क्या Election Commission के फैसले रद्द हो सकते हैं? SIR विवाद का संवैधानिक पहलू
लेखक: आकाश दीप | युगबोध
एक सवाल जिसका जवाब हर नागरिक को पता होना चाहिए
5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी याचिका पर सुनवाई की, जिसने भारत के सबसे अहम संवैधानिक संस्थानों में से एक, चुनाव आयोग, के भीतर चल रहे एक गहरे सवाल को सार्वजनिक कर दिया। सवाल यह था, क्या देश भर में चल रही Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़े फैसले, चुनाव आयोग के तीन सदस्यों ने मिलकर, सामूहिक रूप से लिए थे, या यह फैसले सिर्फ एक व्यक्ति, मुख्य चुनाव आयुक्त, के स्तर पर ले लिए गए और बाकी दो सदस्यों को बाद में सिर्फ सूचना दी गई।
यह सवाल सुनने में तकनीकी लग सकता है, लेकिन इसकी जड़ें भारत के संविधान की सबसे बुनियादी सोच तक जाती हैं, कि कोई भी शक्तिशाली संस्था अकेले एक व्यक्ति के हाथ में नहीं होनी चाहिए। आज हम इस पूरे मामले को बिल्कुल शुरू से समझेंगे, आसान भाषा में, ताकि संविधान की जटिल भाषा जानने वाला कोई कानूनविद् न भी हो, तब भी हर बात साफ-साफ समझ आ जाए, चुनाव आयोग बना कैसे, इसमें फैसले कैसे लिए जाते हैं, SIR है क्या, विवाद कहां से शुरू हुआ, सुप्रीम कोर्ट ने अब तक क्या कहा है, और क्या वाकई इन फैसलों को रद्द किया जा सकता है।
चुनाव आयोग का संवैधानिक आधार
भारत के संविधान का Article 324 चुनाव आयोग की पूरी नींव है। इसमें लिखा है कि चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और इतने अन्य चुनाव आयुक्त होंगे, जितने राष्ट्रपति तय करें। इसी अनुच्छेद के तहत चुनाव आयोग को देश भर में मतदाता सूची तैयार करने और चुनाव कराने की "अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण" यानी superintendence, direction and control की शक्ति दी गई है।
यह शक्ति इतनी व्यापक है कि इसे अक्सर "plenary power" यानी पूर्ण, असीमित शक्ति कहा जाता है। लेकिन यहां एक ज़रूरी बात समझनी होगी, यह असीमित शक्ति चुनाव आयोग नाम की संस्था को दी गई है, किसी एक व्यक्ति को नहीं। यही फर्क आज की पूरी बहस का केंद्र है।
एक व्यक्ति से तीन सदस्यों तक का सफर
शुरुआत में चुनाव आयोग सिर्फ एक व्यक्ति, मुख्य चुनाव आयुक्त, की संस्था थी। लेकिन 1989 में एक संशोधन के ज़रिए इसे बहु-सदस्यीय बनाया गया, और 1 अक्टूबर 1993 से यह स्थायी रूप से तीन-सदस्यीय संस्था बन गई, एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त। इस बदलाव के पीछे सोच बिल्कुल साफ थी, इतनी बड़ी शक्ति को एक अकेले व्यक्ति के विवेक पर नहीं छोड़ा जा सकता।
इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए एक बेहद अहम नियम भी तय हुआ, जो आज के पूरे विवाद की जड़ है। चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई "overruling power" यानी वीटो या निर्णायक अधिकार नहीं है। कोई भी फैसला तीनों सदस्यों की राय के बहुमत से, यानी majority opinion से लिया जाता है। मतलब अगर मुख्य चुनाव आयुक्त किसी बात पर एक राय रखते हैं, और बाकी दोनों चुनाव आयुक्त दूसरी राय रखते हैं, तो आखिरी फैसला उन दोनों की राय के हिसाब से ही होगा, मुख्य चुनाव आयुक्त की इच्छा के हिसाब से नहीं।
नियुक्ति की कहानी, Anoop Baranwal से 2023 Act तक
यह समझने के लिए कि आज चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है, हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। लंबे समय तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह सरकार के विवेक पर होती थी, इसके लिए कोई तय, कानूनी प्रक्रिया मौजूद नहीं थी। इसी पर सवाल उठाते हुए Anoop Baranwal बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट की पांच-जजों की संविधान पीठ ने 2023 में एक ऐतिहासिक फैसला दिया।
