया। आज भारत अपने कुल तेल आयात का करीब एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा सिर्फ रूस से खरीद रहा है, जो युद्ध से पहले लगभग नगण्य था। इससे भारत को सस्ता ईंधन मिला, और रूस को युद्ध के बीच भी अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए पैसा मिला।

लेकिन यहीं से असली पेच शुरू होता है। अमेरिका को यह बिल्कुल पसंद नहीं कि भारत रूस से इतना तेल खरीदे, क्योंकि उनका मानना है कि इससे रूस को युद्ध जारी रखने के लिए पैसा मिल रहा है। अगस्त 2025 में ट्रंप ने इसी वजह से भारत पर पहले पच्चीस फीसदी, फिर एक और पच्चीस फीसदी, यानी कुल पचास फीसदी तक टैरिफ लगा दिया था, सिर्फ रूसी तेल खरीदने की वजह से। बाद में फरवरी 2026 में कुछ राहत मिली और यह घटकर अठारह फीसदी रह गया, लेकिन अब सितंबर 2026 के इस नए कानून ने फिर से सौ फीसदी तक टैरिफ का खतरा खड़ा कर दिया है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर बेहद दृढ़ जवाब दिया है, यह कहते हुए कि भारत अपने एक सौ चालीस करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, और मंत्रालय ने यह भी इशारा किया कि अमेरिका और यूरोपीय संघ खुद भी रूस से व्यापार करते रहे हैं, तो भारत को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है। Observer Research Foundation के हर्ष पंत जैसे विश्लेषकों का कहना है कि भारत में अमेरिका को लेकर भावना अब धीरे-धीरे नकारात्मक होती जा रही है, क्योंकि बार-बार की यह दबाव-नीति किसी भरोसेमंद साझेदार जैसी नहीं लगती।

रूस के साथ एक नई, कम सुखद सच्चाई भी है

भारत के लिए एक और चिंता की बात यह है कि रूस अब पहले जितना स्वतंत्र नहीं रहा। पश्चिमी प्रतिबंधों की वजह से रूस की अर्थव्यवस्था और उसकी सैन्य आपूर्ति श्रृंखला, दोनों धीरे-धीरे चीन पर निर्भर होती जा रही हैं। विश्लेषक इसे भारत के लिए एक दूरगामी खतरे की तरह देखते हैं, क्योंकि भारत को हमेशा एक ऐसा रूस चाहिए था जो चीन से स्वतंत्र होकर अपने फैसले ले सके। अगर मॉस्को पूरी तरह बीजिंग पर निर्भर हो जाए, तो भारत का वह पुराना संतुलन-गणित ही कमज़ोर पड़ जाएगा, जिसमें रूस एक अलग, स्वतंत्र खिलाड़ी की तरह काम करता था।

🔴 चीन, वह पड़ोसी जो सात साल बाद मुस्कुराया, लेकिन सीमा पर अभी भी सेना खड़ी है

चीन के साथ भारत का रिश्ता पिछले कुछ सालों में सबसे ज़्यादा नाटकीय रहा है। 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने रिश्तों को दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। लेकिन 12 सितंबर 2026 को, जब शी जिनपिंग सात साल बाद पहली बार भारत आए और BRICS सम्मेलन के दौरान मोदी से मुलाकात की, तो यह एक बड़ा संकेत था कि दोनों देश अब तनाव कम करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ना चाहते हैं।

इस सुधार की नींव असल में अक्टूबर 2024 में ही पड़ चुकी थी, जब रूस के कज़ान शहर में मोदी और शी की मुलाकात हुई थी, सीमा पर सैनिकों की आंशिक वापसी के बाद। उसके बाद अगस्त 2025 में तियानजिन में फिर मुलाकात हुई, जहां दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को "विकास के साझेदार, प्रतिद्वंद्वी नहीं" कहा। इसी कड़ी में मार्च 2026 में भारत ने चीनी निवेश पर लगी कुछ पाबंदियों में भी ढील दी।