अदालत ने कहा कि जब तक संसद इस पर कोई कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्ति एक तीन-सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होगी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। अदालत का तर्क बेहद सीधा था, एक ऐसी स्वतंत्र संस्था चाहिए जो कार्यपालिका यानी सरकार के हस्तक्षेप से पूरी तरह सुरक्षित रहे।
लेकिन इसी साल, 2023 में, सरकार ने संसद में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 पास किया। इस कानून ने चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को हटा दिया, और उनकी जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि तीन-सदस्यीय चयन समिति में अब दो सदस्य, प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री, सरकार पक्ष से होते हैं, जबकि सिर्फ एक सदस्य, विपक्ष के नेता, अलग पक्ष से। आलोचकों का कहना है कि इससे व्यावहारिक रूप से सरकार को नियुक्ति प्रक्रिया पर बहुमत मिल गया, वही बहुमत जिसे सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले में रोकना चाहता था।
| समय | चयन समिति की संरचना |
|---|---|
| 2023 Anoop Baranwal फैसले के बाद | प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, मुख्य न्यायाधीश |
| 2023 Act के बाद, वर्तमान व्यवस्था | प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री |
इसी कानून के तहत आज के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति हुई, जो इस तरह बने पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। वर्तमान में चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार के साथ सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, दो अन्य चुनाव आयुक्त के तौर पर शामिल हैं।
SIR आखिर है क्या
Special Intensive Revision, यानी SIR, मतदाता सूची का एक विशेष, गहन पुनरीक्षण है। इसका मकसद है मतदाता सूची से ऐसे नाम हटाना जो मर चुके लोगों के हैं, जो एक जगह से दूसरी जगह जा चुके हैं, या जो गलत तरीके से शामिल हो गए हैं, और साथ ही नए, पात्र मतदाताओं को जोड़ना। यह कोई नई अवधारणा नहीं, ऐसी पहली गहन समीक्षा 1952 में ही हुई थी।
लेकिन 2025 में शुरू हुई यह SIR प्रक्रिया अपने पैमाने और तरीके, दोनों की वजह से विवादों में घिर गई। 24 जून 2025 को चुनाव आयोग ने बिहार में SIR का ऐलान किया, 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले। इसके बाद 27 अक्टूबर 2025 को देश के नौ राज्यों और तीन केंद्र-शासित प्रदेशों में इसका दूसरा चरण शुरू हुआ।
विवाद की पहली परत, प्रक्रिया पर सवाल
बिहार में SIR शुरू होते ही, यह सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, Association for Democratic Reforms बनाम चुनाव आयोग के मामले में। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह प्रक्रिया बेहद कम समय में, बिना पर्याप्त तैयारी के, और ऐसे दस्तावेज़ों की मांग करते हुए की जा रही है जो बहुत से गरीब, प्रवासी और हाशिए पर खड़े नागरिकों के पास मौजूद ही नहीं होते।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों से इनकार किया, और कहा कि यह पूरी प्रक्रिया कानूनी और संवैधानिक रूप से मान्य है। आयोग ने अपने जवाब में Article 324 और Representation of the People Act की Section 21(3) का हवाला दिया, जो उसे "जब चाहे" और "जिस तरीके से उचित समझे" SIR करने का अधिकार देता है, बशर्ते इसके कारण दर्ज किए जाएं।
27 मई 2026, पहला बड़ा फैसला
27 मई 2026 को, चुनाव खत्म होने और नई सरकार बनने के करीब छह महीने बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में अपना फैसला सुनाया। अदालत ने SIR की वैधता को बरकरार रखा, और कहा कि यह Representation of the People Act के अनुरूप है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है, और SIR करने का फैसला उसके कानूनी अधिकार-क्षेत्र के भीतर ही आता है।
इस फैसले का एक और बेहद अहम हिस्सा था, अदालत ने माना कि सामान्य Form 6, जो नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होता है, SIR जैसी विशेष प्रक्रिया पर पूरी तरह, शब्दशः लागू नहीं हो सकता, और इसलिए चुनाव आयोग के पास एक "अवशिष्ट अधिकार" यानी residual authority है कि वह SIR की ज़रूरतों के हिसाब से एक उपयुक्त दस्तावेज़ी ढांचा खुद तय कर सके। यह फैसला paragraph 152 और 161 में दर्ज है, और यही वह आधार है जिस पर बाद में आयोग ने Annexure-D जैसे नए दस्तावेज़ भी मांगने शुरू किए।
हालांकि कुछ विद्वानों ने इस फैसले की एक दिलचस्प आलोचना भी की। Verfassungsblog पर छपे एक लेख में तर्क दिया गया कि यह फैसला चुनाव आयोग को बेहद व्यापक, लगभग असीमित शक्तियां तो दे देता है, लेकिन उसके साथ-साथ उतनी ही मज़बूत जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था बनाने में चूक जाता है। यानी शक्ति तो मिली, लेकिन उस शक्ति के दुरुपयोग को रोकने का तंत्र उतना मज़बूत नहीं बन पाया।
असली पेंच, क्या फैसला सामूहिक था
27 मई के फैसले ने SIR को वैध ठहरा दिया, लेकिन इसने एक दूसरा, कहीं ज़्यादा गहरा सवाल खुला छोड़ दिया, जो आज अक्टूबर 2026 में अदालत के सामने फिर से आ चुका है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच, SIR से जुड़े कई अहम फैसले, जैसे किन दस्तावेज़ों को स्वीकार किया जाएगा, किस समयसीमा में काम होगा, और Form 6 में क्या बदलाव होंगे, यह सब मुख्य चुनाव आयुक्त के स्तर पर तय किए गए, जबकि नियम कहता है कि ऐसे फैसले तीनों सदस्यों की सामूहिक, बहुमत वाली राय से होने चाहिए।
याचिका में यह दावा किया गया है कि इस दौरान आपत्तियां भी दर्ज की गई थीं, यानी यह सिर्फ एक काल्पनिक आशंका नहीं, बल्कि आयोग के भीतर से ही उठी हुई चिंता हो सकती है। 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, तीनों से जवाब मांगा है। साथ ही अदालत ने फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने या उनके कामकाज पर रोक लगाने वाली कोई अंतरिम व्यवस्था देने से इनकार कर दिया है।
Form 6 वाला एक अलग, छोटा विवाद
इसी दौरान एक और विवाद भी सुर्खियों में आया, जब मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने एक सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत ने SIR के लिए Form 6 के किसी "संशोधित रूप" को मंज़ूरी नहीं दी है। कुछ मीडिया रिपोर्टों ने इसे सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के बीच सीधे टकराव के तौर पर पेश किया।
लेकिन एक बारीक विश्लेषण बताता है कि यह टकराव उतना बड़ा नहीं जितना दिखाया गया। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी सिर्फ यह कह रही थी कि अदालत ने किसी विशिष्ट, नए Form 6 को अपनी तरफ से स्वीकृत नहीं किया, न कि यह कि आयोग के पास ऐसा फॉर्म बनाने का अधिकार ही नहीं। जैसा 27 मई के फैसले में ही साफ हो चुका था, आयोग के पास यह "residual authority" पहले से मौजूद है। यानी यह कोई नया झटका नहीं, बल्कि पुराने फैसले की ही एक स्पष्ट याद-दिहानी थी।
सरकार और प्रधानमंत्री की भूमिका कहां है
यह समझना ज़रूरी है कि इस पूरे विवाद में सरकार और प्रधानमंत्री की भूमिका सीधे SIR के दिन-प्रतिदिन के फैसलों में नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था में है जिसने आज के चुनाव आयुक्तों को नियुक्त किया। जैसा ऊपर बताया गया, 2023 के कानून के बाद, चयन समिति में प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री मिलकर बहुमत में हैं। इसलिए जब भी किसी नई नियुक्ति की बात आती है, सरकार का प्रभाव संरचनात्मक रूप से बड़ा हो जाता है।