लेकिन यहां एक ज़रूरी, ईमानदार सच्चाई भी समझनी होगी। सीमा पर सेनाएं अभी भी पूरी तरह पीछे नहीं हटी हैं, LAC के दोनों तरफ अब भी हज़ारों सैनिक मौजूद हैं, और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन का दावा जस का तस बना हुआ है। आर्थिक मोर्चे पर भी हालात उतने अच्छे नहीं, भारत का व्यापार घाटा चीन के साथ लगातार बढ़ रहा है और अब करीब एक सौ अरब डॉलर के आसपास टिका हुआ है। यानी सियासी गर्मजोशी तो बढ़ी है, लेकिन ज़मीनी हकीकत और आर्थिक निर्भरता की तस्वीर अभी भी उतनी साफ और भरोसेमंद नहीं है जितना सिर्फ एक मुलाकात की तस्वीर से लग सकता है।

चीन से नज़दीकी क्यों बढ़ रही है, असली वजह समझिए

इस सुधार के पीछे एक बड़ी वजह खुद अमेरिका की अप्रत्याशित नीतियां भी हैं। जब वाशिंगटन से बार-बार टैरिफ और दबाव की धमकियां आती हैं, तो भारत के लिए यह व्यावहारिक समझदारी बन जाती है कि वह अपने सबसे बड़े पड़ोसी के साथ तनाव को कम-से-कम प्रबंधनीय स्तर पर तो रखे ही। The National Interest पत्रिका के एक विश्लेषण में यह बात बेहद सटीक तरीके से कही गई है, अगर अमेरिका खुद चीन और रूस दोनों के साथ अपने रिश्तों को स्थिर करने में जुटा है, तो भारत को यह डर सताने लगता है कि अमेरिकी रणनीति में उसकी अहमियत कहीं कम तो नहीं हो रही। यही अनिश्चितता भारत को चीन के साथ भी बातचीत का रास्ता खुला रखने के लिए प्रेरित करती है।

🔴 अमेरिका, वह साथी जो दोस्त भी है और सबसे बड़ा दबाव भी

भारत और अमेरिका का रिश्ता पिछले दो दशकों में सबसे तेज़ी से बढ़ा है। रक्षा सहयोग, तकनीक साझेदारी, और क्वाड जैसे मंचों के ज़रिए दोनों देश चीन को संतुलित करने के लिए साथ आए हैं। अमेरिका भारत को अपनी सबसे उन्नत तकनीक, रक्षा उपकरण और एक विशाल उपभोक्ता बाज़ार देता है। यही वजह है कि भारत ने कभी अमेरिका के साथ कोई औपचारिक सैन्य संधि नहीं की, क्योंकि यही गैर-संधि वाला रिश्ता उसकी रणनीतिक स्वायत्तता की सबसे बड़ी पहचान है।

लेकिन 2025 से 2026 के बीच यह रिश्ता बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है। अगस्त 2025 में ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने की वजह से भारत पर पचास फीसदी तक टैरिफ लगाया, जो दुनिया के किसी भी बड़े व्यापारिक साझेदार पर लगाए गए सबसे ऊंचे टैरिफ में गिना गया। दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान चीन, जो रूस से भारत से भी ज़्यादा तेल खरीदता है, उस पर यह विशेष टैरिफ नहीं लगाया गया। इससे भारत में यह भावना मज़बूत हुई कि अमेरिका कभी-कभी अपने ही रणनीतिक साझेदारों के साथ दोहरा रवैया अपनाता है।

फरवरी 2026 में एक द्विपक्षीय व्यापार ढांचे के तहत यह टैरिफ घटकर अठारह फीसदी रह गया, और ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद करने और अमेरिका से ज़्यादा खरीदारी करने पर सहमत हो गया है, हालांकि भारत ने इस दावे की पूरी तरह पुष्टि कभी नहीं की। और अब सितंबर 2026 में आया यह नया प्रतिबंध-कानून एक बार फिर उसी पुराने दबाव को वापस ले आया है, और भारत एक ऐसे व्यापार समझौते के बीच में फंसा है, जो अभी भी अंतिम रूप नहीं ले पाया।

समय टैरिफ की स्थिति
अगस्त 2025 रूसी तेल खरीदने पर पच्चीस फीसदी अतिरिक्त टैरिफ, कुल पचास फीसदी
फरवरी 2026 द्विपक्षीय ढांचे के तहत घटकर अठारह फीसदी
सितंबर 2026 नए कानून के तहत सौ फीसदी तक टैरिफ का नया खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस नए कानून को फौरन इस्तेमाल करने के बजाय, इसे एक दबाव के हथियार के तौर पर अपने पास रखेंगे, ताकि व्यापार वार्ता में उनका पलड़ा भारी रहे। Hoover Institution के रोनक देसाई के अनुसार, यह कानून भले ही अभी लागू न हो, लेकिन यह वाशिंगटन के हाथ में एक लीवर ज़रूर बन गया है।