लेकिन एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद, संविधान के तहत चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संस्था के तौर पर काम करता है, और रोज़मर्रा के फैसलों में सरकार की कोई औपचारिक भूमिका नहीं होती। SIR को लागू करने, उसकी समयसीमा तय करने, या दस्तावेज़ों की सूची बनाने जैसे फैसले, कानूनी तौर पर चुनाव आयोग के अपने अधिकार क्षेत्र में आते हैं, सरकार के नहीं। यही वजह है कि इस पूरे विवाद का केंद्र सरकार बनाम आयोग नहीं, बल्कि आयोग के भीतर मुख्य चुनाव आयुक्त बनाम बाकी दो चुनाव आयुक्तों के बीच, निर्णय-प्रक्रिया को लेकर है।
क्या फैसले वाकई रद्द हो सकते हैं
अब सबसे मूल सवाल पर आते हैं। अगर अदालत में यह साबित हो जाता है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले वाकई बिना तीनों सदस्यों की सामूहिक सहमति के लिए गए थे, तो क्या वे फैसले रद्द हो सकते हैं। कानूनी सिद्धांत के हिसाब से, अगर कोई फैसला उस प्रक्रिया का पालन किए बिना लिया गया हो जो कानून में तय है, तो वह फैसला प्रक्रियागत रूप से दोषपूर्ण माना जा सकता है, और अदालत उसे रद्द करने या दोबारा, सही प्रक्रिया से लेने का आदेश दे सकती है।
लेकिन यहां कई व्यावहारिक पेच भी हैं। पहला, 27 मई 2026 का फैसला पहले ही SIR की बुनियादी वैधता को बरकरार रख चुका है, इसलिए पूरी प्रक्रिया को शुरू से रद्द करना बेहद मुश्किल होगा। दूसरा, अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या वाकई कोई प्रक्रियागत गड़बड़ी हुई, या यह सिर्फ एक राजनीतिक आरोप है। तीसरा, भले ही कुछ विशिष्ट उप-फैसले, जैसे किसी खास दस्तावेज़ की अनिवार्यता, गलत प्रक्रिया से लिए गए हों, इसका मतलब यह नहीं कि पूरी SIR प्रक्रिया ही अमान्य हो जाएगी। अदालत संभवतः एक संतुलित रास्ता निकालेगी, जिसमें प्रक्रिया की खामी को ठीक करने का निर्देश तो दिया जाए, लेकिन पूरी कवायद को बर्बाद न किया जाए, खासकर जब लाखों मतदाताओं का काम पहले से हो चुका हो।
न्यायिक समीक्षा की सीमाएं
यह भी समझना ज़रूरी है कि अदालतें चुनाव आयोग के हर फैसले की समीक्षा नहीं कर सकतीं। भारतीय न्यायशास्त्र में एक सिद्धांत है, जजों की "deference" यानी सम्मानजनक दूरी, जिसके तहत अदालतें चुनाव जैसी संवेदनशील, जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बहुत गहराई से हस्तक्षेप करने से बचती हैं, जब तक कि कोई स्पष्ट संवैधानिक उल्लंघन न दिखे। यही वजह है कि 27 मई के फैसले में अदालत ने आयोग के "plenary power" को बार-बार रेखांकित किया।
लेकिन न्यायिक समीक्षा पूरी तरह बंद भी नहीं है। जब सवाल यह हो कि क्या कोई फैसला सही संवैधानिक या कानूनी प्रक्रिया से लिया गया, तो यह शुद्ध प्रक्रिया का सवाल बन जाता है, न कि नीतिगत विवेक का, और ऐसे सवालों पर अदालतें हस्तक्षेप करने से नहीं हिचकतीं। यही वजह है कि 5 अक्टूबर की सुनवाई में अदालत ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए सबसे जवाब मांगा, भले ही उसने अभी कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई।
एक निष्पक्ष आकलन
इस पूरे मामले को एक संतुलित नज़र से देखना ज़रूरी है। एक तरफ, चुनाव आयोग का यह तर्क मज़बूत है कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना उसका संवैधानिक दायित्व है, और सुप्रीम कोर्ट खुद इसे पहले ही मान्य कर चुका है। दूसरी तरफ, अगर वाकई तीन-सदस्यीय संस्था में निर्णय-प्रक्रिया का वह बुनियादी सिद्धांत, कि कोई फैसला अकेले एक व्यक्ति नहीं ले सकता, कमज़ोर पड़ रहा हो, तो यह चिंता भी उतनी ही गंभीर है, क्योंकि यही सिद्धांत है जो इस संस्था को तानाशाही से बचाता है।