तीनों को एक साथ रखकर देखिए, असली तस्वीर यही है

देश भारत को क्या मिलता है सबसे बड़ी चुनौती
रूस सस्ता तेल, पुराना रक्षा सहयोग, स्वतंत्र वैश्विक राय में साथ चीन पर बढ़ती निर्भरता, पश्चिमी प्रतिबंधों का साया
चीन सीमा पर कम तनाव, व्यापार और निवेश के नए रास्ते भारी व्यापार घाटा, सीमा का असली समाधान न होना
अमेरिका उन्नत तकनीक, रक्षा सहयोग, बड़ा बाज़ार, चीन के खिलाफ संतुलन बार-बार टैरिफ का दबाव, अप्रत्याशित नीतियां

यह तालिका असल में भारत की पूरी कूटनीतिक चुनौती को एक नज़र में दिखा देती है। तीनों रिश्तों में फायदा भी है और जोखिम भी, और भारत को हर कदम बेहद सोच-समझकर उठाना पड़ता है, क्योंकि एक तरफ ज़्यादा झुकना दूसरी तरफ को नाराज़ कर सकता है।

तो भारत की असली रणनीति क्या है

कूटनीति के जानकार अब इसे सिर्फ "गुटनिरपेक्षता" नहीं, बल्कि "बहु-संरेखण" यानी multi-alignment कहते हैं। पुरानी गुटनिरपेक्षता का मतलब था किसी से भी ज़्यादा न जुड़ना, जबकि आज की रणनीति इससे कहीं ज़्यादा सक्रिय है, भारत हर बड़ी ताकत के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में गहरा जुड़ाव बना रहा है, भले ही वे आपस में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हों। रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा में साझेदारी, अमेरिका के साथ व्यापार, तकनीक और रक्षा में साझेदारी, और चीन के साथ धीरे-धीरे सामान्य होते व्यापारिक और कूटनीतिक रिश्ते, यह तीनों एक साथ, एक ही समय पर चल रहे हैं।

Strategic Vanguard के एक विश्लेषण में इसे बेहद सटीक तरीके से कहा गया है, भारत को रणनीतिक स्वायत्तता बचानी चाहिए, लेकिन यह स्वायत्तता किसी अस्पष्ट, बिना दिशा वाली नीति का बहाना नहीं बननी चाहिए। यानी भारत को सिर्फ "हम किसी के साथ नहीं हैं" कहकर बच निकलने के बजाय, हर मोर्चे पर अपने राष्ट्रीय हित को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा, और उसी हिसाब से फैसले लेने होंगे।

BRICS की वह तस्वीर, जो सिर्फ एक तस्वीर नहीं थी

जब 12 सितंबर को मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग एक साथ BRICS सम्मेलन में खड़े थे, तब इसे कई लोग एक अमेरिका-विरोधी गठजोड़ के तौर पर देखने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन असल में यह उतना सीधा नहीं है। भारत ने इसी सम्मेलन में बिना किसी देश का नाम लिए एकतरफा प्रतिबंधों और टैरिफ की आलोचना करने वाली भाषा का समर्थन तो किया, लेकिन साथ ही भारत ने यह भी साफ किया कि उसका कोई इरादा डॉलर को चुनौती देने वाली किसी साझा मुद्रा का हिस्सा बनने का नहीं है। यह ठीक वही संतुलन है जिसकी बात हम बार-बार कर रहे हैं, पश्चिम-विरोधी मंच पर मौजूद रहना, लेकिन उसमें पूरी तरह डूब न जाना।

यही वजह है कि अमेरिका का नया प्रतिबंध-कानून, BRICS सम्मेलन के ठीक बाद आना, एक तरह से उसी तस्वीर का जवाब भी माना जा रहा है। एक पक्ष अपनी ताकत दिखाना चाहता है, तो दूसरा पक्ष अपना दबाव। भारत इन दोनों के बीच खड़ा है, न पूरी तरह किसी एक तरफ, न पूरी तरह तटस्थ।