यह भी याद रखना ज़रूरी है कि 2023 के कानून ने पहले ही नियुक्ति-प्रक्रिया में सरकार का पलड़ा भारी कर दिया था, जिसकी आलोचना तब भी हुई थी। अगर अब यह भी सामने आए कि नियुक्ति के बाद, आयोग के भीतर रोज़मर्रा के फैसलों में भी सामूहिकता की भावना कमज़ोर पड़ रही है, तो यह दो अलग-अलग स्तरों पर संस्थागत कमज़ोरी की तरफ इशारा करेगा, नियुक्ति में और कामकाज में, दोनों में।
निष्कर्ष
भारत का संविधान चुनाव आयोग को बेहद शक्तिशाली बनाता है, क्योंकि स्वतंत्र, निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की सबसे बुनियादी शर्त है। लेकिन इसी ताकतवर संस्था को एक अकेले व्यक्ति के हाथ में जाने से रोकने के लिए, संविधान और कानून, दोनों ने इसे तीन सदस्यों के बीच बांटा, और यह साफ किया कि फैसले बहुमत से होंगे, किसी एक व्यक्ति की मर्ज़ी से नहीं।
SIR का मूल मकसद, यानी सही, साफ-सुथरी मतदाता सूची बनाना, अपने आप में एक अच्छा और ज़रूरी लक्ष्य है, और सुप्रीम कोर्ट इसकी वैधता को पहले ही मान्यता दे चुका है। असली सवाल कभी भी SIR होना चाहिए या नहीं, यह नहीं रहा, असली सवाल यह बन गया है कि क्या इसे लागू करने के दौरान, उस बुनियादी सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया का पालन हुआ जो खुद चुनाव आयोग को आज़ाद और भरोसेमंद बनाती है। जब तक सुप्रीम कोर्ट इस विशिष्ट सवाल का जवाब नहीं देता, तब तक यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि फैसले रद्द होंगे या बरकरार रहेंगे, लेकिन यह तय है कि यह मामला आने वाले महीनों में भारत के संवैधानिक इतिहास का एक और अहम अध्याय बनने जा रहा है।
आपको क्या लगता है, क्या चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं में निर्णय-प्रक्रिया को लेकर कड़े, पारदर्शी नियम बनने चाहिए, या मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त है? नीचे टिप्पणी में ज़रूर बताएं।
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स्रोत / Sources:
1. Wikipedia, "Special Intensive Revision"
2. Wikipedia, "Association for Democratic Reforms v. Election Commission of India"
3. Wikipedia, "Election Commissioner of India"
4. Wikipedia, "Election Commission of India"
5. Organiser, "SC's big order on SIR, refuses to suspend CEC Gyanesh Kumar, issues notice on plea challenging ECI decisions", October 5, 2026
6. Shabariseva, "Supreme Court Seeks ECI Response in SIR Row, Declines Interim Suspension of CEC Gyanesh Kumar"
7. Indian Matrix (Substack), "Decoding the Form 6 Controversy, Why the Supreme Court and the ECI Are on the Exact Same Page", October 5, 2026
8. Verfassungsblog, "Power Without Oversight, India's SIR Judgment and the Unfinished Business of Institutional Design"
9. The Tribune, "Have sole discretion on roll revision, poll panel tells top court"
10. The Tribune, "Direction for SIR at regular interval encroaches upon EC's exclusive jurisdiction, poll panel to SC"
11. PRS India, "The CEC and Other Election Commissioners Bill, 2023, Legislative Brief"
12. Vajiram and Ravi, "Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023"
13. Deccan Herald, "Against the spirit of constitution"
14. Law and Other Things, "The Election Commission or the 'Elected' Commission"
15. Drishti Judiciary, "Chief Election Commissioner Appointments"

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