आगे क्या होगा, कुछ संकेत जो देखने लायक हैं

आने वाले महीनों में कुछ बातें यह तय करेंगी कि भारत की यह संतुलन-नीति कितनी टिकाऊ साबित होती है। पहला, क्या अमेरिका अपने इस नए सौ फीसदी टैरिफ के अधिकार को वाकई भारत पर इस्तेमाल करता है, या इसे सिर्फ बातचीत का दबाव बनाए रखने तक सीमित रखता है। दूसरा, क्या भारत और अमेरिका के बीच अटका हुआ व्यापार समझौता आखिरकार पूरा हो पाता है। तीसरा, क्या चीन के साथ सीमा पर बातचीत किसी ठोस नतीजे तक पहुंचती है, या सिर्फ शिखर सम्मेलनों की गर्मजोशी तक सीमित रहती है। और चौथा, रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता आगे कितनी गहरी होती है, और इसका भारत के पुराने, भरोसेमंद रिश्ते पर क्या असर पड़ता है।

निष्कर्ष, तीन ताकतों के बीच एक चौथी ताकत बनने की कोशिश

भारत की यह कहानी किसी एक दिन की नहीं, बल्कि हर दिन, हर हफ्ते फिर से लिखी जा रही एक कहानी है। एक तरफ रूस है, जो पुराना दोस्त है लेकिन कमज़ोर हो रहा है। दूसरी तरफ चीन है, जो पड़ोसी है और अब मुस्कुरा रहा है, लेकिन जिसकी मुस्कान पर पूरा भरोसा करना अभी जल्दबाज़ी होगी। और तीसरी तरफ अमेरिका है, जो सबसे बड़ा साझेदार भी है और सबसे बड़ा दबाव भी। भारत का असली हुनर यही है कि वह इन तीनों के साथ एक साथ, अलग-अलग तरीकों से डील कर पा रहा है, बिना किसी एक को पूरी तरह खोए।

यह कोई आसान रास्ता नहीं है, और इसमें गलती की गुंजाइश बेहद कम है। लेकिन अगर भारत इस संतुलन को आने वाले सालों में भी साध पाता है, तो वह सिर्फ तीन महाशक्तियों के बीच एक संतुलन-साधक देश नहीं रहेगा, बल्कि खुद एक चौथी, स्वतंत्र ताकत के तौर पर उभर सकता है, जिसकी अपनी शर्तें हों, अपनी प्राथमिकताएं हों, और जिसे कोई भी देश हल्के में न ले सके। यही वह असली लक्ष्य है, जिसकी तरफ भारत की पूरी विदेश नीति आज बढ़ रही है।

आपको क्या लगता है, क्या भारत अपनी यह संतुलन-नीति अगले पांच सालों तक भी बनाए रख पाएगा, या किसी एक मोड़ पर उसे किसी एक पक्ष का साफ-साफ चुनाव करना पड़ेगा? नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताएं।

स्रोत / Sources:

1. CNBC, "Trump gains a tariff weapon against China and India. Will he use it?", September 17, 2026
2. Oilprice.com, "India Unlikely to Ditch Russian Oil Despite Trump's 100% Tariff Threat", September 2026
3. Political Wire, "India Is Squeezed Between Trump Tariffs and Russian Oil", September 19, 2026
4. Outlook India, "Trump's New Russia Sanctions, What It Means And Can India Face 100% Tariffs"
5. Wikipedia, "2025 United States-India diplomatic and trade crisis"
6. Global News, "Trump imposes additional 25% tariff on India over Russian oil purchase"
7. The National Interest, "India Confronts the US-China-Russia Triangle"
8. VIF India, "India's Geopolitical Strategy Amidst Global Turbulence", January 5, 2026
9. Strategic Vanguard, "India's Strategic Balancing Act, How Strategic Autonomy Works in a Multipolar World"
10. News Track English, "India Foreign Policy 2026, Doctrine, Strategic Autonomy, Global Alliances and Key Risks"
11. CLAWS, "India's Balancing Act between Russia and Europe, Strategic Autonomy in a Multipolar World"
12. Outside The Case, "Geopolitics and Global Power, The Complete Guide 2026"

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